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दंगल रिव्यू : आमिर और उनकी प्यारी बेटियों ने खुले पार्क में 'दंगल' कर दिया

नीतेश तिवारी की ये तीसरी फिल्म है, जो हरियाणा के पहलवान महावीर फोगाट की निजी जिंदगी पर आधारित है.

Updated On: Dec 23, 2016 11:59 AM IST

Anna MM Vetticad

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दंगल रिव्यू : आमिर और उनकी प्यारी बेटियों ने खुले पार्क में 'दंगल' कर दिया

पसीने से लथपथ, एक दूसरे की देह को उन जगहों पर पकड़ते जकड़ते अजनबी और मनोरंजन के लिए हिंसा, इंसान की सबसे निचले स्तर की भावनाओं को मान्यता. ये सारी बातें मुझे उन खेलों से दूर ले जाती हैं जिनमें छूना पकड़ना पड़ता है.

लेकिन कम उम्र की गीता और बबीता फोगाट के पास कुश्ती से नफरत करने के लिए कई और वजहें थीं, जो बहुत साधारण सी थीं.

मसलन, वे ऐसी किसी लड़की को नहीं जानती हैं जो कुश्ती करती हो...तो क्यों करें? दंगल उस बाप की कहानी है, जो हर हाल में अपनी बेटियों को कुश्ती के खेल में गोल्ड मेडलिस्ट बनाना चाहता है.

ये उन लड़कियों की भी अपनी निजी यात्रा की कहानी हैं जिसमें कुश्ती से उनकी चिढ़ कैसे बाद में उनका जुनून बन जाता है.

निर्देशक के तौर पर नीतेश तिवारी की ये तीसरी फिल्म है. ये फिल्म हरियाणा के पहलवान महावीर सिंह फोगाट की जिंदगी पर आधारित है. फोगाट देश भर में एक असाधारण खेल के कोच और कुश्ती के खेल से जुड़े पूरे परिवार के मुखिया के तौर जाने जाते हैं.

लड़कियों से ज्यादा उनके पिता की कहानी

उनकी सभी बेटियों ने कुश्ती के खेल में देश का नाम रोशन किया है. दो बड़ी बेटियां गीता और बबीता कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडलिस्ट रह चुकी हैं. गीता फोगाट ओलंपिक्स के लिए क्वालिफाई करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं.

ये उपलब्धि इसलिए भी बड़ी है कि क्योंकि गीता और बबीता हरियाणा की रहने वाली हैं. वो राज्य जहां  लड़के लड़कियों का लिंगानुपात सबसे ज्यादा खराब है. कन्या भ्रूण हत्या और भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाओं में भी राज्य काफी बदनाम रहा है.

दंगल महावीर फोगाट की सोच और उनकी जिद की कहानी है. वो जिद जिसके कारण उन्हें अपनी पत्नी, अपने समाज, अपने देश और यहां की खेल सत्ता और अंत मे अपनी बेटी गीता...सभी से लड़ाई लड़नी पड़ी.

फिल्म का पहला हिस्सा बहुत ही बढ़िया बना है. आमिर ने फिल्म में एक अधेड़ उम्र के आदमी का किरदार निभाया है. वो आदमी जिसने अपने परिवार की देखभाल करने के लिए अपने जीवन के सबसे बड़े सपने को त्याग दिया था. जिसके बाद वो सोचता है कि वो अपने बेटे को कुश्ती का चैंपियन बनाएगा भारत के लिए सोना लेकर आएंगे.

Sakshi Tanwar

फिल्म में साक्षी तंवर ने आमिर की पत्नी का रोल निभाया है

लेकिन जब उसकी पत्नी दया एक के बाद एक चार बेटियों को जन्म देती है. एक दिन जब महावीर की दोनों बड़ी बेटियां उन्हें छेड़ने वाले गली के लड़कों को सरेआम पीट देती हैं तो महावीर की आंखों में फिर से चमक आ जाती है.

उसके मुताबिक तब उस एक पल में वो ये भूल गया कि एक सोने का मेडल सोने का ही होता है, फिर चाहे उसे कोई लड़का जीते या लड़की.

लाजवाब एक्टिंग

फिल्म का संगीत काफी अच्छा है और कहानी के साथ पूरी तरह से मिल जाता है. गानों के बोल में फिल्म की कहानी बहुत ही खूबसूरती से पिरोयी गई है.

कई जगहों पर गानों के बोल में ऐसी बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया गया है कि बरबस ही चेहरे पर हंसी आ जाती है. फिल्म में हर कलाकार की एक्टिंग लाजवाब है.

गीता और बबीता के बचपन का रोल अदा किया है दो बहुत ही टैलेंटेड बच्चियों ने. ये हैं जायरा वासिम और सुहानी भटनागर ने. दोनों ही बच्चियों ने फिल्म के हर सीन मे जान डाल दी है और फिल्म की कहानी अपने आप आगे बढ़ने लगती है.

महावीर फोगाट के किरदार की कमियों को ढंकने की कोई खास कोशिश नहीं की गई. वो घर के भीतर एक तानाशाह है और घर के बाहर एक आतंक. फिल्म का सेटअप एक पारंपरिक समाज है जहां पति और पिता की कही बातें ही अंतिम सत्य होता है फिर चाहे दुनिया जो कहे.

महावीर का डर इतना ज्यादा है कि आसपास के लोग उससे बहुत डरते हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके पीठ पीछे उनकी चुगली जारी रहती है. गांव वालों को डर है कि ये आदमी अपनी जिद के कारण अपनी बेटियों की जिंदगी बर्बाद कर देगा. गांव वालों लगता है वो अपनी बेटियों को ऐसी चीज में डाल रहा है जिसके पचड़े में औरतों को नहीं पड़ना चाहिए.

इंटरवेल से पहले का हिस्सा काफी अच्छा बन पड़ा है. कहानी तेजी से आगे बढ़ती है, दिलचस्पी बनाए रखती है और फिल्म को रफ्तार देती है.

फोटो. आमिर खान के ट्विटर हैंडल से साभार

फिल्म में आमिर खान की चार बेटियां हैं.

बेटे की चाहत में बिल्कुल पागल हुए से एक इंसान को औरतों के हक के लिए अपनी आवाज बुलंद करना दिल को छू देने वाला है. आमिर खान को एक तरफ एक कठोर पितृसत्ता का प्रतीक और फिर महिलावादी के किरदार में देखना बहुत ही गहरी सोच को दर्शाता है.

ठीक वैसे ही उन्हें पहले एक रूढ़िवादी सोच फिर एक कल्पनाशील व्यक्ति के रूप में देखना. ये सब हम पर गहरा असर तो छोड़ता ही है, काफी कुछ सिखाता भी है.

इसके अलावा लड़कियों को बेमन पहलवानों से पूरी तरह से कुश्ती के प्रति समर्पित खिलाड़ी के रूप में देखना बहुत ही ज्यादा दिलचस्प और मार्मिक है.

फिल्म का खराब हिस्सा

फिल्म के दूसरे हिस्से कहानी में कसावट की कमी है. अब गीता और बबीता के किरदार में बड़ी लड़कियां फातिमा सना शेख और सान्या मल्होत्रा नजर आती हैं. दोनों लड़कियों का अपना खुद का अलग व्यक्तित्व है और यहीं गीता की महावीर से भिड़ंत होती है.

बाप-बेटी के बीच चलने वाली ये टक्कर काफी रोचक हो जाती है जब तक कि फिल्म में इस विवाद का सही और समझदारी भरा समाधान ढूंढने की कोशिश नहीं की जाती.

क्या हमें गीता के नई कोच की जगह महावीर का साथ देना चाहिए क्योंकि पिता हमेशा सही होते हैं या फिर इसलिए कि महावीर फोगाट खुद एक बहुत बड़े कोच और पहलवान रह चुके हैं और उनके पास गीता के खेल को सुधारने के लिए बेहतर नीतियां हैं? इसका जवाब बेहतर रणनीति होनी चाहिए लेकिन फिल्म में इसका जवाब साफ नहीं है.

इसके साथ ही हमें ये डर सताने लगता है कि फिल्म में दिखायी गई ये अस्पष्टता जानबूझकर दिखायी गई है, क्योंकि हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां आज भी ये माना जाता है कि बच्चों को अपने माता-पिता से सवाल नही करना चाहिए.

इतना ही परेशान करने वाला फिल्म का वो हिस्सा है जिसमें आजकल के दिखावे वाली पब्लिक सेंटीमेंट को संतुष्ट करने की कोशिश की गई है.

ये वो हिस्सा है जिसमें राष्ट्रीय गान को गाते हुए दिखाया गया है और उसके बाद बेवजह की नारेबाजी शुरू हो जाती है. ऐसा लगता है जैसे ये जानबूझकर फिल्म में ठूंसा गया है.

यही वो चीजें हैं जो दंगल को एक महान फिल्म बनने से रोकती हैं. ये कहने के बाद भी मुझे ये मानने में कोई हिचक नहीं है कि दंगल अपने आप में कई खूबियों को लेकर आयी है जो किसी को भी फिल्म देखने पर मजबूर कर सकती है.

सबसे महत्वपूर्ण आमिर खान का महावीर फोगाट के किरदार में जान डाल देना है. जिस गहराई से आमिर ने असल महावीर फोगाट की अपनी बेटियों को सफल पहलवान बनाने की सनक को पर्दे पर उतारा है वो काबिलेतारीफ है.

फोटो. आमिर खान के ट्विटर हैंडल से साभार

फोटो. आमिर खान के ट्विटर हैंडल से साभार

आमिर ने जिस तरह से अपने शरीर में रोल के लिए बदलाव किया है वो किसी को भी हक्का बक्का कर सकता है, लेकिन जो चीज हर चीज को मात देती है वो है आमिर का इस किरदार में इस तरह ढल जाना मानो उनके शरीर की एक-एक रक्त कोशिकाएं उस किरदार को जी रही हैं. पर्दे पर इस किरदार को जिंदा करने के लिए आमिर खान बधाई और सैल्यूट के पात्र हैं.

सुपर स्टारडम का घमंड नहीं

 ये आमिर खान का आत्मविश्वास और स्वाभाविक समझ ही है जो इस फिल्म का प्रोड्यूसर होने के बावजूद उन्होंने फिल्म में आई नई अभिनेत्रियों को अपने सुपर स्टारडम से ढंकने की कोशिश नहीं की है.

गीता और बबीता का किरदार निभाने वाली चारों नई लड़कियों का काम बहुत ही अच्छा है. जिस पर सोने पे सुहागा है- साथी कलाकारों का काम. साक्षी तंवर का काम बहुत ही विश्वसनीय है, इसके अलावा अपारशक्ति खुराना जो फिल्म में इन लड़कियों की चचेरी बहन बनी हैं वे भी बहुत ही उम्दा काम कर गई हैं.

फिल्म के दूसरे हिस्से का बहुत सारा समय गीता के कुश्ती के मैच को दिखाने में गया है. फिल्म के निर्देशक ने इन मैचों को पूरा दिखाने का फैसला कर काफी समझदारी भरा निर्णय लिया है.

फिल्म फिर फातिमा शेख और अन्य खिलाड़ियों के कुश्ती के मैचों का मिश्रित वर्जन बन जाता है, जो इतनी खूबसूरती से फिल्माया गया है कि उन्हें देखना फिल्म की सिनेमाई खूबी को किसी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाता.

फिल्म की असल परीक्षा ये है कि क्या ये फिल्म मेरे जैसी किसी दर्शक को जिसे कॉन्टैक्ट स्पोर्ट (हाथ-पैर से छूने वाले खेल) बिल्कुल पसंद नहीं है पर वो फिल्म देखते हुए अपने नाखून चबाने को मजबूर हो जाती है.

ये गीता फोगाट को चटाई पर कुश्ती लड़ते हुए देखने के दौरान उपजे तनाव से होता है. इसके लिए मैं नीतेश तिवारी को निजी तौर पर सलाम करती हूं.

दंगल

फातिमा शेख और साएना बबीता और गीता फोगाट के किरदार में हैं

 इस साल की रियो ओलंपिक के दौरान हमारे देश में खेल पर हो रही सभी चर्चाओं में जो बात छायी हुई थी वो यहां की खेल संस्थाओं में फैला हुआ भ्रष्टाचार था.  इतना कि जो खिलाड़ी ओलंपिक्स में मेडल भी जीतकर नहीं ला पाए उन्हें भी रोल मॉडल और आईकॉन के तौर पर देखा जा रहा था.

जो कोई भी मेरी बात से सहमत नहीं हैं मैं उन्हें चोट नहीं पहुंचाना चाहती, लेकिन ये जरूरी नहीं कि हम अपने खिलाड़ियों के हर छोटी-बड़ी सफलताओं के झंडे गाड़ें, लेकिन हमें इस बात पर जरूर सवाल करना चाहिए कि जो लोग मेडल जीत नहीं पाते हम उनके लिए रैलियां और रोड शो क्यूं करते हैं.

दंगल एक ऐसी फिल्म है जो माता-पिता, बच्चों के पालन-पोषण जैसे मुद्दों पर बहुत ही संभलकर चली है लेकिन खेल से जुड़े मसलों, सफलताओं और असफलताओं पर इसमें काफी बेबाक राय रखी गई है.

सिल्वर मेडल- सेकेंड बेस्ट होता है, इसलिए अगर हम गोल्ड मेडल के लिए कोशिश करते हैं तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं है.

एक ऐसे भारत में जहां महत्वकांक्षी होना या महत्वाकांक्षाएं रखना काफी हद तक एक भ्रमित आइडिया है, ऐसी दुनिया जहां महिलाओं का महत्वाकांक्षी होना एक गंदे शब्द के रूप में जाना जाता है, वहां ऐसी फिल्म जिसमें इन पर जितनी साफगोई से बात की गई वो काबिलेतारीफ और प्रेरक है.

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