S M L

Bhavesh joshi Review: फिल्म के टाइटल में सुपर हीरो शब्द लगाना विक्रमादित्य की बड़ी भूल है

इस फिल्म को देखना एक अधपका अनुभव है यानी कि कई चीजें आप पचा नहीं पाते हैं

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Jun 01, 2018 06:28 PM IST

0
Bhavesh joshi Review: फिल्म के टाइटल में सुपर हीरो शब्द लगाना विक्रमादित्य की बड़ी भूल है
निर्देशक: विक्रमादित्य मोटवानी
कलाकार: हर्षवर्धन कपूर, प्रियांशु, आशीष वर्मा, निशिकांत कामत

 

‘भावेश जोशी-सुपर हीरो’ से निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी ने अपनी फिल्मों का ट्रैक बदला है. मोटवानी इसके पहले उड़ान, लूटेरा और ट्रैप्ड जैसी फिल्में बना चुके है जो सही मायनों में कमर्शियल बॉलीवुड के दायरे में नहीं थी. ‘भावेश जोशी-सुपर हीरो’ से पहली बार उन्होंने कुछ कमर्शियल करने की कोशिश की है और फिल्म देखने के बाद कहना पड़ेगा कि इसको देखने का अनुभव थोड़ा अंडरव्हेल्मिंग है. यानी कि मस्ती में कमी रह जाती है. मुझे सबसे बड़ी शिकायत इस फिल्म के टाइटल से है. मैं अभी तक इस बात को समझ नहीं पाया हूं कि इस फिल्म के टाइटल में सुपर हीरो शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया है? इस फिल्म का हीरो भी बाकी हिंदी कमर्शियल फिल्मों के हीरो की तरह ही है जो अपने तरीके से बदला लेता है. परेशानी इसी बात की है कि बदला लेने की मुहिम जो फिल्म में हम देखते हैं उसमें हीरो के किसी किस्म की असीम शक्ति के दीदार हमें नहीं हो पाते है. फर्स्टपोस्ट हिंदी से बातचीत के दौरान हर्षवर्धन कपूर ने कहा था कि जैसे बैटमैन एक सुपर हीरो नहीं है भावेश जोशी भी कुछ उसी तरह से है. लेकिन भाई हर्षवर्धन, बैटमैन के पास उसके वेन फाउंडेशन की ताकत है जिसकी बदौलत वो सुपर हीरो वाली हरकतें कर सकता है. अफसोस ये है कि भावेश जोशी के पास ऐसा कुछ भी नहीं है. भावेश जोशी की कहानी में कोई दमखम नहीं है.

भावेश जोशी सुपरहीरो न होकर समाज का एक सजग नागरिक है

‘भावेश जोशी-सुपर हीरो’ की कहानी तीन दोस्तों के बारे में है जो मुंबई के मालाड इलाके में रहते हैं. सिकंदर खन्ना (हर्षवर्धन कपूर), भावेश जोशी (प्रियांशु) और रजत (आशीष वर्मा) एक फ्लैट में साथ रहते हैं. अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार आंदोलन का असर इनके ऊपर भी पड़ता है और उसके बाद इन तीनों में से सिकंदर और भावेश अपने वीडियो के जरिए समाज की बुराइयों को दूर करने की मुहिम में लग जाते हैं. ये कभी पेड़ को कटने से बचाते हैं तो कभी कूड़े को जलाने से. अपने तरीके से ये लोगों के बीच एक सन्देश देने की कोशिश में लगे रहते हैं ताकि एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके. परेशानी का सबब भावेश जोशी के लिए तब शुरू हो जाता है जब उसका पाला मुंबई के पानी माफिया से जुड़े लोगों के साथ होता है. सबूत निकालने की कोशिश में भावेश जोशी उनके हाथों मारा जाता है. इस बीच अपनी कंपनी की ओर से अमेरिका भेजे जाने की वजह से सिकंदर, भावेश का उसकी मुहिम में साथ देना बंद कर देता है. लेकिन उसकी मौत की खबर सुनकर वो वापस मुंबई रुक जाता है और उसके बाद उसका सिर्फ एक ही मिशन है कि कैसे वो पानी माफिया से जुड़े लोगों को बेनकाब करे और अपने दोस्त की मौत का बदला ले. कॉर्पोरेटर हेमंत पाटिल और मंत्री राणा पानी माफिया से जुड़े कुछ बड़े लोग हैं और वो भी जी जान से कोशिश करते हैं कि कैसे सिकंदर खन्ना को जो कि नकाबपोश भावेश जोशी बनकर अपने काम को अंजाम देता है, उसका सफाया कर दे.

इस फिल्म की कहानी 80 के दशक के रिवेंज ड्रामा जैसी है

विक्रमादित्य मोटवानी ने अपने एक इंटरव्यू में इस बात का खुलासा किया था कि भावेश जोशी उनके गुस्से की उपज थी. फिल्म देखने के बाद यही लगता है कि शायद उनको अपने गुस्से की भारी कीमत चुकानी पड़ जाए क्योंकि इस फिल्म का नाम ही इतना भ्रम में डालने वाला है कि देखने वाला अपने को ठगा महसूस पाएगा. अवेंजर्स, डेडपूल और वंडर वुमन के जमाने में कोई भी यही सोचेगा कि बॉलीवुड को भावेश जोशी के रूप में अपना खुद का एक सुपर हीरो मिल गया है जो दुश्मनों के होश ठिकाने में ले आएगा अपने खुद की शक्तियों की बदौलत. लेकिन भावेश जोशी सुपर हीरो न होकर महज समाज का एक सजग और सक्रिय नागरिक है जो बुराइयों को मिटाना चाहता है. अब आप खुद अंदाजा लगा लें कि आपको इस फिल्म में कितने समय तक सुपर हीरो की शक्तियों के दीदार और कंप्यूटर इफेक्ट्स देखने का मौका मिलेगा. खैर ये सारी अलग बातें अब फिल्म में कुछ मेरिट है या नहीं इसके बारे में भी कुछ बातें कर लेते हैं. इस फिल्म की कहानी में 80 के दशक की फिल्मों की झलक है जब हर दूसरी फिल्म एक रिवेंज ड्रामा हुआ करती थी. लेकिन रिवेंज की बात आजकल के फिल्मों में कही दूर की बात हो चुकी है. अगर हीरो को सुपर हीरो कुछ समय के लिए मान भी लें तो ऐसी फिल्मों के क्लाइमेक्स में एक बात पूरी तरह से साफ रहती है और वो ये है कि बुराई के ऊपर अच्छाई की जीत को बड़े ही भव्य तरीके से दर्शकों के समाने दिखाया जाता है. मोटवानी ने ये पूरा अनुभव दर्शकों से छीन लिया है और ये बेहद ही कड़वा अनुभव है.

हर्षवर्धन कपूर की मेहनत उनकी परेशानियों पर पर्दा डालने में नाकाम रही है

इस फिल्म को आम आदमी के माध्यम से कहने की कोशिश की गई है लेकिन ऐसे कई मौके हैं फिल्म में जब आप उन चीजों से खुद को जोड़ नहीं पाते हैं. जब सिकंदर अपने दोस्त की मौत का बदला लेने के लिए सुपर हीरो का नकाब पहन लेता है तब वो थोड़ा बचकाना लगता है. बचकाना इस लिहाज से कि उनके शरीर के हाव-भाव पहले जैसे ही रहते हैं किसी भी तरह का बदलाव उनमें नजर नहीं आता है. सुपर हीरो बनने की तैयारी पर भी काफी समय जाया किया गया है और उन पलों में यही लगता है कि फिल्म की कहानी रुक गई है. ‘भावेश जोशी-सुपर हीरो’ विक्रमादित्य मोटवानी के करियर की सबसे कमजोर फिल्म मानी जा सकती है. मोटवानी का स्टैंप इस फिल्म में कहीं नजर नहीं आता है. हर्षवर्धन कपूर की मेहनत साफ दिखाई देती है लेकिन अभिनय की बारीकियों को अभी उनको काफी सीखना है. अलबत्ता प्रियांशु, भावेश जोशी के रोल में काफी सधे हुए नजर आते हैं. सच यही है कि जब तीनों दोस्त एक ही फ्रेम में नजर आते हैं तब उन तीनों में सबसे कमजोर हर्षवर्धन कपूर ही दिखाई देते हैं. अगर बात सुपर हीरो की हो रही है और फिल्म में कोई तगड़ा विलेन न हो तो मजा वहीं पर ढेर हो जाता है. इस फिल्म की एक परेशानी ये भी है. निशिकांत कामत इस फिल्म के विलन हैं और उनका सामना हीरो से एक बार भी नहीं होता है. फिल्म के आखिर के फ्रेम में जरूर होता है लेकिन तब तक बस छूट चुकी होती है. सुपर हीरो शब्द महज इस्तेमाल करने से नजरिया बदल जाता है और मोटवानी से ये भारी भूल हो गई है. पानी की समस्या एक बेहद ही गंभीर समस्या है और इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है. लेकिन फिल्मों का उद्देश्य होता है जनता को सपनों की दुनिया में ले जाना खासकर ऐसी फिल्मों में. अगर फिल्म की समस्या पानी के बदले कुछ और होती तो शायद इस फिल्म का स्वरूप कुछ और होता. इस फिल्म को देखना एक अधपका अनुभव है यानी कि कई चीजें आप पचा नहीं पाते हैं. बॉलीवुड को अपना पहला सुपर हीरो इस फिल्म से मिलते-मिलते रह गया. आप चाहे तो फिल्म देख सकते हैं लेकिन ज्यादा उम्मीद न रखें तो बेहतर होगा.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
International Yoga Day 2018 पर सुनिए Natasha Noel की कविता, I Breathe

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi