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इंटरव्यू : अगर मैं मसाला फिल्में बनाऊंगा तो बीमार पड़ जाऊंगा - शूजित सरकार

शूजीत सरकार बता रहे हैं कि उन्होंने वरुण धवन और बनिता संधू को फिल्म अक्टूबर के लिए क्यों साइन किया?

Abhishek Srivastava Updated On: Apr 16, 2018 07:43 PM IST

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इंटरव्यू : अगर मैं मसाला फिल्में बनाऊंगा तो बीमार पड़ जाऊंगा - शूजित सरकार

शूजित सरकार को मौजूदा दौर के निर्देशकों में आज का हृषी दा या बासु दा मानें तो ये कहीं से गलत नहीं होगा. लेकिन इन दोनों से अलग उनकी एक चीज जो बेहद ही खास है वो ये है कि इनकी महारथ सभी जॉनरों पर है. अगर उनकी पहली फिल्म यहां रोमांटिक फिल्म थी तो उनकी दूसरी फिल्म विकी डोनर एक कॉमेडी. मद्रास कैफ़े से उन्होंने जता दिया की थ्रिलर पर भी उनकी पकड़ है. पीकू अगर स्लाइस ऑफ लाइफ थी तो वहीं पिंक एक बेहद सधा हुआ ड्रामा.

उनकी हालिया रिलीज फिल्म है अक्टूबर जिसका लुक और फील उनकी पिछली फिल्मों से बिलकुल जुदा है. शूजित से फर्स्टपोस्ट ने एक खास मुलाकात की जिसमें उन्होंने यही भी बताया कि अपनी दोनों बेटियों को वो बॉलीवुड के माहैल से क्यों दूर रखना चाहते हैं.

वरुण ने कहा है कि आपका निर्देशन काफी हद तक ह्रषिकेश मुखर्जी और बासु दा से मिलता जुलता है. इसके बारे में आपकी क्या टिप्पणी होगी?

मैं तो यही कहूंगा कि शुक्रिया है आपका. लेकिन मैं इस बात को नहीं मानता हूं. सत्यजीत रे का मेरे ऊपर काफी असर है और मैं उनकी सभी फिल्मों से बहुत प्रेरित रहा हूं. उनकी फिल्मों का हास्य भी काफी यथार्थ लगता है. उनकी फिल्मों के किरदार पूरी तरह से तराशे हुए नजर आते हैं.

उनकी फिल्में आपको एक तरह का झटका देती हैं, आपको अवगत कराती हैं और फिर उसके बाद आपको आगे ले जाती हैं. अपु ट्रिलजी में जो पिता और बेटे का रिश्ता दिखाया गया था वो पूरी तरह से मेरे दिल में उतर गया था. मैं अभी भी उसको महसूस कर सकता हूं. मैं रे से बेहद प्रभावित हूं.

क्या यह सच है कि अक्टूबर की कहानी आपकी जिंदगी की ही एक कहानी है?

एक छोटे तौर पर आप इस बात को कह सकते हैं लेकिन ये मेरी प्रेम कहानी नहीं है. मैं और मेरी बीवी अभी भी एक दूसरे से प्रेम करते हैं और हमारी शादी को 20 साल हो चुके हैं.

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हम एक दूसरे को तबसे जानते हैं जब हम दूसरी कक्षा में पढ़ते थे. अक्टूबर की कहानी बहुत छोटे लेवल पर मेरी एक निजी अनुभव से प्रेरित है. यहां पर मैं आपको कहना चाहूंगा कि फिल्म का बैकड्रॉप मेरा पुराना अनुभव है इसकी कहानी नहीं. यह किस्सा साल 2004 में हुआ था और तभी से मैं इसको दिखाना चाहता था लेकिन कोई कहानी मिल नहीं पा रही थी.

लेकिन जब मैंने फिल्म की लेखिका जूही से बात करना शुरू किया तब एक कहानी का ढांचा धीरे-धीरे निकलना शुरू हुआ. जूही ने फिर पूरी कहानी लिखी और जब मैंने पढ़ी तो यही कहा की अब शूटिंग शुरू करते हैं.

इस फिल्म के लिए आपका कोई टारगेट ऑडियंस है?

आप टारगेट ऑडियंस को कैसे परिभाषित करते हैं? अगर आप बॉक्स ऑफिस की बात करते हैं तो मुझे उसके बारे में कुछ नहीं पता है. मुझे बॉक्स ऑफिस की पड़ी नहीं है. मैं फिल्में अपने ऑडियंस के लिए नहीं बनाता हूं बल्कि फिल्में मैं खुद के लिए बनाता हूं. यह जरूरी है कि जो फिल्म मैंने बनाई है उसे मैं खुद पहले पसंद करूं. मैं फिल्में अपने परिवार, निजी दोस्तों के लिए बनाता हूं. अगर उनको मेरी फिल्में पसंद आती है तो मुझे खुशी मिलती है.

शूजित आपकी फिल्म से पहली बार बनिता संधू रूबरू हो रही है. क्या वजह थी जिसकी वजह से आपने इनको अक्टूबर के लिए साइन किया?

सबसे पहली वजह इनकी सादगी थी. इनके साथ मैं एक विज्ञापन पहले शूट कर चुका था. जिस तरीके से सेट पर उन्होंने उस वक़्त मेरे निर्देश लिए थे वो मुझे याद था और यह भी याद था कि वो आगे चल कर एक एक्टर बनना चाहती थीं.

जब हम लोगों ने इस फिल्म की कास्टिंग शुरू की तब मुझे इनका ख्याल आया. मुझे इस फिल्म के लिए एक नया चेहरा लेना था. जब भी बनिता बात करती है तो अपनी आंखों से से ही कई बातों को बयां कर देती है.

क्या सोच रही है यह बात समझ में आ जाती है. इसके अलावा जो इनका लुक है - द गर्ल नेक्स्ट डोर - का उसकी वजह से भी मैंने इनको यह फिल्म ऑफर की. मुझे अपनी इस फिल्म के लिए 20 साल की एक मैच्योर लड़की की तलाश थी.

आपकी अब तक जो भी फिल्में आई हैं वो सभी एक दूसरे से बिलकुल जुदा है और अमूमन सभी बॉलीवुड के ठेठ सेटअप से भी अलग नजर आती है. कभी ख्याल आता है की कोई मसाला फिल्म बनाई जाए?

देखिये इस तरह की फिल्म मैं अगर बनाऊंगा तो बीमार हो जाऊंगा मैं. मुझे अस्पताल ले जाना पड़ेगा. मैं उस तरह की फिल्मों के लिए सही फिट नहीं हूं. जो इसके लिए फिट है वो इस तरह की फिल्में तो बना ही रहे है. मैं बनाऊंगा तो औंधे मुंह गिरूंगा और अभी तब जो कुछ भी मैंने ठीक ठाक फिल्में बनाई है उसके बाद आप खुद बोलेंगे की इस तरह की फिल्म क्यों बनाई. वो मेरी दुनिया है नहीं है. मेरी दुनिया बेहद ही साधारण है जहां पर मैं आप जैसे लोगों से मिलता हूं.

शूजित सरकार द्वारा निर्देशित इस फिल्म का सह-निर्माण रॉनी लाहिरी और शील कुमार ने किया है.

शूजित सरकार द्वारा निर्देशित इस फिल्म का सह-निर्माण रॉनी लाहिरी और शील कुमार ने किया है.

वरुण ने कहा है कि आप नहीं चाहते है इस फिल्म का ज्यादा प्रोमोशन हो. कितनी सच्चाई है इस बात में?

नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है. प्रोमोशन तो बिलकुल होना चाहिए लेकिन इस तरह का नहीं की मैं कहीं जाकर जंपिंग जैक की तरह नाचूं. इस तरह का प्रोमोशन मुझे समझ में नहीं आता है. अक्सर फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूटर बोलते हैं कि प्रोमोशन से 10 प्रतिशत का फायदा मिल जाता है और इस बात को मैं समझता हूं लेकिन ये बड़ा ही बोरिंग सा काम है. मैं ये थोड़े ही ये देखता हूं टीवी पर की एक्टर ने फलां फिल्म के लिए क्या बोला है. मैं ट्रेलर देखता हूं. हॉलीवुड की कौन सी फिल्म आप देखेंगे इसके लिए आप उस फिल्म का सबसे पहले ट्रेलर देखते है ना. हम लोग फिलहाल कुछ ज्यादा ही मार्केटिंग कर रहे हैं बॉलीवुड में. आजकल मार्केटिंग और प्रोमोशन का बजट फिल्मों के बनाने के बजट से ज्यादा होता है.

वरुण की किस फिल्म ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया है?

वरुण की मैंने कोई भी फिल्म आजतक नहीं देखी है.

तो जब आपने वरुण की कोई फिल्म देखी ही नहीं है तो आपने उनको क्यों बोला था की इस फिल्म के लिए उनको काफी कुछ अनलर्न करना पड़ेगा?

आप ये चीजें वरुण के व्यवहार में देख सकते हैं. शुरू में तो वो पूरी तरह से नार्मल था लेकिन जब उसने फिल्म साइन कर ली तब उसके बाद पता नहीं कहां से एक अलग तरह की ऊर्जा आ गई फिर मैंने कहा कि भाई इसे कम करो. वैसे वरुण में ढेर सारी ऊर्जा है.

आपने वरुण का चुनाव इस फिल्म के लिए कैसे किया?

यह महज एक इत्तेफाक़ था. वो एक दिन मेरे दफ्तर में आया था और उसकी आंखों में मुझे अपनी फिल्म का किरदार डैन नजर आया. जब वो मुझसे बात कर रहा था तब मुझे उसकी आंखों में एक तरह से सच्चाई नजर आई की वो मेरे साथ काम करना चाहता था.

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उसी दौरान अक्टूबर के स्क्रिप्ट पर भी काम चल रहा था और फिर आगे चलकर मुझे उसके अंदर फिल्म का किरदार नजर आने लगा. फिर ये बात मैंने जूही और फिल्म के निर्माता रॉनी लाहिरी को बताई की मैं वरुण के अंदर डैन को देखने लगा हूं. वैसे हमे इस रोल के लिए एक नए किरदार की तलाश थी लेकिन फिल्म देखने के बाद आपको लगेगा की वरुण इस रोल के लिए पूरी तरह से फिट था.

आप उन निर्देशकों की श्रेणी में आते हैं जो अपनी फिल्में खुद नहीं लिखते हैं. इसकी वजह क्या है?

मुझे इस बात को लेकर कोई परेशानी नहीं है और मैं लेखक नहीं हूं. अगर मैं लेखक होता तो अपनी फिल्में मैं जरूर लिखता लेकिन मैं हूं नहीं. मैं अक्सर अपनी फिल्मों के बारे में दूसरों से बात करता हूं और उनके साथ कहानी को लेकर जैम करता हूं.

अक्सर यह सुनने में आया है की आप अपने एक्टर्स को सेट पर हमेशा कुछ ना कुछ निर्देश देते रहते हैं? 

जी हां मैं अक्सर उनको ढेर सारी जानकारी देते रहता हूं. कई बार ऐसे भी मौके आए हैं जब एक्टर चिढ़ चिढ़े हो जाते हैं. मुझे याद है पीकू के सेट पर दीपिका ने मुझसे कहा था की सर अब बहुत हो गया अब बंद कर दो. मुझे अक्सर बोलते रहने की आदत है शूटिंग के दौरान. एक तरह से ज्ञान बांटता रहता हूं. ज्ञान देने की वजह यही है की उनका दिमाग उससे भरा रहे और यह भी सच है की एक्टर्स को ढेर सारी जानकारी की आवश्यकता रहती है ताकि उसे वो अपने अभिनय के दौरान प्रोसेस कर सकें और क्या भूमिका वो निभा रहे हैं उसको समझ सकें. ऐसा मैं ही नहीं जूही भी करती है सही अभिव्यक्ति पाने के लिए.

आपने अक्टूबर के ट्रेलर में थोड़ा बहुत एक किस्म का रहस्य रखा है. ज्यादा कुछ अपने ट्रेलर में नहीं बताया है. 

ये मैंने जान बूझकर कर किया है और मेरा उद्देश्य यही था की इसको लेकर लोगो के बीच जिज्ञासा बने. ऐसा मैं अपनी हर फिल्म के ट्रेलर में करता हूं. पिंक के लिए भी मैंने यही किया था. जो आपने ट्रेलर में देखा था फिल्म उससे काफी अलग थी. यह सच है की अक्टूबर में इसका लेवल थोड़ा ज्यादा है. अगर इसके दुष्प्रभाव होते है तो वो भी मुझे मंजूर है.

आप बच्चों के मुद्दो को लेकर काफी सजग रहते है और उनके रियलिटी टीवी शोज में उनके भाग लेने के मुद्दे पर आपने काफी कुछ बोला था. इन सबके पीछे वजह क्या है कि आप इतने मुखर हैं?

मैं इस बात को अभी भी बोलता हूं कि बच्चों के रियलिटी शोज को बैन कर देना चाहिए जब तक वो एक उम्र तक ना पहुंच जाए. शोज में जाए मौज़ मस्ती करें इतना तक ठीक है लेकिन जहां तक रेटिंग शोज की बात है जहां वो एक दूसरे के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करते हैं उनको पूरी तरह से बैन कर देना चाहिए.

आपको पता नहीं है कि इन सबका कितना बुरा असर उनके ऊपर पड़ता है और उनके ऊपर क्या गुजरती है. 12 साल की उम्र में उनको डायबिटीज़ और एंग्जायटी की बीमारी हो जाती है. इसके पीछे काफी हद तक इसके जिम्मेदार उनके माता पिता भी है. मैं इसके पूरी तरह से खिलाफ हूं. मैंने परीक्षा के प्रेशर को लेकर भी एक लघु फिल्म बनाई थी. परीक्षा के दौरान माता पिता अपने बच्चों से कुछ ज्यादा ही उम्मीद रखने लगते है और इसकी भनक बच्चों को भी लग जाती है. और इसी के बाद डिप्रेशन एंग्जायटी इत्यादि घर करना शुरू कर देती है.

आपकी दोनों बच्चियां आपके पदचिन्हों पर चलेंगी?

मेरी समझ से पहले उनको खुद को बनाना पड़ेगा. वो दोनों मुंबई में ही पढ़ाई करती थीं लेकिन बाद में कोलकाता शिफ्ट हो गई. इसके पीछे एक वजह यह थी जो मैंने उनको आगे चल कर बताया कि मैं उनको बॉलीवुड के माहौल में पलते बढ़ते नहीं देखना चाहता था.

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कोलकाता काफी बेहतर है और मेरा होम टाउन भी है. जब आप बॉलीवुड की इस दुनिया में रहते हैं तो इससे खुद को अलग करना काफी मुश्किल हो जाता है. मैं उनको इस दुनिया से दूर रखना चाहता था.

अगर उन्होंने बॉलीवुड ज्वाइन करने की मंशा जताई तो क्या आप उसका समर्थन करेंगे?

मैं उनका समर्थन नहीं करूंगा लेकिन अगर करना पड़ा तो मैं करूंगा.

शूजित आपकी फिल्मों का विषय वस्तु बाकी बॉलीवुड की फिल्मों से कोसों अलग रहता है. अब बॉलीवुड ऐसी दुनिया है जहां पर सभी चीजें कमर्शियल है. जब आप अपनी फिल्म के विषय का चुनाव करते है तो क्या आपको किसी बात का डर रहता है. 

मुझे सिर्फ अपनी पहली फिल्म के दौरान डर लगा था. मेरी पहली फिल्म यहां का विषयवस्तु कश्मीर था. कभी मौका मिले तो आप ये फिल्म देखिएगा आज भी यह फिल्म काफी वैलिड है. 2005 में जो मुम्बई में बाढ़ आई थी उसकी वजह से लोग उसे देख नहीं पाए थे. आज जब मैं उसे देखता हूं तो यही लगता है की मैंने काफी गलतियां की हैं. यह डर कमर्शियल प्रेशर की वजह से होता है और इसी वजह से लोगो की बातें सुनकर फिल्म में मैंने गाने डाल दिए थे और कई अलग मसाले डाल दिए थे.

लेकिन फिर मैंने बाद में उस गलती को दोहराया नहीं. उसके बाद मैंने यही निश्चय किया की अगर मैं कोई कहानी कहूंगा तो उसे अपनी मर्ज़ी से बोलूंगा. मुझे अब किसी भी प्रेशर से डर नहीं लगता है.

इसका मतलब तो यह भी लगाया जा सकता है की आपके अंदर खुद को लेकर काफी विश्वास आ गया है जबसे आपकी फिल्में चलने लगी है. मुझमे विश्वास नहीं आया है बल्कि मैं अब निडर हो गया हूं. यह खाना बनाने जैसा ही है. आप दिल लगा कर खाना पकायेंगे लेकिन कुछ को आपको खाना पसंद आएगा और कुछ को नहीं.

इसका मतलब यही है की आप अपनी फिल्मों के साथ कभी समझौता नहीं करेंगे. 

कोशिश मेरी यही होगी. लेकिन अक्टूबर के बारे में आपको मैं कहना चाहूंगा की अब तक जो भी गलतियां मैंने पीकू, पिंक, विकी डोनर या फिर मद्रास कैफे में मैंने की थी वो मैंने इस फिल्म में नहीं किया है.

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आखिरी में आपसे यही पूछूंगा कि शू बाईट की परेशानी क्या है? अमिताभ बच्चन को लेकर आपने यह फिल्म बनाई थी जो आपके करियर की दूसरी फिल्म थी  और ये अभी तक रिलीज नहीं हो पाई है. 

देखिए मुझे खुद नहीं पता है कि इस फिल्म को लेकर क्या हो रहा है. इतना मालूम है कि मुझे फिल्म बनाने को कहा गया था और इसकी ज़िम्मेदारी मुझे यूटीवी ने सौंपी थी. उस वक़्त यूटीवी डिज्नी नहीं था और ना ही डिज्नी फॉक्स था. लेकिन मौजूदा दौर में अब सभी एक साथ हो गए हैं और सभी अब एक ही कंपनी है.

जब फॉक्स और डिज्नी का विलय हुआ था उसके बाद ही बच्चन साहब ने ट्वीट किया था कि अब यह फिल्म रिलीज हो जानी चाहिए. लेकिन अभी भी कोई प्रगति इस बारे में नहीं हुई है. शायद एक बार आईपीएल खत्म होने के बाद डिज्नी और फॉक्स के लोगों से मिलेंगे और फिर देखेंगे की आगे क्या होता है. उस वक़्त ये पूरा मामला दोनों स्टूडियोज के बीच में था. यह फिल्म पूरी तरह से तैयार है और इसका विषयवस्तु काफी विश्वव्यापी है.

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