S M L

Exclusive : कपूर खानदान में बच्चे नहीं 'बाप' पैदा होते हैं – ऋषि कपूर

कपूर खानदान, देशभक्ति, पद्मश्री, पाकिस्तान से लेकर रणबीर कपूर के बारे में ऋषि कपूर के दिल की बात पढ़िए इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में

Updated On: Aug 27, 2018 07:00 AM IST

Abhishek Srivastava

0
Exclusive : कपूर खानदान में बच्चे नहीं 'बाप' पैदा होते हैं – ऋषि कपूर

ऋषि कपूर इन दिनों अपनी बेबाक राय और शानदार एक्टिंग के लिए बॉलीवुड में बड़ी सुर्खियां बटोर रहे हैं. देश में इन दिनों चल रहे माहौल से लेकर पद्मश्री तक और हाल ही में रिलीज हुई उनकी फिल्म मुल्क, कपूर खानदान, पाकिस्तान, देशभक्ति और रणबीर कपूर के बारे में हमने उनसे खुलकर बात की. आप भी पढ़िए उनके इंटरव्यू की कुछ जानदार बातें

क्या नियो नेशनेलिज्म इस देश के लिए अच्छा है?

देश के लिए फख्र महसूस करना गर्व की बात है. मेरी हाल ही में रिलीज हुई फिल्म का जो टाइटिल है, मुल्क, वो एक व्यक्तिपरक टाइटिल है. इसके मायने कई हैं और यह आपके गर्व और जागरूकता के बारे में भी बात करती है क्योंकि एक राष्ट्र उसके लोगों से ही बनता है. आप खेल कूद की दुनिया में भी देख सकते हैं कि देशों के राष्ट्रगान को खेल शुरू होने के पहले बजाया जाता है. ऐसा हमें पहले देखने को नहीं मिलता था. अभी हाल में ही फुटबॉल वर्ल्ड कप के दौरान जब क्रोएशिया दूसरे स्थान पर आई थी तो इसके बावजूद वहां के लोगों ने खासा जश्न मनाया.

ऋषि कपूर ने हाल ही में फिल्म मुल्क में अपने शानदार अभिनय से दर्शकों का दिल जीता

ऋषि कपूर ने हाल ही में फिल्म मुल्क में अपने शानदार अभिनय से दर्शकों का दिल जीता

लेकिन क्या यह दुनिया के लिए सही है

क्यों नहीं? आपको अपने देश के ऊपर नाज़ होना चाहिए.

लेकिन चरम राष्ट्रवाद को हम उचित नहीं ठहरा सकते है.  

क्यों?

हिटलर का जर्मनी चरम पंथी राष्ट्रवाद का एक शानदार उदाहरण है. 

वो फासिस्ट वादी दृष्टिकोण था. आपको अपने देश पर फख्र होना चाहिए और उन लोगों पर भी जिनके बलिदान की वजह से आज हमें वो सारी सहूलियतें मिल रही हैं. आपको फख्र होना चाहिए कि आप एक जनतंत्र में रह रहे हैं जहां पर मुझे कुछ भी कहने की आज़ादी है. मैं ऐसे देश में रहता हूं जहां पर मैं एक दायरे रहकर में किसी भी तरह की फिल्म बना सकता हूं. मैंने अपनी जिंदगी में देखा है कि पूर्वी और पश्चिम बर्लिन ने अपनी दीवार गिरा दी और एक हो गए.

साउथ अफ्रीका में रंगभेद खत्म हो गया, उत्तर कोरिया और अमेरिका एक ही टेबल पर बैठ गए न्यूक्लियर डील के सिलसिले में. इसी तरह से क्या हम पाकिस्तान के साथ कुछ नहीं कर सकते है 71 सालों के बाद. हम अभी भी कश्मीर और अपने मजहबों पर लड़ रहे हैं. ये बेहद ही बचकाना है. आज जब सारी दुनिया अपने पुराने झगड़ों को निपटाने में लगी है तो उसके बावजूद भी हम कश्मीर के पीछे लगे हुए हैं. इसको कैसे भी सुलझाना पड़ेगा. आप शिमला एग्रीमेंट इत्यादि की बात करते हैं लेकिन हकीकत तो यही है कि आपको मसला सुलझाना ही नहीं है.

मेरे माता पिता का जन्म ब्रिटिश भारत में हुआ था और उस वक्त पाकिस्तान नहीं बना था. मेरे दादा 1926 में पाकिस्तान से मुंबई आए थे और यहां से फिर कोलकाता गए. मुझे इस बात का गर्व है कि मेरे पुरखों का जन्म वहां हुआ था लेकिन अब मैं वहां नहीं जा सकता हूं और वो देश नहीं देख सकता हूं. मेरे जैसे इंसान के लिए दो पीढ़ी निकल चुकी हैं और ये बड़े अफसोस की बात है कि स्वाधीन होने के 71 साल के बाद भी हमें वही परेशानी सता रही है.

कुछ हो पायेगा क्या इस बात की आशा है आपको

कब से आशा लगाए बैठे हैं. कब से. कुछ तो हो. इतनी सारी राजनीतिक पार्टियां आईं और चली गईं, इतनी सारी सरकारें आईं और चली गईं लेकिन मूल मसला वहीं का वहीं अटका हुआ है. जब हम एक दूसरे से मिलते हैं तो ऐसा लगता है जैसे दो बिछड़े परिवार मिल रहे हैं. चाहे वो खाने का तरीका हो या फिर कपड़े पहने का सलीका - ये सब कुछ एक जैसा ही है. लेकिन जब राजनीतिक बातें होती है तब तलवारें तन जाती हैं.  इस परेशानी का निपटारा कब होगा?

आप पिछली दफा पाकिस्तान कब गए थे

बहुत साल पहले 1990 में और ये मैं हिना फिल्म के रिलीज के पहले की बात कर रहा हूं. हमने एक दिन के लिए फिल्म की शूटिंग इस्लामाबाद में की थी और जो भी चार-पांच दिन मैं वहां रुका था यही लगा कि मैं हिंदुस्तान का बादशाह हूं क्योंकि मेरी इतनी आवभगत हुई थी. यह बड़े दुःख की बात है कि हम अपनी परेशानियों को सुलझा नहीं सकते है.

कभी आपने वापस पाकिस्तान जाने की सोची?

नहीं क्योंकि उसकी जरुरत नहीं पड़ी. मैंने पेशावर का वो घर देखा है जहां पर मेरे पिता का जन्म हुआ था और जहां मेरे दादा और परदादा रहते थे.  जब मैं पिछली बार पाकिस्तान गया था तब किसी ने मुझे बताया था जिनका मैं नाम नहीं लूंगा कि ये परेशानियां हमारे पंडितों और उनके मौलवियों की वजह से कभी भी दूर नहीं हो सकती है. सब कुछ धर्म पर आ कर खत्म हो जाता है और यह अपने आप में एक बहुत बड़ा धंधा है. एक दूसरे से नफरत करना धंधा है और इससे दुकान चलती रहती है. इस साल सितम्बर में मैं 66 का हो जाऊंगा और आज भी वहां मैं नहीं जा सकता हूं अपने बच्चों को उनके दादा का घर दिखाने.

आपकी फिल्मों की दूसरी पारी काफी शानदार रही है. मैं आपके जीवनी का जिक्र कर रहा हूं. क्या दूसरी किताब की उम्मीद हम आप से रख सकते है?

लोग अक्सर मुझे कहते हैं कि मैंने अपनी जीवनी दिल से लिखी है लेकिन साथ ही साथ अब मुझे ये नहीं पता है कि आगे क्या लिखना है. मैं ऐसा कुछ भी नहीं कहना चाहता हूं जिसमे लोगों की रूचि ना हो. अब मेरे लिए ये जरुरी है कि अपने करियर को और सवारुं. मैं खुशनसीब हूं और ईश्वर की मेरे ऊपर मेहरबानी है कि इस उम्र में भी मुझे मुख्य किरदार वाले रोल मिल रहे हैं. सबको ये नसीब नहीं होता है.

आप थोड़े विनम्र हो रहे है. सच्चाई यही है कि आप शानदार कलाकार हैं

शानदार कलाकार होने का ये मतलब नहीं है की आपके साथ फिल्म बनाई जाएगी. फिल्मों का एक अलग अर्थशास्त्र होता है. पिछले कुछ सालों में मल्टीप्लेक्सेज की वजह से सिनेमा का स्वरूप बदला है. अब वो 102 नॉट आउट जैसी फिल्म भी देखना चाहते हैं. अगर ये फिल्म किसी और जमाने में आई होती तो इसके बॉक्स ऑफिस पर बचने के बड़े ही कम चान्सेस होते.

102 not out

इस फिल्म में नौजवान कलाकार, गाना, आइटम नंबर, रोमांस - कुछ भी नहीं था. अगर आज आपको फिल्म बनानी है तो किरदारों का उसी उम्र में दिखना काफी अहम है. मुझे याद है जब हबीब फैसल मेरे पास दो दूनी चार के नरेशन के लिए आए थे और उन्होंने कहा था कि सर, मैं चाहता हूं कि आप मुख्य भूमिका इस फिल्म मे निभाएं, तब मैंने उनको यही कहा था कि आप पागल तो नहीं हैं,  मैं कोई बिकाऊ कलाकार नहीं हूं, आप अपनी फिल्म कैसे बेचेंगे और जनता को सिनेमा हॉल तक कैसे लेकर आएंगे. लेकिन जब उन्होंने ये कहा कि मेरी फिल्म का सितारा मेरी फिल्म की कहानी है तब मेरी आंखें खुल गई थी. आजकल काफी अलग तरह की फिल्में बनने लगी हैं और वो फिल्में काफी अच्छा कर रही हैं और वैसी कई फिल्मों में रणबीर काम करता है. कई बार ऐसी फिल्मों की वजह से रणबीर औंधे मुंह भी गिरा है.

लेकिन बर्फी उसमें अपवाद थी 

जी हां. जब बर्फी बन रही थी तब मेरे भाइयों और दोस्तों ने कहा था कि रणबीर को क्या हो गया है? उसको अच्छी खासी रोमांटिक फिल्में करनी चाहिए. एक फिल्म में मूक-बघिर का किरदार निभा कर क्या वो आर्ट फिल्मों का हीरो बनना चाहता है?

मैं भी उसकी फिल्मों की वजह से खुद को असुरक्षित महसूस करता था. मैं अपने बेटे के करियर में दखल नहीं देता हूं लेकिन मैं चिंतित जरूर था. मेरा ये मानना था कि रणबीर को इस तरह की फिल्मों में काम नहीं करना चाहिए लेकिन उसने सभी को गलत साबित किया. जब वो संजू के लिए काम कर रहा था तो लोगों ने यही कहा था कि ये पागल हो गया है.

क्या पिक्चर होगी, क्या कहानी होगी, क्या एंडिंग होगी?  सभी इसको लेकर परेशान थे. लेकिन अंत में उसने एक बार फिर सभी को गलत साबित कर दिया. उसने संजू के साथ अगर खुद को सही साबित किया है तो जग्गा जासूस के साथ खुद को गलत भी साबित किया है. बेहद औसत दर्जे की फिल्म थी वो.

आपने अपनी किताब में एक लाइन लिखी है जहां पर आप कहते हैं कि आपका गुरुर आपके लिए एक बड़ी परेशानी है और इसके ऊपर आप कभी भी फ़तह नहीं कर पाए हैं. क्या आप बता सकते है कि आप किस गुरुर की बात कर रहे है?

अपने काम को लेकर. मुझे अपने काम से बेहद लगाव है. मुझे अपने काम को लेकर जुनून है और मुझे ये लगता है कि जो मैं कर रहा हूं वो सही कर रहा हूं. आपको मुझे सिर्फ फाइन ट्यून करना है. गुरुर गलत शब्द होगा बल्कि मुझे यह कहना चाहिए था की मुझे अपने काम में पूरा विश्वास है. मेरे विश्वास को हमेशा गुरुर समझा जाता है.

संजू देखी आपने?

जी हां.

अगर फिल्म में कोई एक चीज़ आप बदलना चाहेंगे तो वो क्या होगी?

मुझे नहीं लगता है की इस फिल्म में कोई भी चीज बदली जा सकती है और शायद इसीलिए यह इतनी बड़ी सफल फिल्म साबित हुई है. ये फिल्म के नॉन हॉलिडे वीकेंड पर रिलीज़ हुई थी और ये एक ऐसी फिल्म है जिसमें ना हीरो है और ना ही कोई हीरोइन या डांस या म्यूजिक या फिर कोई विलन. मैंने रणबीर की कभी तारीफ नहीं की है लेकिन मैं इस बात को कहूंगा कि वो फिल्म को अपने कंधे पर लेकर चला है जिसमें विक्की कौशल और परेश रावल ने उसका शानदार साथ दिया है.

Sanju

कुछ समय पहले मैं एक पत्रकार से बात कर रहा था कि फिल्म में संजय दत्त का नेगेटिव साइड नहीं दिखाया गया है तो मैंने उनसे यही कहा कि हर फिल्म का एक ग्राफ होता है और आप ये कहने वाले कोई नहीं होते कि फिल्म में आपने इन चीज़ों को क्यों छोड़ दिया. अगर ऐसा होता तो फिल्म 24 घंटे चलती रहती.

मेरा ऐसा मानना है की इतिहास आपको एक ऐसे कलाकार के रूप में याद करेगा जिसको उतना सम्मान नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था. 

ये सुन कर मेरे कान पाक गए हैं. इसके पीछे की वजह ये हो सकती है की मेरा नाम चिंटू है और जब फिल्म जगत में आया था तब महज 21 साल का था. उस वक्त मैं गुलाबी गाल वाला मोटा लड़का हुआ करता था और शायद इसी वजह से मुझे किसी ने सीरियस फिल्में नहीं दी. अपने करियर के शुरू के 25 साल तक तो मैं सिर्फ गाने ही गा रहा था और पेड़ों के इर्द गिर्द नाच रहा था. काम तो मुझे अब मिलना शुरू हुआ है.

लेकिन पहले क्या हुआ था इस बात का मुझे कोई अफसोस नहीं है. उस दौर को मैंने काफी एन्जॉय किया था और भले ही मैं उस वक्त देश का सर्वोच्च सितारा नहीं था लेकिन मेरा नाम टॉप के पांच कलाकारों में जरुर शामिल था जिनकी फिल्में बिकती थी. नीतू ने तब मुझसे कहा था की मैं थकने लगा हूं. मैं सिर्फ जर्सी पहन कर पैसे बना रहा था और मुझे काम की संतुष्टि उस दौरान नहीं मिल रही थी. जब नौजवान अभिनेता मुझसे यही बात कहते हैं तो मैं उनको यही कहता हूं की 2018 में भी आप मुझे पसंद करते हो तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है मेरे लिए.

उदाहरण के तौर पर आपको पद्मश्री नहीं दिया गया है.

शम्मी कपूर को कभी नहीं मिला. किशोर कुमार को कभी नहीं मिला.

सर, मैं आपकी बात कर रहा हूं.

क्योंकि आपको इसको पाने के लिए कुछ एक तार हिलाने पड़ेंगे. ये मिलने के लिए आपको ताकत का सहारा चाहिए. नेशनल अवार्ड के लिए भी यही होता है. मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहूंगा लेकिन ये पूरी दुनिया को पता है कि अगर आप की पहचान सही लोगों से है तभी सरकार आपको सम्मान देगी.

किशोर कुमार और शम्मी कपूर को नहीं मिला था, और आपको क्या चाहिए. क्या फिल्म जगत में इन दोनों का योगदान कम था. भारत सरकार को इसके लिए शर्म आनी चाहिए जिनकी सरकार उस वक़्त थी.

सारे खान और मुझसे 20 साल जूनियर कलाकारों को सम्मानित किया जा चुका है. क्या अपने ज़माने में हमने उतना काम नहीं किया था? मैं चाहूंगा कि आप ये सभी चीज़ें लिखे. यह सब पाने के लिए आपको तारों को हिलाना पड़ेगा और मैं इसमें विश्वास नहीं करता हूं. मैंने अपने जीवन में एक बार अवार्ड ख़रीदा था और आजतक उसको लेकर पछता रहा हूं.

मैं उस वक्त बच्चा था और मुझे किसी भी बात की जानकारी नहीं थी. मैं भूल गया हूं उस किस्से को लेकिन मैं ईमानदार हूं कि अपनी गलती मानता हूं. और उन अवार्ड वालों ने मुझसे पैसे ले भी लिए थे. इस बात को लेकर उनको शर्म भी नहीं आयी. अभी भी मौका है मेरे पैसे लौटा दो (हंसते हुए).

आप किसको बेहतर अभिनेता मानते हैं - रणबीर कपूर या ऋषि कपूर. 

जिस तरह का काम रणबीर ने किया है और जिस तरह से उसकी प्रशंसा होती है उसको देखकर यही लगता है की वो मुझसे आगे है. ये ऐसे लड़के हैं जो अपनी मां के पेट से एक्टिंग सीख कर आते हैं. मेरे एक अजीज मित्र है जिनके पिता का अब देहांत हो चुका है - इन्दर राज आनंद. उन्होंने आर के फिल्म्स के लिए कई कहानियां लिखी थीं और दादा जी के लिए नाटक भी. वो अक्सर कहा करते थे की कपूर खानदान में बच्चे पैदा नहीं होते है, कपूर खानदान में बाप पैदा होते हैं. मैं इस कथनी को लेकर डींगे नहीं मारूंगा लेकिन इसको सुनकर गर्व महसूस करता हूं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi