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REVIEW : ‘निर्दोष’ मर्डर मिस्ट्री कम और जनता के साथ धोखा ज्यादा है

दो डायरेक्टर्स ने इस फिल्म का निर्देशन करके इसे बेजान बना दिया

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Jan 20, 2018 08:10 PM IST

Abhishek Srivastava

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REVIEW : ‘निर्दोष’ मर्डर मिस्ट्री कम और जनता के साथ धोखा ज्यादा है
निर्देशक: सुब्रतो पॉल और प्रदीप रंगवानी
कलाकार: अरबाज खान, मंजरी फडनिस, राहुल देव, अश्मित पटेल

किसी फिल्म में अगर अरबाज़ खान, अश्मित पटेल, मंजरी फडनिस और महक चहल जैसे कलाकारों के नाम हों तो उस फिल्म के बारे में पहले से थोड़ा बहुत अंदेशा हो जाता है कि वो फिल्म किस तरह की होगी और वो ज्यादा पॉजिटिव नहीं होता है.

निर्दोष दिमाग को सताने वाली एक मर्डर मिस्ट्री है जो बेहद ही सतही तरीके से लिखी गई है. कम शब्दों में कहें तो निर्दोष एक ऐसी फिल्म है जिसमें बुरा अभिनय, बुरी कहानी, बुरा निर्देशन इन सभी चीज़ों का समागम है. कहने की जरुरत नहीं है की निर्दोष देखने के बाद आपको यही लगेगा कि आपने अपने पैसे और समय दोनों ही बर्बाद किए.

कहानी लुभावनी नहीं है  

फिल्म एक मर्डर मिस्ट्री है. मुकुल देव की हत्या के आरोप में उसके पड़ोसी मंजरी फडनिस (शिनाया) को पुलिस गिरफ्तार कर लेती है. इस हत्या की आगे की तफ्तीश के लिए अरबाज़ खान (इंस्पेक्टर लोखंडे) के मत्थे केस सुपुर्द किया जाता है. अरबाज़ खान का केसेस को सुलझाने का तरीका थोड़ा बहुत गैर पारंपरिक है. उसे अपराधियों को यातना देने में मज़ा आता है और अक्सर इस बात का बखान अपने सहकर्मियों से करता है कि उसने अब तक कितने अपराधियों को पकड़ा है.

 

अश्मित पटेल (गौतम), मंजरी फडनिस के पति के रोल में हैं और महक चहल (अदा) की भी तफ्तीश के दौरान फिल्म में एंट्री होती है. फिल्म की कहानी में अश्मित पटेल और महक का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर दिखाया है. एक पल ऐसा भी आता है जब मुकुल देव कहते हैं कि हत्या उन्होंने की है और दूसरी तरफ उनकी बीवी कहती है कि हत्या की जिम्मेदारी वो लेती हैं. मर्डर मिस्ट्री के इस खेल में दर्शकों को लुभाने के लिए ब्लैकमेल और सेक्स का तड़का भी मारा गया है लेकिन अंत में नतीजा वही है  - ढाक के तीन पात.

आखिर में हत्या की सुई कुल मिलकर 6 लोगों के ऊपर जाती है. जाहिर सी बात है क़ातिल कौन है इसका खुलासा यहां पर करना ठीक नहीं होगा लेकिन जिस तरीके से इसको अंजाम दिया गया है वो आपके सिर में दर्द ही पैदा करेगा.

कमजोर अभिनय ने तोड़ी फिल्म की कमर

अभिनय की बात करें तो कहानी में मुख्य किरदार अरबाज़ खान का है और उनको देखकर आश्चर्य होता है कि उनको फिल्मों में काम करने के इतने मौके कैसे मिल जाते हैं. अभिनय की बारीकियों की समझ अभी तक उनको नहीं हो पाई है. दबंग जैसी सफल फिल्म बनाने वाले अरबाज़ को अब अपने निर्देशन पर ही ध्यान देना चाहिए. एक पुलिस अफसर की भूमिका में वो कहीं से भी जान नहीं डाल पाए हैं और इसमें रंग में भंग का काम करता है इस फिल्म में उनके बेतुके डायलॉग.

मंजरी फडनिस के लिए परेशान होने का मतलब है फिल्म में चीखना चिल्लाना. इन सब में से सिर्फ अश्मित पटेल और महक चहल ही कुछ हद तक अपने अभिनय का कौशल दिखा पाए हैं.

दो कुक्स ने बिगाड़ी डिश

इस फिल्म का निर्देशन दो लोगों ने साथ मिलकर किया है - सुब्रतो पॉल और प्रदीप रंगवानी. देखकर बेहद ही आश्चर्य होता है कि इस फिल्म के निर्देशन के लिए दो लोगों की जरुरत क्यों पड़ी. इनका संयुक्त निर्देशन बेहद ही ढीला है और फिल्म में कई लूप होल्स साफ नजर आते हैं.

उनको निर्देशन की बारीकियों को सीखने में अभी और समय लगेगा. जैसे दो नाव की सवारी खतरनाक होती है कुछ यही हाल इस फिल्म का भी है. दो दिमाग जब मिले तब फिल्म अपनी पटरी से ही उतर गई. फिल्म की कहानी का ढर्रा पूरी तरह से 90 के दशक की है जो अब आउटडेटेड हो चुका है. इस फिल्म से कोसो दूर रहने में ही भलाई है.

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