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FILM REVIEW : जॉन की ‘परमाणु’ फिल्मी पर्दे पर धमाका है 

कई मायनों में ये फिल्म आपको शाहरुख खान की फिल्म 'चक दे इंडिया' की याद दिलाएगी

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: May 25, 2018 09:36 AM IST

Abhishek Srivastava

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FILM REVIEW : जॉन की ‘परमाणु’ फिल्मी पर्दे पर धमाका है 
निर्देशक: अभिषेक शर्मा
कलाकार: जॉन अब्राहम, डायना पेंटी, बोमन ईरानी और अन्य

परमाणु - द स्टोरी ऑफ पोखरण की सबसे खास बात ये है कि इस फिल्म में कुछ भी बेकार का नहीं शामिल नहीं किया गया है. लगभग दो घंटे दस मिनट की ये फिल्म आपको अपनी पूरी अवधि में सीट से बांधकर रखेगी.

परमाणु की कहानी एक ऐसी कहानी है जिसमें फिल्म के कुछ एक सदाबहार जॉनर का मिश्रण आपको एक कहानी के अंदर देखने को मिलेगा. इसकी कहानी में एक अंडरडॉग है, थ्रिल है, समय के साथ एक किस्म की स्पर्धा है यानी रेस अगेंस्ट टाइम की बात कही गई है और साथ ही साथ मनोरंजन भी है.

भारत ने 1998 में अपना परमाणु टेस्ट किस तरह से किया था यह उसी को बयां करती है जो बेहद ही रोचक और दिलचस्प है. इस फिल्म से जुड़े सभी लोग मुबारकबाद के हकदार हैं कि भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण की कहानी को उन्होंने बड़े ही रोचक अंदाज में फिल्मी पर्दे पर उतारा है. जॉन ने हिंदी फर्स्टपोस्ट के साथ एक खास बातचीत में इस बात का खुलासा किया था कि उनकी ये फिल्म 80 प्रतिशत सच्चाई को बयान करती है और 20 प्रतिशत काल्पनिक. अब इसमें क्या सच है और क्या काल्पनिक फिल्म देखने के बाद इस गुत्थी को भी सुलझाने में एक अलग मजा रहेगा. कुल मिलाकर परमाणु में इतनी शक्ति जरूर है कि इस हफ्ते यह आपको सिनेमा घर की तरफ खींच लेगी.

पोखरण परमाणु परीक्षण की स्टोरी 

कहानी की शुरुआत 1995 से होती है जब पीएमओ के एक जूनियर ब्यूरोक्रेट अश्वत रैना (जॉन अब्राहम) भारत के परमाणु परीक्षण पर एक रिपोर्ट तैयार करके सरकार को देते हैं. लेकिन उस रिपोर्ट को पूरी तरह से नहीं पढ़ पाने की एवज में परमाणु मिशन धरा का धरा रह जाता है. मिशन के फेल होने का पूरा ठीकरा अश्वत के सिर पर फोड़ दिया जाता है इसके बावजूद कि उसकी रिपोर्ट को किसी ने भी ठीक से नहीं पढ़ा था और कई चीजों को नजरअंदाज कर दिया था. इस वजह से अश्वत को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता है और दिल्ली से वापस मसूरी की ओर रुख करना पड़ता है.

Parmanu the story of Pokhran

घर की देखरेख उसकी बीवी सुषमा (अनूजा साठे) करती हैं जो की एक एस्ट्रो फिजिसिस्ट हैं. अश्वत इस बीच कॉलेज के लड़कों को लोक सेवा आयोग की परीक्षा के लिए पढ़ाना शुरू कर देता है और यही उसके रुपए कमाने का एकमात्र जरिया है. इस बीच दिल्ली में सरकार बदलती है और परमाणु परीक्षा की बात फिर से उठने लगती है.

प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सचिव एक बार फिर से उस मिशन को जिन्दा करते हैं और अश्वत को उसका नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित करते हैं. अश्वत भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर, डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन, रॉ, भारतीय सेना और स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन इत्यादि से लोगों को चुनकर एक टीम का गठन करते हैं. जब परमाणु परीक्षण के लिए टीम अपना डेरा राजस्थान के पोखरण में डालती है तब उनका सामना विलेन से होता है जो एक अमेरिकन सेटलाइट है. सारी बाधाओं पर अंत में ये टीम फतह पा लेती है.

कहानी से नहीं किया कॉम्प्रोमाइज

भारत के 1998 के परमाणु परीक्षण की कहानी इतनी अनूठी है यह बात अभिषेक शर्मा की इस फिल्म को देखकर पता चलता है. लेकिन सबसे अच्छी बात यही है कि दुनिया की नजरों से अब तक इस छुपी हुई इस कहानी को कहने का अंदाज भी बेहद लुभावना है.

ऐसा नहीं है कि इस फिल्म में कमियां नहीं हैं. कमियां जरूर हैं लेकिन पूरी फिल्म के परिप्रेक्ष में आप इसको भुला सकते हैं. अभिषेक शर्मा अपने कसे हुए निर्देशन और इस फिल्म के रिसर्च के लिए बधाई के पात्र हैं. इस फिल्म में कुछ भी अनर्गल नहीं नजर आता बल्कि सच यही है कि अब तक हम हॉलीवुड की जिन थ्रिलर फिल्मों को अभी तक देखते आ रहे थे उनके मुकाबले परमाणु अपनी खामियों के बावजूद उनके पास खड़ी होती है. कहानी के साथ अभिषेक शर्मा ने किसी भी तरह का समझौता नहीं किया है.

Parmanu the story of Pokhran

कहने का आशय यह है कि जनता को लुभाने के लिए किसी भी तरह का हथकंडा नहीं अपनाया गया है. एक ऐसी फिल्म को हरी झंडी दिखाने के लिए जॉन को भी बधाइयां देनी पड़ेगी.

जॉन को डालनी पड़ेगी एक्टिंग में ‘जान’

अभिनय के मामले में सभी अपने अपने किरदार में घुसे हुए नजर आते हैं. सबसे पहले बात जॉन की ही करते हैं. जॉन को जितनी मेहनत इस फिल्म के लिए करनी थी वो सभी कुछ उन्होंने इसमें झोंक दिया है लेकिन अभी भी उनके चेहरे के एक्सप्रेशन को देखकर परेशानी होती है. बेहद ही इंटेंस सीन्स और इमोशनल मोमेंट्स के दौरान वो मात खा जाते हैं.

ये जरूर पढ़िए - क्यों रिलीज से पहले विवादों में आ गई थी परमाणु, बॉम्बे हाईकोर्ट तक चला गया था मामला

गनीमत इस बात की है कि फिल्म का पेस इतना सधा हुआ है कि आप जॉन के एक्टिंग के सारे एब भूल जाते हैं. लेकिन फिर भी उनके काम में ईमानदारी की झलक जरूर नज़र आती है. अम्बालिका के रोल में डायना पेंटी बेहद ही सहज हैं. पूरे मिशन को सुरक्षा देने वाली की भूमिका को उन्होंने बड़े ही बखूबी से अंजाम दिया है. प्रिसिंपल सचिव हिमांशु शुक्ला की भूमिका में बोमन ईरानी है और काफी समय के बाद नजर आने वाले बोमन ने अपनी प्रतिभा का परिचय एक बार फिर से परमाणु दिया है. इसके अलावा जॉन की टीम के सदस्य है आदित्य हितकारी, योगेंद्र टिक्कू और विकास कुमार और उनका भी काम बेहद सधा हुआ है.

सबसे ज्यादा तालियां लेखक के लिए

परमाणु अगर एक अच्छी फिल्म बन सकी है तो उसका सेहरा फिल्म के लेखक संयुक्ता चावला और साइवन क्वाड्रोस के सिर पर बंधना चाहिए. देखकर खुशी होती है कि इन लोगों ने एक अच्छी कहानी को सामने लाने के लिए किसी भी तरह का समझौता नहीं किया है. यह फिल्म कई मामलो में आपको शिमित अमीन की फिल्म चक दे इंडिया की याद दिलाएगी.

जॉन के किरदार का ग्राफ़ कुछ वैसा ही है जो हमने चक दे इंडिया में शाहरुख खान के साथ देखा था. इस फिल्म की एक और बड़ी बात यह है कि राष्ट्रवाद के नाम पर यह अपनी छाती नहीं पीटती है. जो कुछ भी है आपके सामने है आप उसे देखकर अपनी राय बना सकते हैं. जो भी परेशानी जॉन के बैनर की ही फिल्म मद्रास कैफे में हमे देखने को मिली थी उन सभी परेशानियों को इस फिल्म में जॉन ने इस बार दूर कर दिया है.

कहने का मतलब यही है कि फिल्म से जुड़ी जो भी इनफार्मेशन है उसको सरल शब्दों में बताया गया है जिसकी वजह से इस फिल्म की पहुंच दूर तक हो जाती है. इस हफ्ते आप 1998 के भारत के परमाणु परीक्षण की कहानी को देख सकते हैं. मनोरंजन के साथ साथ इतिहास की कुछ दबी हुई चीजों से भी आपको दो चार होने का मौका मिलेगा.

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