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दंगल रिव्यूः 'बापू चाहे हानिकारक हो' पर फिल्म लाभदायक है

फिल्म के डायलॉग्स छोटे और एकदम सटीक हैं, जो आपको फिल्म देखने के बाद भी याद रह जाते हैं.

Updated On: Dec 22, 2016 05:49 PM IST

Ravindra Choudhary

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दंगल रिव्यूः 'बापू चाहे हानिकारक हो' पर फिल्म लाभदायक है

फिल्म की शुरूआत में आप सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार खड़े होंगे और दूसरी बार दिल के आदेश पर खड़े होंगे. जब गीता गोल्ड जीतती है और राष्ट्रगान बजता है तो आप खुद-ब-खुद तालियां बजाते हुए खड़े हो जाएंगे.

फिल्म के एक सीन में महावीर सिंह कहते हैं- “मेडलिस्ट पेड़ पै नहीं उगते, उन्हें बनाणा पड़ता है...प्यार सै, मेहनत सै, लगन सै!” नितेश की ‘दंगल’ में ये तीनों चीजें भरपूर मात्रा में हैं.

यूं समझो कि ‘चिल्लर पार्टी’ और ‘भूतनाथ रिटर्न्स’ में दो गेंदों पर सिंगल लेने के बाद नितेश तिवारी ने इस तीसरी बॉल पर सिक्सर जड़ दिया है.

महावीर सिंह फोगाट की कहानी

फिल्म की कहानी तो आप पहले से जानते ही हैं. ऐसी फिल्मों के स्पॉयलर्स नहीं होते, इनका अंत आपको पहले से मालूम होता है. ये बस सीधे-सपाट ढंग से अपने अंजाम तक पहुंचती हैं. महावीर सिंह फोगाट (आमिर) खुद देश के लिये मेडल नहीं जीत पाता और उसे मजबूरी में सरकारी नौकरी करनी पड़ती है.

 

दंगल

फातिमा शेख और साएना बबीता और गीता फोगाट के किरदार में हैं

अब उसका एक ही सपना है कि उसका बेटा देश के लिये गोल्ड मेडल जीते लेकिन जब एक के बाद एक बेटियां होती चली जाती हैं तो उसका सपना टूट जाता है. फिर वो अपने उस सपने को अपनी बेटियों में जीता है और कामयाब होता है. इस कामयाबी तक पहुंचने का महावीर और उसकी बेटियों का सफर इतना शानदार है कि आप भी उसमें शामिल हो जाते हैं.

फिल्म के डायलॉग्स छोटे और एकदम सटीक हैं, जो आपको फिल्म देखने के बाद भी याद रह जाते हैं. छत पर चढ़कर टीवी का एंटीना घुमाने से लेकर शोभा कौर का महावीर को चिकन के बर्तन रसोई से दूर रखने की हिदायत देना- सब कुछ इतना अपना-अपना सा लगता है कि आपको इन किरदारों से प्यार हो जाता है.

फिल्म में वो सीन कमाल का है जहां गीता पछतावे में फोन पर सिर्फ रोये जा रही है, बोल कुछ नहीं पा रही और उधर महावीर की आंखों से भी चुपचाप आंसू बह रहे हैं. नितेश ने यहां बिना किसी डायलॉग के ही कमाल रच दिया है.

AAMIR KHAN

फिल्म में है ‘वुमन एम्पावरमेंट’ की झलक

यह फिल्म दिखाती है कि ‘वुमन एम्पावरमेंट’ सिर्फ मर्दों की तरह सिगरेट का धुआं उड़ाने में ही नहीं है, बल्कि चूल्हे के धुएँ से निकलकर, पसीने और मिट्टी में लथ-पथ होकर पितृसत्तात्मक समाज को अखाड़े में पटखनी देने में ज्यादा है.

आमिर के बारे में तो खैर क्या कहें! निःसंदेह, दंगल उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में शुमार की जायेगी. बाकी सारे कलाकारों ने भी अपने किरदारों में जान फूंक दी है. खास तौर पर गीता-बबीता की मां के रोल में साक्षी तँवर! चूल्हे-चौके और पितृसत्तात्मक समाज में पिसती महिला के रोल में उन्होंने बहुत ही शानदार काम किया है.

गीता के रोल में फ़ातिमा सना शेख़ एवं ज़ायरा वसीम और बबीता के रोल में तान्या मल्होत्रा एवं सुहानी भटनागर और उनके चचेरे भाई के रोल में अपारशक्ति खुर्राना और ऋत्विक साहोर और कोच के रूप में गिरीश कुलकर्णी सब अपने-अपने रोल में जमे हैं.

AAMIR KHAN Film Review

सौ का नोट देखना है तो फिल्म भी देखिए

यहां महिला कुश्ती टीम के कोच रहे कृपाशंकर विश्नोई का जिक्र खास तौर पर होना चाहिये, जिन्होंने आमिर और बाकी दूसरे कलाकारों को पहलवान के रूप में इतना विश्वसनीय बना दिया.

इस फ़िल्म के बाद कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा का रुतबा भी बॉलीवुड में और बढ़ जायेगा. अमिताभ भट्टाचार्य के गीतों और प्रीतम के संगीत ने फिल्म के मूड को बनाये रखने में खास योगदान दिया है.

इन सब के अलावा, दंगल देखने की एक और वजह! अगर सौ का नोट देखने के लिये आपकी आंखें तरस गयी हों तो भी यह फिल्म देख आइये, इसमें आपको सौ-सौ के ढेरों नोट देखने को मिलेंगे. आपका मन करेगा कि स्क्रीन में घुस जाऊं और सारे नोट उठा लूं.

अंत में एक सीन में महावीर गीता का हौसला बढ़ाते हुए कहते हैं- “एक बात हमेशा याद रखना बेटा, अगर सिल्वर जीती तो आज नहीं तो कल लोग तन्नै भूल जावैंगे...जो गोल्ड जीती तो मिसाल बण जावैगी...और मिसालें दी जाती हैं बेटा भूली नहीं जातीं.” दंगल जैसी फिल्मों की भी मिसालें दी जाती हैं.

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