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प्रसून जोशी के सेंसर बोर्ड चीफ बनने पर हमेंं आश्चर्य क्यों नहीं हो रहा?

ये वो ही प्रसून जोशी हैं जिन्होंने सेंसरशिप की मुखालफत की थी और बीजेपी ने उन्हें उनके पुराने संबंधों का इनाम दिया है

Abhishek Srivastava Updated On: Aug 12, 2017 10:29 AM IST

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प्रसून जोशी के सेंसर बोर्ड चीफ बनने पर हमेंं आश्चर्य क्यों नहीं हो रहा?

फिल्म जगत के कुछ लोगों के लिये सेंसर बोर्ड चीफ़ के पद से पहलाज निहलानी का चले जाना सुखद खबर हो सकती है. लेकिन मुद्दा अब ये है कि उनके बदले आने वाले प्रसून जोशी क्या वो उन सभी चीजों के ऊपर लगाम कस पायेंगे जिसकी वजह से सेंसर बोर्ड के चीफ़ के पद का दूसरा नाम विवाद हो गया है.

फिल्म जगत में अभी पटाखे फोड़ने का समय नहीं आया है क्योंकि अभी देखना बाकी है की प्रसून जोशी किसके नक्शे कदमों पर चलने वाले हैं - पहलाज निहलानी या फिर विजय आनंद जिन्होनें अपने रैडिकल निर्णयों से एक तरह से सरकारी महकमे में भूचाल ला दिया था जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी. बहरहाल पहले ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर प्रसून जोशी हैं कौन और फिल्म जगत में उनका योगदान क्या रहा है?

उत्तराखंड की पहाड़ की वादियों में अपना बचपन बिताने वाले प्रसून जोशी मूलत एड की दुनिया से ताल्लुक रखते हैं और मशहूर एड और मार्केटिंग फर्म मैकेन एरिक्सन के एशिया पशैफिक जोन के बॉस हैं. गाज़ियाबाद के आई एम टी से मैनेजमेंट की डिग्री लेने के बाद शुरुआत उन्होंने ओगिल्वी एंड मेंथर एजेंसी से की थी लेकिन उनके करियर को देखे तो यही लगता है कि वो सफलता के पीछे नहीं भागे बल्कि सफलता उनके सामने खुद चल कर आई.

विज्ञापन की दुनिया में जिस रफ्तार से सीढ़ी इन्होंने चढ़ी वो वाकई काबिले तारीफ है. आमिर खान जब पहली बार कोका कोला के ब्रांड एंबसेडर बने तो उनके मुंह में प्रसून के ही शब्द थे  - 'ठंडा मतलब कोका कोला'. सफलता का कारवां बढ़ता गया और जब उन्हें लगा कि विज्ञापन की दुनिया में उनके कदम मजबूत हो गये हैं तब उन्होंने अपने रुचि को पंख देना शुरु किया और वो था फिल्मों में गीत लिखने का शौक.

शुरुआत उनकी हुई फिल्म भोपाल गैस कांड पर बनी फिल्म 'भोपाल एक्सप्रेस' से 1999 में. फिल्म में उनका कोई गाना तो नहीं था, कुछ था तो वो था एक लंबा डायलॉग था जिसे अपनी आवाज़ से पिरोया था अमिताभ बच्चन ने. ये प्रसून की बदकिस्मती ही थी की फिल्म का गाना चला जगजीत सिंह की आवाज में जिसे लिखा था नसीर काज़मी ने. बहरहाल सफलता पाने में उनको ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा और इस बार भी अमिताभ बच्चन उनकी सफलता में जुडे थे. 2002 में रिलीज हुई फिल्म 'आंखें' का अक्षय कुमार और बिपाशा बसु पर फिल्माया गया 'गुस्ताखियां है' गाना जो बेहद लोकप्रिय हुआ.

इसके दो साल बाद आई यश राज बैनर की फिल्म 'हम तुम' के सभी गानों ने प्रसून को वो मुकाम आखिर दिला ही दिया जिसकी दरकार हर गीतकार रखता है. ये वो वक्त था जब आमिर खान और अमिताभ बच्चन से दोस्ती इनकी और गाढ़ी होती गई. 'तारे जमीं पर', 'रंग दे बसंती', 'फना' और 'गजनी' इन सभी में प्रसून के गाने थे तो. तारे जमीं पर ने तो इनको नेशनल अवार्ड भी 2002 में दिला दिया.

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि प्रसून जोशी भारत सरकार के लिये कोई नया नाम है. चाहे यूपीए की सरकार हो या फिर एनडीए की सरकार - प्रसून ने अपने कलम का जौहर अपने एजेंसी के जरिये दोनो के लिये दिखाया है. जब आमिर खान ने 'अतिथि देवो भव' की बात इन्क्रेडिबल इंडिया कैंपन के तहत कही तो उस कैंपेन को मैकेन एरिक्सन ने ही जामा पहनाया था. जब सरकार ने सर्विस टैक्स के बारे में लोगों को अपनी बात पहुंचाने की सोची तो उस वक्त भी उनको प्रसून जोशी ही याद आए. 2014 के लोक सभा चुनाव में जब बीजेपी को अपने चुनावी कैंपन को दुरुस्त तरीके से हवा देने की बात आई तो उस वक्त भी वेटरन सैम बलसारा, प्रसून पांडे को अलावा प्रसून जोशी को याद किया.

बीजेपी के 'अबकी बार मोदी सरकार' और 'अच्छे दिन आने वाले हैं' जैसे स्लोगन को देने में जितना हाथ प्रसून पांडे का था तो उतना ही दिमाग की जुगत प्रसून जोशी ने भी लगाई थी. पूरे कैंपन में अगर किसी का दिमाग पूरी तरह से डायनामो की तरह चला तो वो प्रसून जोशी ही थे. अब उस कैंपन की वजह से बीजेपी को कितना फायदा मिला, ये बात किसी को बताने की अब कतई जरुरत नहीं है. उसी कैंपन के दौरान प्रसून के लिखे एंथेम 'सौगंध' को आवाज़ देने वाले और कोई और नहीं बल्कि खुद नरेंद्र मोदी थे.

गौरतलब है कि 25 मार्च 2014 को जो ट्वीट नरेंद्र मोदी ने किया था उसमें उन्होने प्रसून को इस एंथम के लिये उनको अपना धन्यवाद दिया था. जोशी की बीजेपी में पैठ अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने से है. अटल बिहारी बाजपेयी उन लोगों में से थे जो प्रसून की कविताओं के क़ायल थे और इसी वजह से उनकी लिखी कविता इरादे नये भारत का को अपने स्पीच का हिस्सा बनाया था. 2009 में भी जब बीजेपी ने लालकृष्ण आडवाणी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया था तो उस वक्त भी बीजेपी ने अपने कैंपन का दारोमदार प्रसून को सौंप दिया था और तब प्रसून ने मजबूत नेता, निर्णायक सरकार की बात कही थी.

प्रधानमंत्री के पेट प्रोजेक्ट्स में से एक स्वच्छ इंडिया कैंपेन को जनता तक पहुंचाने की बात आई तो उस वक्त भी उसके वीडियो के लिए जब गाने की बात आई तो बीजेपी के थिंक टैंक ने एक बार फिर से प्रसून जोशी को याद किया. प्रसून को जल्द ही बीजेपी के करीब होने का फल भी मिला जब सरकार की ओर से उनको 2015 में पद्मश्री से नवाजा गया.

अब मुद्दा ये है कि पहलाज निहलानी के जाने के बाद क्या चीजें बदलेंगी. अगर प्रसून के बीजेपी साथ पुराने रिश्तों की बात आती है तो लगता नहीं की कुछ चीज बदलने वाली है. ये प्रसून ही हैं जिन्होंने बॉलीवुड के पोर्टल बॉलीवुड हंगामा के साथ एक खास बातचीत में कहा था कि हमें एक सोसाइटी का निर्माण करना चाहिये जहां पर सेंसरशिप की जरुरत ना हो. उसी इंटरव्यू में प्रसून ने फ़्रीडम ऑफ रिजेक्शन की बात भी कही थी. प्रसून का ये कथन अगर उनके इतिहास से जोड़े तो मुमकिन है कि शायद ये उनके गले की हड्डी बन जाये.

इस बात में कोई शक नहीं की जैसे पहलाज को हर हर मोदी घर घर मोदी गाने को बनाने के लिये सेंसरशिप चीफ़ का पद उनको इनाम स्वरूप दिया गया था कुछ वैसा ही प्रसून के साथ भी हुआ है. हकीकत यही है कि सरकार ने प्रसून को उनके पार्टी से लिये इतने साल की वफादारी का इनाम दिया है. मुमकिन है कि एक वर्ग चीख चिल्ला कर इसका विरोध क्यो ना करे लेकिन इतिहास कभी भी झूठ नहीं बोलता. जब सनी लियोनी एक नेशनल टीवी चैनल के साथ एक इंटरव्यू के बाद विवाद में आ गई थी तब फिल्म जगत के कई लोगों ने अपना समर्थन सनी के साथ दिया था. लेकिन एक आवाज़ सनी के खिलाफ थी और वो थी प्रसून जोशी की जब उन्होंने कहा था कि वो सनी लियोनी के पिछले पेशे से इत्तेफाक नहीं रखते है.

मिड डे अखबार के लिये बॉलीवुड के कुछ हस्तियों के साथ एक ग्रुप डिस्कशन में प्रसून ने साफ शब्दों में कहा था कि - क्या सरकार को सेंसरशिप का अधिकार है बाकी देशों में ऐसा नहीं होता है तो भारत में इसकी जरुरत क्यों है. ये सच बात है कि बाहर रह कर बोलना और अपने सोच की अभिव्यक्ति देना आसान बात है लेकिन जब सिस्टम के दायरे में रह कर चीजों को करने की बात आती है तो कइयों के हाथ बंध जाते हैं. अगर सिर्फ प्रसून के पिछले काम को उनके सेंसर बोर्ड के भविष्य से जोड़ा जाये तो भविष्य साफ और सुथरा दिखाई देता है क्योंकि उनका काम शानदार रहा है लेकिन अगर सरकारी काम के चश्मे से देखा जाये तो ये भी साफ नजर आता है कि उनके हाथ बंधे हैं क्योंकि बीजेपी ने उनकी कंपनी को काम देकर उनपर ढेरों उपकार किए है.

प्रसून के लिये आने वाला वक्त चुनौतियों से भरा है इसमें कोई शक नहीं है. चुनौती इसलिये क्योंकि उन्हे डर इस बात का भी साल रहा होगा की कही उनके शानदार करियर की साख पर किसी तरह का कोई बट्टा ना लग जाये. उनकी यही कोशिश होगी की सेंसर बोर्ड का यह पद उनके पुराने काम के तरीकों का एक्सटेंसन ही हो. बीजेपी के उपकार को भूल कर प्रसून विवादों के जाल से हमेशा घिरे रहने वाले सेंसर बोर्ड को उसकी गरिमा देने में वो कामयाब रहेंगे या नहीं, ये देखना बेहद दिलचस्प रहेगा.

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