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पुण्यतिथि विशेष: फिल्मी दुनिया का 'सिकंदर'- पृथ्वीराज कपूर

पृथ्वीराज कपूर को अपने जीवनकाल में ही उनकी इस कला साधना के लिए दादा साहेब फाल्के अवार्ड जैसे कई सम्मान भी मिले.

Raajkumar Keswani Updated On: May 29, 2017 12:08 PM IST

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पुण्यतिथि विशेष: फिल्मी दुनिया का 'सिकंदर'- पृथ्वीराज कपूर

अजब इंसान था जो इस पृथ्वी पर आया तो नाम भी पृथ्वी का ही पाया - पृथ्वीराज कपूर....और जो वो गया तो जमाना यह पुकार उठा कि 'सिकंदर' चला गया.

हिंदुस्तानी सिनेमा जब बेआवाज़ी के दौर से गुजर रही थी तो उस वक़्त पेशावर और लायलपुर में स्टेज पर शेर की मानिंद बुलंद आवाज में एक कलाकार जो तब पृथ्वीनाथ और बाद में पृथ्वीराज कहलाया अपनी अदाकारी के जौहर दिखा रहा था.

एक कदम और आगे बढ़ा तो सीधा उसी बेज़ुबान सिनेमा (Silent Cinema) की दहलीज पर पड़ा मिला.

3 नवम्बर 1906 को समुंदरी, लायलपुर- पंजाब (अब पाकिस्तान) में उनका जन्म हुआ. पिता बशेश्वरनाथ कपूर पेशावर में पुलिस में सब-इंस्पेक्टर थे तो दादा दीवान केशोमल समुंदरी में तहसीलदार के ओहदे पर थे.

अभी पृथ्वी की उम्र तीन साल ही थी कि मां का साया सर से उठ गया. दादाजी ने उसे अपनी सरपरस्ती में लेकर समुंदरी के ही एक स्कूल में दखिला करवा दिया. शुरूआती तालीम के बाद पृथ्वी को लायलपुर के खालसा हाई स्कूल में भर्ती करवा दिया गया.

काबिले जिक्र है कि उस वक्त स्कूल के हेडमास्टर हुआ करते थे मास्टर तारा सिंह जो देश की आजादी के बाद सिखों के बड़े नेता के तौर पर उभरे और अलग पंजाबी सूबे की मांग को लेकर आंदोलन भी चलाया.

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अविभाजित पाकिस्तान में जन्म

आज का पंजाब प्रांत इन्हीं मास्टर तारा सिंह और संत फतेह सिंह के आंदोलन के बाद ही वजूद में आया था. पृथ्वी अपने स्कूल के समय ही दोस्तों में बेहद लोकप्रिय थे. तराशा हुआ खूबसूरत चेहरा और उतनी ही मर्दाना शख्सियत. उस पर खूबी यह कि पढ़ाई में जितने होशियार उतने ही खेल-कूद में माहिर. मैट्रिक का इम्तिहान अव्वल दर्जे में पास किया तो खेल के लिए भी ट्राफीज मिलती रहीं.

लेकिन पृथ्वीराज को इस कम-उम्री में भी अगर किसी चीज़ से इश्क था तो वह था नाटक से. स्कूल के नाटकों से निकलकर रंगमंच पर अभिनय को आतुर थे कि परिवार के दबाव में शादी करनी पड़ी. 13 दिसम्बर 1923 को जब उनकी शादी हुई तब उनकी उम्र महज 17 साल की थी और उनकी पत्नी रामसरनी मेहरा की उम्र थी 15 बरस की. शादी के अगले साल की 14 तारीख को बेटा भी आ गया जिसका नाम रखा गया रणबीर राज.

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शादी के बाद भी पढ़ाई जारी रही. दादाजी का निधन हो गया तो पिता के पास पेशावर पहुंचे और वहां एडवर्ड कॉलेज में दाखिला ले लिया. इसी कॉलेज में उनकी मुलाकात हुई एक ऐसे इंसान से जिसने पृथ्वी की पूरी जिंदगी की राह ही बदल दी. इस शख्स का नाम था जय दयाल जो कॉलेज के ड्रामेटिक्स के इंचार्ज थे. उन्होंने पृथ्वी को इस काम की गंभीरता और गहराई से वाकिफ कराया, उन्हें तरह-तरह के रोल दिए.

कल्पना कीजिए कि उस कमसिनी के दौर में उन्होंने लड़कियों के रोल भी निभाए. जान मिलिंगटन सिंज के प्रसिद्ध नाटक 'राईडर्स टु द सी' में मुख्य पात्र मौरिया की छोटी बेटी नोरा वाले रोल के लिए उनकी खूब वाह-वाह हुई.

1927 में बी.ए. की डिग्री हासिल करने के बाद उन्हें कानून की पढ़ाई के लिए लॉ कॉलेज में दाखिला दिलाया गया लेकिन उनका दिल तो कहीं और जा लगा था. सो एक दिन किसी तरह 200 रुपए के जुगाड़ जमाकर पृथ्वीनाथ बम्बई जा पहुंचे.

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फिल्म कल-आज और कल में राज और रंधीर कपूर के साथ पृथ्वीराज कपूर

धोबीघाट के नजदीक रहे

यह 1929 का साल था. बम्बई में पहले ही दिन धोबी तालाब के नजदीक एक छोटे से लॉज में किराए पर एक कमरा लिया और निकल पड़े काम की तलाश में फिल्म स्टूडियोज की तरफ.

कोहिनूर, कृष्णा जैसे स्टूडियो से तो बाहर से ही निकाल दिए गए लेकिन एक दिन इंपीरियल फिल्म कंपनी की मुखिया आर्देशिर ईरानी से मुलाकात की जुगत जम गई और फौरन ही एक फिल्म में छोटा सा रोल भी मिल गया. इस फिल्म का नाम था, 'चैलेंज', जिसमें वो एक अरब के भेष में दिखाई दिए थे.

इस फिल्म की शूटिंग के बाद वे रात में चौपाटी पर घूम रहे थे और खुशी में झूम रहे थे कि अब वो 'फिल्म एक्टर' हो गए हैं. फौरन ही यह खुशखबरी उन्होंने बीवी और दीगर दोस्तों को खत लिखकर दे दी.

पृथ्वीनाथ की शख्सियत से आर्देशिर ईरानी इतने मुतासिर हुए कि उन्होंने तीन फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाओं के बाद उन्हें सीधे हीरो का रोल ही दे दिया. फिल्म का नाम था 'सिनेमा गर्ल' (1930) और उनकी हिरोइन थी अर्मलीन. इसी फिल्म के साथ पृथ्वीनाथ का नाम हो गया पृथ्वीराज.

इसके बाद जो सिलसिला चला तो चलता ही चला गया. 1931 में जब आर्देशिर ईरानी ने हिंदुस्तान की पहली बोलती फिल्म बनाई 'आलमआरा' तो उसमें भी पृथ्वीराज को एक प्रमुख भूमिका दी गई. इंपीरियल के साथ दो और फिल्में करने के बाद वे कलकत्ता की ओर चल पड़े.

कलकता में न्यू थियेटर्स में उन्हें हाथों-हाथ लेकर काम दिया. देवकी बोस और नितिन बोस जैसे नामवर निर्देशकों के साथ 'राजरानी मीरा' (33), 'सीता' (34),'डाकू मंसूर' (34) और 'विद्यापति' (37) जैसी फिल्मों में अपने अभिनय की धाक जमाई. छह बरस और बारह फिल्मों के बाद 1939 में पृथ्वीराज एक बार फिर बंबई लौट गए.

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सेट पर शूंटिंग के दौरान वैजयंती माला के साथ पृथ्वीराज कपूर

नौकरी छोड़कर फ्रीलांसिग की

बंबई में उन्होंने किसी एक कंपनी की नौकरी की परंपरा को तोड़कर फ्री-लांसिंग की शुरुआत की और कॉन्ट्रैक्ट के तहत काम करना शुरू किया. साल 1941 में सोहराब मोदी ने जब पृथ्वीराज कपूर को पर्दे पर सिकंदर के रूप में पेश किया तो देखने वाले अवाक रह गए. गोरा रंंग, लंबा कद और कसरत से बनी मछली सी मचलती मांसपेशियां देखकर लोगों को दास्तानों में दर्ज ग्रीक योद्धाओं के अक्स दिखाई दे गए.

इस एक फिल्म की वजह से हिंदुस्तानी नौजवानों में बॉडी बिल्डिंग का जबरदस्त क्रेज पैदा हुआ. हर नौजवान 'सिकंदर' की तरह दिखना चाहता था.

अपने लिए पनपी इस दीवानगी से बेअसर पृथ्वीराज कपूर ने फिल्मों के साथ ही साथ थियेटर की तरफ वापस रुख किया. अपनी ही एक कंपनी पृथ्वी थियेटर्स की स्थापना की और नाटकों का मंचन शुरू किया.

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बंबई का रॉयल ऑपेरा हाऊस जहां बाकायदा हर रोज फिल्में दिखाई जाती थीं, उसी जगह उन्होंने अपने थियेटर की नींव रखी. क्योंकि वहां रोजाना तीन शो में फिल्में दिखाई जाती थीं इसलिए रविवार के दिन सुबह-सुबह ड्रामा स्टेज करने का सिलसिला शुरू किया.

देखते-देखते इस कोशिश ने कामयाबी हासिल कर ली. एक के बाद एक नए नाटक लिखे और स्टेज होते रहे. 1944 के आते-आते पृथ्वी थियेटर्स के पास ‘दीवार’, ‘पठान’, गद्दार’, शकुंतला’, आहुति’, ‘पैसा’, ‘किसान’ और ‘कलाकार’ जैसे आठ नाटक तैयार हो गए जिन्हें लेकर पृथ्वीराज देश भर में घूमते रहते थे.

इस अकेली नाटक कंपनी ने फिल्म जगत को जितने नामवर कलाकार दिए उतने किसी फिल्म इंस्टीट्यूट ने भी नहीं दिए होंगे. सबसे पहले तो पृथ्वीराज जी के तीनो बेटे- राज, शम्मी और शशि कपूर हुए. फिर सज्जन, प्रेमनाथ, त्रिलोक कपूर, कमल कपूर, बी.एम.व्यास जैसे अदाकार. डायरेक्टरों में रमेश सहगल, मोहन सहगल, संगीतकार राम गांगुली और शंकर-जयकिशन. यह एक बेहद लंबी फेहरिस्त थी.

यूं तो पृथ्वीराज ने अनेक फिल्मों में काम किया लेकिन ‘आवारा’ (51) में जज रघुनाथ और ‘मुगल-ए-आज़म’ (60) में शहंशाह अकबर की भूमिका में वे अपने सर्वोच्च स्थान पर दिखाई देते हैं.

पृथ्वीराज कपूर को अपने जीवनकाल में ही उनकी इस कला साधना के लिए दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड जैसे कई सम्मान भी मिले. 50 के दशक में उन्हें राज्य सभा का सदस्य भी मनोनीत किया गया.

29 मई 1972 को एक लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हुआ. दुनिया छोड़कर जाने से पहले वे फिल्म जगत के लिए राज कपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर, रणधीर कपूर, ऋषि कपूर, करिश्मा कपूर, करीना कपूर और रणबीर कपूर जैसे कलाकारों का एक ऐसा परिवार छोड़ गए हैं जो आज भी उनकी परंपरा को जीवित रखे हुए है.

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