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REVIEW PARI : डरिए मत, ये परी ही है, अच्छी कहानी सुनाएगी...

अनुष्का शर्मा की इस बात के लिए दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने इस फिल्म में न सिर्फ पैसा लगाया बल्कि शानदार अभिनय भी किया है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Mar 02, 2018 02:12 PM IST

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REVIEW PARI : डरिए मत, ये परी ही है, अच्छी कहानी सुनाएगी...
निर्देशक: प्रोसित राय
कलाकार: कलाकार - अनुष्का शर्मा, परमब्रत चट्टोपाध्याय, रजत कपूर

जब गाड़ी सौ की रफ्तार से चले और मंजिल पर पहुंचने के ठीक पहले डी-रेल हो जाए तब पूरे सफर का मजा किरकिरा हो जाता है. प्रोसित राय की बतौर निर्देशक पहली फिल्म परी के साथ कुछ ऐसा ही है जिसका निर्माण अनुष्का शर्मा ने किया है.

फिल्म का पहला हाफ हवा के ताजे झोंके की तरह आता है और एक अलग किस्म की ताजगी का एहसास दिलाता है लेकिन मध्यांतर के बाद जब गाड़ी अपनी रफ्तार पकड़ने की कोशिश करती है तब तक सब कुछ हवा हो चुका होता है. परी हॉरर जॉनर की फिल्म है और एक शानदार कोशिश है. कहने की जरुरत नहीं कि आपको इस फिल्म में भी बाकी डरने वाली फिल्मों की तरह डरावने चेहरे जरूर नजर आएंगे लेकिन इन सभी के पीछे एक ठोस वजह भी फिल्म मे दिखाई गई है.

बारिश के दौरान कोलकाता का माहौल, घने जंगल के बीच कुत्तों की आवाज, कैफियत - यह सब कुछ फिल्म में आपको मिलेगा लेकिन जब तक आप क्लाइमेक्स पर पहुचेंगे इन सबका का मतलब शून्य हो चुका होगा क्योंकि इसकी वजह यही है कि जिस तरह से फिल्म का खात्मा होता है वो कही से भी असर छोड़ने वाला नहीं है.

स्टोरी

परी की कहानी की शुरुआत कोलकाता से होती है जब रुखसाना (अनुष्का शर्मा) की अम्मी अर्नब (परमब्रत चटोपाध्याय) की गाड़ी से टकरा जाती हैं और उनकी मौत हो जाती है. पुलिस जब अपनी तहकीकात शुरू करती है तब जंगल के अंदर एक झोपड़ी सरीखे घर के अंदर रुखसाना मिलती है जहां उसके पैर लोहे की जंजीर से बंधे हुए हैं. घर में किसी के ना होने की वजह से अर्नब उसे अपने घर लाकर उसे सहारा देता है.

उसके बाद कहानी फ्लैशबैक में बांग्लादेश के एक गांव में जाती है जहां डाक्टर कासिम अली (रजत कपूर) के किरदार से दर्शकों से परिचय कराया जाता है. कासिम अली एक प्रोफेसर हैं और इफरित जिसे एक तरह से मुस्लिम परिवेश में शैतान कहा जा सकता है उसको जड़ से नेस्तनाबूद करने के पीछे लगे हुए हैं. इसी के चलते उनका बांग्लादेश से कोलकाता आना होता है और जब उनकी मुलाकात रुखसाना से होती है तब चीजें बदल जाती है.

सभी कलाकारों का सटीक अभिनय 

अभिनय के मामले में इस फिल्म में सभी कलाकारों ने अपने अपने किरदार के साथ न्याय किया है. अनुष्का शर्मा को शुरू में देखकर लगता है कि वो इस तरह का किरदार कैसे कर सकती हैं लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है अपने अभिनय से शुरुआती संशय को वो आगे चलकर यकीन में बदल देती हैं. ऐसी सोच उनको देखकर इसलिए आती है क्योंकि उनके लुक रुखसाना के किरदार के हिसाब से थोड़े इलीट लगते हैं.

परमब्रत ने इसके पहले कहानी में अपने अभिनय का लोहा मनवाया था और इस बार भी वो परी में उसी फार्म में दिखाई देते है. एक सभ्य इंसान जो दूसरों से हमदर्दी रखता है और मदद के लिए तत्पर रहता है, के किरदार को परमब्रत ने बखूबी निभाया है. यहां पर मैं इस बात को कहूंगा कि कुछ मामलों में उन्होंने अपने कहानी के ही रोल को एक बार फिर से दोहराया है. प्रोफेसर कासिम अली के रूप में रजत कपूर बखूबी जंचे हैं.

हॉरर को एक कदम आगे ले जाता निर्देशन

निर्देशक प्रोसित राय की यह पहली हिंदी फिल्म है और परी के निर्देशन के लिए उनको पूरे अंक मिलने चाहिए. जिस तरह से उन्होंने एक अलग माहौल फिल्म में बनाया है वो काबिले तारीफ है. डर पैदा करने के लिए उन्होंने शीशे का सहारा ना लेकर माहौल और बैकग्राउंड साउंड का सहारा लिया. फिल्म की शुरुआत जिस तरीके से उन्होंने की है और जिस तरीके से बांग्लादेश की एक घटना उठाकर अपनी कहानी में पिरोया है वो बेहद ही उम्दा माना जा सकता है.

यह देख कर अच्छा लगता है एक हॉरर जॉनर के लिए भी किसी ने कहानी पर काम करने की जहमत उठाई. अफसोस सिर्फ इसी बात का है कि अपने आखिरी पड़ाव पर प्रोसित भटक गए है. लेकिन उनकी इस गलती के लिए उनको सूली पर चढ़ाना गलत होगा बल्कि सच तो यह है कि इस तरह के हॉरर को बनाने के लिए उनकी दाद देनी चाहिए क्योंकि हॉरर का मतलब बालीवुड में सेक्स की चाशनी ही होती है.

फिल्म देखते वक्त दिल थाम कर बैठिएगा 

जब मैं फिल्म देख रहा था तब मेरे बगल की सीट पर दो लड़कियां बैठी थीं. फिल्म में कितना हॉरर है मेरे लिए पैमाना वही लड़कियां थीं. पहले हाफ में डरने की आवाज काफी सुनने को मिलीं. अब यह हॉरर कारगार था या नहीं इसका भी पैमाना मेरे लिए वही थी. कुछ एक सीन्स जिसको मैंने भी महसूस किया - उनमें ताकत थी डरने की और वो कारगार इसलिए भी थी कि डर कम करने के लिए आगे चल कर उन लड़कियों ने हंसी का सहारा लिया.

लेकिन अफसोस फिल्म के दूसरे हाफ में ऐसे मौके कम ही मिले. एक माहौल में एक भूतिया कहानी कहना और पूरे फिल्म में वही माहौल बनाकर रखना - इसके लिए टैलेंट की जरुरत होती है. आखिर में मेरा कहना यही होगा की सिर्फ क्लाइमेक्स की वजह से इसको नकार देना सरासर गलत होगा. जाइए और देखकर आइए इस हॉरर कहानी को. इस देश में बड़े सितारे हॉरर से दूर ही भागते हैं. अनुष्का शर्मा को दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने एक ऐसी फिल्म में अपने पैसे का निवेश किया और काम भी किया.

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