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पर्यावरण सुरक्षा के लिए दिव्या दत्ता ने लोगों से किया आग्रह, लिखा ये ओपन लैटर

दिव्या ने आज के हमारे पर्यावरण की हालत पर चिंता जताई है

Akash Jaiswal Updated On: Jun 13, 2018 08:38 PM IST

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पर्यावरण सुरक्षा के लिए दिव्या दत्ता ने लोगों से किया आग्रह, लिखा ये ओपन लैटर

दिव्या दत्ता ने आज हमारे दूषित होते पर्यावरण को लेकर गहरी चिंता जताई है. उन्होंने इस विषय पर एक खुला खत लिखकर पर्यावरण बचाने के साथ ही इसको लेकर सभी से आग्रह किया है कि वो इसे सुरक्षित रखने में योगदान दें.

ये रहा दिव्या का लैटर:

“पर्यावरण दिवस के पहले मुझे कुछ पत्रकारों ने मुझे मेरे स्टेटमेंट के लिए कॉल किया. मैं सोचने लगी कि मेरा एक स्टेटमेंट पर्यावरण के लिए भला क्या काम आ सकता है? लोग इसे सुनेंगे पढ़ेंगे और फिर अपनी जिंदगी के साथ आगे बढ़ जाएंगे. करने के लिए ये सबसे आसान चीजों में से एक है. लेकिन क्या ये कुछ मदद करेगा? एक दिन की खबर बस.

मैं अपनी बेटी को बीच पर वॉक के लिए लेकर गई. ये मेरे ब्रेक का दिन था और इन दिनों में सुबह अपनी बेटी के साथ बीच की ठंडी हवा में वॉक करने से बेहतर क्या हो सकता था? लेकिन जो मैंने देखा उससे मैं हैरान रह गई. हर तरफ प्लास्टिक का अंबार लगा हुआ था और चलने के लिए शायद की पर्याप्त जगह थी. तूफानी रात के बाद समुद्र ने सभी प्लाटिक और कचरे को बाहर उलट दिया था. मैं बस चिंतित होकर देखने लगी. मेरी बेटी भी पीछे हट गई क्योंकि चलने के लिए जगह ही नहीं थी. वहां कुछ आवारा कुत्तों के अलावा कोई नहीं था. सभी लोग बीच की हालत देखकर लौट गए होंगे. क्या हम ये करते हैं? और ये काम उन लोगों पर छोड़ देते हैं जिसे इसका काम सौंपा गया है. जब हम इन कचरे के ढेर को देखते हैं तो क्या हम सोचते हैं कि इस कचरे में एक प्लास्टिक हमारा भी फेंका हुआ होगा? क्या मैंने भी इसे दूषित करने में योगदान दिया है? तो अगर मैं बीच को साफ नहीं कर सकता तो कम से कम इतना तो कर ही सकता हूं कि यहां कचरा नहीं फेंकू.

मैंने कुछ एनजीओ को जॉइन किया और बीच पर सफाई करने गई. लेकिन तभी मन में ये ख्याल आया कि आज तो हमने इसे साफ कर दिया है लेकिन लोग फिर कचरा फेकेंगे. उन्हें कौन रोकेगा?

लोगों को इसके सफाई की परवाह नहीं है कि क्योंकि उनके लिए उनके घर के आसपास की सफाई ही मायने रखती है. ऐसा क्या है कि लोग इन सब पर चिंता नहीं करते? कभी-कभी मैं सोचती हूं कि आप अपने ही शहर, देश के साथ इस तरह से बर्ताव करते हैं. ये शिक्षा की कमी है या फिर सिविक सेंस की?

एक अजीब तरह के दुख ने मुझे झंझोड़ दिया. हम अपने पर्यावरण के साथ क्या कर रहे हैं. सब चीज कमर्शियल में तब्दील हो रही है. पेड़ काट दिए जा रहे हैं, नए निर्माण किया जा रहे हैं. हम अपनी हरी भरी जमीन को दूर कर रहे हैं और फ्लोरा फौना को मिटा रहे हैं. अब हमें बस केमिकल भरे फल और सब्जियां मिल रही है.

कुदरत हमसे दूर जा रहा है और हम इससे मुहं फेर कर जा रहे हैं ये सोचकर कि ये सब ठीक है. जिंदगी तो चल रही है ना. कभी सोचती हूं कि कुदरत भी कब तक हमें खुद को तकलीफ पहुंचाने देता रहेगा. ये सभी वार्निंग के संकेत हैं जिसे हम नजरअंदाज कर रहे हैं. जो चीजें कुदरत की हैं उसे उसके पास ही छोड़ देना चाहिए. वरना ये अपना कहर बर्पाएगा.

अब मैंने सभी को अपना स्टेटमेंट दे दिया है और सभी को पर्यावरण दिवस के मौके पर बधाई देना चाहूंगी. समुद्री किनारों और वहां पड़े प्लास्टिक पर मेरी नजर है और अब मुझे साहिर साहब का ये शेर याद आ रहा है. सोचिए अगर खुद पर्यावरण कहता, “दुनिया ने तजुर्बात ओ हवादिस की शक्ल में, जो कुछ मुझे दिया, लुटा रहा हूं मैं.”

 

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