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दीप्ति नवल जन्मदिन विशेष: 'अपनी पहचान को लेकर कभी भी दबाव में नहीं थी'

दीप्ति ऐसे मकाम पर हैं जहां वो बहुत ही खुलकर जिंदगी जी रही हैं

Updated On: Feb 03, 2017 03:31 PM IST

Swati Arjun Swati Arjun
स्वतंत्र पत्रकार

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दीप्ति नवल जन्मदिन विशेष: 'अपनी पहचान को लेकर कभी भी दबाव में नहीं थी'

कुछ दिनों पहले दीप्ति नवल ने अपने फेसबुक पेज पर जानकारी दी थी कि वे 22 जनवरी को अपने एक प्ले के सिलसिले में दिल्ली आ रही हैं.

80 के दशक में होश संभालते हुए मैं भी उनकी फिल्मों की फैन रही. लेकिन ये जानकर मुझे भी बहुत आश्चर्य हुआ कि अपने 35 साल के लंबे करियर में दीप्ति नवल ने सिर्फ 70 फिल्मों में काम किया है.

इनमें हिंदी की आर्ट फिल्मों से लेकर, विशुद्ध बॉलीवुड और हॉलीवुड की फिल्में भी शामिल हैं. जाहिर सी बात है कि ये इत्तेफाक नहीं हो सकता है.

और जैसे ही मुझे ये खबर मिली कि वो दिल्ली आ रही हैं मैंने उन्हें एक मेल किया कि मैं उनसे दिल्ली में मिलना चाहती हूं.

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साल 1980 की दीप्ति नवल की हिमाचल में तस्वीर

दो दिनों बाद उनका जवाब आया कि, स्वाति इस समय मैं यूएस में हूं और 19 तारीख को मुंबई लौट रही हूं तुम मुझे तब फोन करना.

मैं ये मौका किसी भी तरह से चूकना नहीं चाहती थी.

64 की उम्र में गायिकी का आगाज़

हमारी बातचीत की शुरुआत हुई हाल ही में पंजाबी भाषा में बनी शॉर्ट फिल्म ‘आई एम नॉट टॉकिंग टू यू’ के थीम सॉन्ग ‘उडारिया नाल यारिया’ गाने से. दीप्ति ने इस गाने से अपने सिंगिंग करियर की शुरुआत की है.

मैंने उनसे इस गाने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि 'इस गाने की नायिका एक पतंग से अपनी यारी की बातें करती है.' दीप्ति कहती हैं, 'इस गाने ने उनके भीतर के जिंदादिल इंसान को बाहर ला दिया था, जो दुनिया से हंसते हुए आंखें मिला सकती है.’

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दीप्ति नवल अपने जन्मदिन पर ओम पुरी के साथ

दीप्ति आगे कहती है, ‘ये गाना बेड़ियों में जकड़ी औरतों को अपने बंधन तोड़कर आजाद होने के लिए प्रेरित करता है.’

दीप्ति ने इससे पहले अपनी किताब ‘लम्हा-लम्हा’ से कुछ कविताओं का पाठ किया है, लेकिन प्लेबैक सिंगिंग में उन्होंने पहली बार हाथ आजमाया है.

दीप्ति नवल ने बचपन में 5वीं से 10वीं तक की पढ़ाई के दौरान संगीत की शिक्षा ली थी. लेकिन बाद में अमेरिका चले जाने के कारण वो छूट गया. उन्हें रागों की पूरी जानकारी है और वे रियाज भी करती हैं.

वो कहती हैं कि इस गाने को वो खुद को अपने 65वें जन्मदिन में दिया गिफ्ट मानती हैं.

रोमांस से भरा जीवन

वो कहती हैं, ‘जब मैं बड़ी हो रही थी तो मेरे जेहन में जिंदगी को लेकर जो सोच थी वो हिंदी फिल्मों के रोमांटिक गानों की तरह होता है, जिसमें सिर्फ प्यार और रोमांस भरा हो. लेकिन जब जिंदगी आपको कुछ और दिन दिखाती है तो आपको थोड़ी हैरत होती है...फिर भी आपका साथ देने के लिए कोई न कोई गाना जरुर मौजूद होता है.’

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हिमाचल के नग्गर गांव में दीप्ति अपने कॉटेज के बाहर

दीप्ति उस दौर का प्रतिनिधित्व करती हैं, जब फिल्मों में शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल और वो खुद नए दौर की लिबरेटेड वुमन की तस्वीर पर्दे पर बयां करती थीं.

जिस बात को कहने के लिए बाकी दोनों अदाकारों को बहुत सारा गुस्सा, नाराजगी, विद्रोह और आक्रामकता दिखानी पड़ती थी वही बात दीप्ति नवल बड़ी सहजता से पर्दे पर कह जातीं थीं.

मैंने जब दीप्ति से पूछा कि आखिर ये कैसे मुमकिन हुआ तो उन्होंने कहा, ‘मैं कभी खुद को लेकर भ्रम में नहीं थी, शायद इसकी बहुत बड़ी वजह ये थी कि, मैं न्यूयॉर्क से पढ़ाई करके लौटी थी और मेरा सिर मेरे कंधों के उपर था. मेरे मन में इस बात को लेकर कोई शंका नहीं थी कि मुझे किस तरह की फिल्म नहीं करनी है और किस तरह की फिल्म करनी है.’

वे आगे कहती हैं, ‘मैंने ज़िंदगी अपने शर्तों पर जी है. मैं किसी तरह की झंडाबाजी में यकीन नहीं करती हूं, जितना मेरे भीतर एक औरत होने की खुशी है उतना ही मैं अपने अधिकारों को लेकर सजग हूँ.’

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अपनी हालिया रिलीज फिल्म लायन के प्रीमियर पर साथी कलाकारों के साथ

दीप्ति नवल ने एक दृढ़ता और निरंतरता के साथ अपना जीवन जिया है वो कम लोग कर पाते हैं. आखिर इसकी ऊर्जा उन्हें कहां से मिलती है. इसके जवाब में उन्होंने कहा- ‘मुझे कभी भी अपनी पहचान को लेकर शर्मिंदा नहीं होना पड़ा  है और मुझे हमेशा से उसका इल्म भी था.’

माता-पिता का साथ

उन्होंने कहा, ‘मेरे पिता ने हमें हमेशा ये सिखाया कि, ‘अपने मन में कभी इस बात को लेकर बोझ मत रखना कि तुम लड़की हो तो ये नहीं कर सकती हो, शायद यहीं से मुझे मेरा रास्ता मिल गया था.’

दीप्ति कहती हैं कि 10-15 साल पहले उन्हें अचानक ये ख्याल आया कि उनके प्रशंसक आज भी उन्हें ‘मिस चमको’ से ज्यादा जानते ही नहीं हैं. तब उन्हें लगा कि वे लोगों को असली दीप्ति नवल से मिलवाना चाहती हैं.

तभी से उन्होंने पेंटिंग करना, कविताएं लिखना, अपनी कविता का पाठ करना, नाटक में एक्टिंग करना और फिर लिखना शुरू किया, ताकि वे उन्हें थोड़ा जान सके.

वे कहती हैं, आज वे ऐसे मुकाम पर हैं जहां बहुत ही खुलकर जिंदगी जी रही हैं. उनके मन में उल्लास है और सोच में इस बात का यकीं कि जो जीवन उन्होंने अब तक जीया है, वो पर्दे के भीतर ही नहीं बाहर भी एक नजीर पेश करता है.

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