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REVIEW राज़ी : आलिया की एक्टिंग देखने के लिए अपने दिल को कर लीजिए ‘राज़ी’

आलिया भट्ट के फैंस के लिए ये फिल्म एक सुखद अनुभव है, राज़ी में काम करके उन्होंने दिखा दिया है कि अभी उनको बॉलीवुड में एक लंबी पारी खेलनी है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: May 11, 2018 09:58 AM IST

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REVIEW राज़ी : आलिया की एक्टिंग देखने के लिए अपने दिल को कर लीजिए ‘राज़ी’
निर्देशक: मेघना गुलजार
कलाकार: आलिया भट्ट, विक्की कौशल, जयदीप अहलावत

मेघना गुलजार की राज़ी कई मायनों में एक बेहतरीन फिल्म है. चाहे फिल्म की कहानी हो या फिर फिल्म से जुड़े इसके कलाकारों का अभिनय या फिर मेघना का निर्देशन - कहीं भी किसी तरह की चूक इस फिल्म में नहीं नजर आती है.

फिल्म से जुड़ी टीम की मेहनत ने राज़ी को एक अच्छी फिल्म का मूर्तरूप दिया है. अगर तलवार के बाद राज़ी में भी मेघना के निर्दशन की वहीं पैनी धार दिखाई देती है तो वहीं दूसरी तरफ आलिया भट्ट ने शानदार अभिनय का नमूना एक बार फिर से दिया है.

लेकिन मुझे इस फिल्म से एक बात की शिकायत भी है और वो ये है कि फिल्म एक बिंदु से अपना सफर शुरू करती है और दूसरे बिंदु पर जाकर खत्म हो जाती है और इसके बीच का जो ग्राफ है उसमें ज्यादा उतार चढ़ाव नहीं दिखाई देता है.

शायद कई लोग इस बात को नोटिस ना कर पाएं जो की राज़ी के लिए एक अच्छी बात है. लेकिन अगर इस खामी को नज़रअंदाज़ कर दें तो राज़ी में वो सारी खूबियां हैं जो एक अच्छी फिल्म में होनी चाहिए.

alia bhatt raazi

कॉलिंग सहमत की स्टोरी 

फिल्म की कहानी हरिंदर सिक्का की किताब कॉलिंग सहमत पर आधारित है और ये बात करती है 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान की जब एक भारतीय जासूस युवती का निकाह पाकिस्तान सेना के ही एक अधिकारी से हो जाता है.

राज़ी की कहानी सहमत (आलिया भट्ट) के बारे में है जो श्रीनगर की रहने वाली है और अपनी पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय में कर रही है. उसकी पिता हिदायत खान (रजत कपूर) भारतीय सेना के लिए मुखबिरी का काम करते हैं. जब उनको इस बात का इल्म होता है कि उनको ट्यूमर है और उनके पास रहने के लिए ज्यादा दिन नहीं बचे हैं तब वो अपनी बेटी से गुज़ारिश करते हैं कि वो उनके आखिरी मंसूबे को अंजाम दे. उनकी गुजारिश इसी बात की है कि पाकिस्तानी सेना के मंसूबे ईस्ट पाकिस्तान में भारतीय सेना के हाथों पराजय के बाद नेक नहीं हैं और वो किसी तरह की हानि देश को पहुंचाना चाहते हैं.

हिदायत खान यही चाहते हैं कि सहमत पाकिस्तान जाकर उनकी योजना के बारे में जानकारी हासिल करे. सहमत के पिता इस बाबत अपनी बेटी का निकाह पाकिस्तान सेना के एक उच्च अधिकारी के बेटे के साथ कर देते हैं. रावलपिंडी पहुंचकर सहमत तमाम मुश्किलों को सहते हुए भारतीय सेना को ख़ुफिया जानकारी देना शुरू कर देती है. उसकी इस मुहिम में उसके हाथों दो निर्दोष भी मारे जाते हैं लेकिन आखिर में जब मिशन की जानकारी पाकिस्तानी सेना को हो जाती है तब भारतीय सेना के ख़ुफिया अधिकारी सहमत को पाकिस्तान से निकालने की कवायद शुरू कर देते हैं जिसमें कई अड़चनें आती हैं.

आलिया, विक्की, जयदीप का शानदार अभिनय 

सहमत की भूमिका में आलिया भट्ट ने एक बार फिर से दिखा दिया है कि उनके अंदर किसी भी रोल के अंदर घुसने का साहस है. सहमत की भूमिका को परदे पर अंजाम देने में आलिया ने एक भी गलती नहीं की है. अगर आप गलती निकलने की कोशिश भी करेंगे तो भी आप सफल नहीं हो पाएंगे. उनके चेहरे के हर भाव को देखकर यही लगता है कि आपकी मुलाकात सहमत से हो रही है ना कि आलिया भट्ट से.

भारतीय सेना के उनके ट्रेनर के रोल में है जयदीप अहलावत और देखकर इस बात की बेहद खुशी होती है की गैंग्स ऑफ वासेपुर के बाद एक शानदार रोल में उनको अर्से के बाद देखने का मौका मिला.खालिद मीर के रोल में उनका काम बेहद सधा हुआ है. पाकिस्तानी सेना के उच्च अधिकारी ब्रिगेडियर सईद की भूमिका में शिशिर शर्मा है और उनका भी काम बेहदा उम्दा है. राजित कपूर, आलिया भट्ट के पिता हिदायत खान के रोल में हैं और उनकी भूमिका भले ही छोटी है लेकिन फिर भी उसका असर दिखाई देता है.

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अगर किसी की भूमिका को लेकर परेशानी है तो वो है विक्की कौशल जो की फिल्म में सहमत के पति इकबाल सईद के रोल में हैं. उनके अभिनय में कोई खामी नहीं है लेकिन जिस तरह से उनके किरदार को फिल्म में तराशा गया है उसको लेकर थोड़ी बहुत निराशा होती है. इक़बाल का किरदार फिल्म का एक अहम हिस्सा हो सकता था लेकिन उसको हाशिए पर ही रखा गया है. यही लगता है कि उनके किरदार को क्लाईमेक्स के लिये बचा कर रखा गया था.

मेघना के निर्देशन की धार में पैनापन है 

मेघना गुलजार तलवार के बाद राज़ी में भी पूरे रंग में नज़र आती है. देखकर साफ नजर आता है की फिल्म की कमान को उन्होंने हाथ से कही भी छूटने नहीं दिया है. एक दो सीन्स में वो ढीली पड़ती नज़र आती है लेकिन उसको नजरअंदाज़ किया जा सकता है. अगर किसी डिपार्टमेंट को देखकर मुझे बेहद खुशी हुई तो वो है फिल्म का एडिटिंग डिपार्टमेंट. फिल्म की अवधि दो घंटे बीस मिनट की है लेकिन यह एडिटिंग का ही कमाल है की फिल्म कहीं भी आपको बोर नहीं करती है. कसावट हर सीन में नजर आती है. एक भी मिनट फिल्म में बर्बाद नहीं किया गया है और हमेशा कहानी को आगे ही बढ़ाया गया है बिना किसी ठहराव के. फिल्म में जिस तरह से जासूसी के कारनामों को दिखाया गया उसको देखकर मजा आता है.

खामियों को नजरअंदाज करें

फिल्म की कहानी में ज्यादा उतर चढ़ाव नहीं है. जिस ढंग से फिल्म की शुरुआत होगी उसके बाद कहानी में आगे क्या-क्या होगा यह दर्शक को पहले से ही पता चल जाएगा. इस सोच को लगता है कि मेघना भूल गई थी. ऐसी कहानियो में ट्विस्ट एंड टर्न्स की बेहद आवश्यकता होती है. जब आलिया अपने काम को पाकिस्तान में अंजाम देना शुरू कर देती है तब दो मौकों को छोड़कर ऐसा और कोई भी मौका फिल्म में नहीं है जिसे देखकर आप दांतों तले अपनी उंगली दबा लें. फिल्म पूरी तरह से सपाट है - आलिया अपने काम को अंजाम देती हैं, बाद मे उसकी सूचना वो भारतीय सेना के खुफिया अधिकारियों को देती है और उसके बाद वो उसकी जांच पड़ताल करते हैं.

कहानी एक ढर्रे पर चलती है. जिन दो ट्विस्ट एंड टर्न की मैं बात कर रहा हूं उनमें कुछ ज्यादा दम भी नजर नहीं आता है. जब अब्दुल और महबूब की मौत होती है तब वो सीक्वेंस ऐसे नहीं है जिसको देखकर दिल की गति बढ़ जाए. फिल्म में आलिया के मिशन के बारे में पाकिस्तानी अधिकारियों को किस तरह से पता चलता है इस बात को बताने की जहमत नहीं उठाई गई है.

राज़ी एक ईमानदार कोशिश है जो आपका मनोरंजन करेगी. विदेशी अवेंजर्स की टीम ने बॉक्स ऑफिस पर कुछ ज्यादा ही रुपए बटोर लिए हैं अब बारी है राज़ी के जासूस और सैन्य अधिकारियों की. आप अपनी जेब से रुपए निकाल कर राज़ी का टिकट इस हफ्ते कटा सकते हैं. आपके पैसों की वसूली जरूर होगी.

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