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Film Review : इस ‘अज्जी’ को देखने के लिए आपको बहुत साहस जुटाना पड़ेगा 

अज्जी समाज के एक पहलू का सच सामने ले आती है और इसके लाने का तरीका बेहद ही कसैला है लेकिन यह भी सच है की आम जिंदगी के सच भी कुछ वैसे ही होते हैं

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Nov 23, 2017 02:27 PM IST

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Film Review : इस ‘अज्जी’ को देखने के लिए आपको बहुत साहस जुटाना पड़ेगा 
निर्देशक: देबाशीष मखीजा
कलाकार: सुषमा देशपांडे, विकास कुमार, अभिषेक बनर्जी

देबाशीष मखीजा की इस 104 मिनट की फिल्म में आपको एक मिनट भी चैन नहीं मिलेगा क्योंकि इस फिल्म को देखते वक़्त एक बात पक्की है कि हर वक़्त आप एक तरह का बेचैनी महसूस करेंगे. कई बार आपका मन करेगा की आप अपनी सीट से उठकर हॉल के बाहर चले जाएं और सिनेमा के परदे पर दिख रहे उन पलों को भुलाने की कोशिश करें.

अज्जी समाज के किसी कोने की एक भद्दी तस्वीर है जो कहीं ना कहीं हो रही है लेकिन फिल्म का यथार्थ इतना सटीक है की उसे देखने का मन नहीं करता है. अज्जी एक अच्छी कोशिश है लेकिन यह भी सच है की इस फिल्म के ख़रीददार बहुत कम ही लोग होंगे.

स्टोरी

अज्जी की कहानी एक गरीब बस्ती में रहने वाले परिवार की है. उस परिवार में माता पिता और बेटी के अलावा अज्जी भी है. अवयस्क बेटी मंदा का बलात्कार उसी इलाके के एक लोकल नेता के बेटे के हाथों हो जाता है. भ्रष्टाचार की तह तक डूबा एक पुलिस वाला मामले की तहकीकात और बयान लेने के लिए घर आता है लेकिन वो पूरे मामले को दबाने की कोशिश करता है और बदले में घरवालों को डराने धमकाने को कोशिश करता है ताकि नेता के बेटे के खिलाफ कोई केस दर्ज ना हो सके.

 

मंदा से बेइंतेहा प्यार करने वाली अज्जी से यह सब देखा नहीं जाता है और किसी को बताए बिना बदला लेने की ठान लेती है. अपने इस बदले को अंजाम देने के लिए वो अपनी पहचान के कसाई वाले से गोश्त कैसे काटते हैं ये तक सीखती है. अंत में उसे अपना बदला लेने का मौका जरुर मिल जाता है लेकिन बदले को अंजाम देने के लिये उसे अपने दिल पर पत्थर रखना पड़ता है.

एक्टिंग

अज्जी की भूमिका में सुषमा देशपांडे ने बेहतरीन अभिनय का प्रदर्शन किया है. अज्जी में कुल जमा चार पांच ही किरदार हैं जिनके इर्द-गिर्द पूरी फिल्म घूमती है. इंस्पेक्टर के रोल में है विकास कुमार और नेता के बेटे रोल के किरदार निभाया है अभिषेक बनर्जी ने और इन दोनों के बारे में कहना पड़ेगा कि आम सच्चाई से जितना यह दर्शकों का बोध करा सकते हैं इन्होंने इस काम को बखूबी अंजाम दिया है. सुधीर पांडे भी कसाई के रूप में इस फिल्म में नज़र आएंगे और उनका काम भी कमाल का है.

झकझोर कर रख देंगे सीन्स

फिल्म में एक सीन है जब बच्ची के रेप के बाद उसका बयान लेने के लिए पुलिस इंस्पेक्टर घर पर आता है और वहां पर जिस तरह के सवालात पूरे परिवार से किये जाते हैं वो अपने आप में दिल दहला देने वाले हैं लेकिन दर्शकों को यही लगता है की इसके बाद सीन खत्म हो जाएगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है. फिल्म टेंशन को और आगे बढ़ाती है जब इंस्पेक्टर बच्ची के गुप्तांगो की खुद जांच करने की कोशिश करता है. ये सब कुछ विचलित करने वाला है.

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निर्देशन

अज्जी समाज के एक पहलू का सच सामने ले आती है और इसके लाने का तरीका बेहद ही कसैला है लेकिन यह भी सच है की आम जिंदगी के सच भी कुछ वैसे ही होते हैं. निर्देशक ने एक स्लम में रहने वाले लोगों की कहानी के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया है और इस फिल्म की सबसे बड़ी जीत यही है.

कमाल की सिनेमेटोग्राफी

लेकिन अगर गुस्से की भावना या फिर आपके अंदर किसी तरह का उन्माद उठता है तो इसके लिये जिम्मेदार है फिल्म के सिनेमाटोग्राफर जिश्नु भट्टाचार्जी. उन्होंने अपने कैमरे को मानो उन पलों पर रोक दिया है जिसको देख कर आपके अंदर हीन भावना उत्पन्न होती है.

अज्जी एक बेहद ही कठिन फिल्म है जिसको देखने के लिए मन के अंदर साहस जुटाना पड़ेगा. अगर इस फिल्म का भविष्य पैसे से नापतोल करें तो इसमे कोई दो राय नहीं है कि इसका भविष्य अंधकारमय ही नज़र आता है क्योंकि लोगों का मनोरंजन करना इस फिल्म का उद्देश्य नहीं है. लेकिन वही दूसरी तरफ फिल्म के निर्माता और निर्देशक की भी दाद देनी पड़ेगी कि इस तरह की फिल्म बनाने का जोखिम उन्होंने उठाया.

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