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बाहुबली 2: मीलों आगे है दक्षिण भारतीय सिनेमा

पत्रकारों को आश्चर्य हो रहा है कि दक्षिण भारत ने इतने शानदार दृश्यों वाली फिल्म कैसे बनाई है

T S Sudhir Updated On: May 02, 2017 04:33 PM IST

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बाहुबली 2: मीलों आगे है दक्षिण भारतीय सिनेमा

शुक्रवार को बाहुबली 2: 'द कनक्लूजन' की रिलीज के साथ ही कुछ टीवी एंकर इसकी सफलता को कमतर करने की कोशिश में जुट गए हैं.

उनका भाव कुछ इस तरह का है कि एक दक्षिण भारतीय फिल्म निर्माता ने बॉलीवुड को परास्त कर दिया. उनमें रोष है कि एक तेलुगु फिल्म निर्माता बाहुबली 2 जैसी फिल्म कैसे बना सकता है. 450 करोड़ की यह फिल्म बड़ी पूंजी वाले बॉलीवुड की ओर से आनी चाहिए थी.

अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हुए एक-दो चैनलों और उनके एंकरों ने बाहुबली 2 को एक तमिल फिल्म बताया जो तेलुगु में डब की गई है. ऐसे में तेलुगु फिल्म बिरादरी का नाराज होना स्वाभाविक है.

तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री देश की सबसे बड़ी फिल्म बनाए और उत्तर भारत के लोग एस एस राजामौली को रजनीकांत के प्रदेश का समझें, तो नाराजगी तो होगी ही.

दिल्ली के पत्रकारों को आश्चर्य हो रहा है कि दक्षिण भारत ने इतने शानदार दृश्यों वाली फिल्म कैसे बनाई है. यह उनके तुच्छ नजरिए का परिचायक है. अगर और कुछ नहीं तो यह भारतीय सिनेमा और दक्षिण भारत की फिल्मों के बारे में उनकी नासमझी को तो दिखाता ही है.

दक्षिण सिनेमा तकनीक के प्रयोग में हमेशा आगे

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यहां इतिहास पर एक नजर डालना जरूरी है. चेन्नई (जिसे पहले मद्रास कहा जाता था) स्थित दक्षिण भारतीय सिनेमा परंपरागत रूप से उच्चकोटि की तकनीक के इस्तेमाल में आगे रहा है.

1950 के दशक में ही मद्रास में एवीएम, जेमिनी, विजयवाशिनी जैसे बेहतरीन स्टूडियो थे. मद्रास फिल्म इंडस्ट्री ने ही सबसे पहले 70 एमएम से लेकर डॉल्बीसे और स्पेशल इफेक्ट को अपनाया.

लेखक और फिल्म स्टडीज के प्रोफेसर के हरिहरन बताते हैं, 'चेन्नई हमेशा से नेशनल फिल्म सिटी रही है जिसने तमिल फिल्में भी बनाईं. इसके उलट 'मुंबई मुख्यतया क्षेत्रीय हिंदी फिल्मों का केंद्र रहा है, जिसने मुंबई जनों की मातृभाषा मराठी को छोड़कर किसी अन्य भाषा में फिल्में नहीं दी.' लिहाजा ज्यादा दर्शक होने की वजह से फिल्म के क्षेत्र में मुंबई की हैसियत बड़ी है.

आप किसी दक्षिण भारतीय फिल्मों के शौकीन से पूछें तो संभव है कि वह एन टी रामाराव की मायाबाजार को बाहुबली का बाप बताए. राजामौली पहले ही कह चुके हैं कि उन्हें 1957 में बनी इस फिल्म से प्रेरणा मिली थी.

इसे तकनीकी के इस्तेमाल के मामले में उस समय की बेहतरीन फिल्म माना गया था. कमल हासन ने भी इसे विजुअल अपील और कंटेंट के तालमेल का बेहतरीन उदाहरण बताया है.

मई 2013 में खुद राजमौली ने ट्वीट किया था, 'हममें से करीब 20 लोगों ने ब्लू-रे में मायाबाजार देखी. 7 से 17 साल के बच्चे उतने ही आनंदित हुए जितना कि हम अपने बचपन में हुए थे. यह एक कालजयी फिल्म है.'

दक्षिण भारतीय फिल्मों के बॉलीवुड रीमेक बनते रहे

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60 के दशक में हिट तमिल फिल्मों के बांग्ला और सिंहली रीमेक मद्रास के स्टुडियो में बनते थे. अस्सी और नब्बे के दशक में जितेंद्र, राजेश खन्ना और अनिल कपूर जैसे अभिनेताओं ने दक्षिण भारत की सफल फिल्मों के हिंदी रीमेक में काम किया.

‘खान-सम्मोहित’ गैर-दक्षिण भारतीय सलमान खान के फिल्मी करियर के बारे में भी पढ़ लेते तो उन्हें पता चल जाता कि क्यों दक्षिण भारत बाहुबली जैसी फिल्म बना सकता है. वांटेड, जुड़वा, बीवी नंबर 1, तेरे नाम, रेडी, किक और बॉडीगार्ड जैसी सलमान खान की सुपरहिट फिल्में तमिल, तेलुगु और मलयालम की रीमेक हैं.

कुछ ऐसा ही बॉलीवुड के दूसरे सितारे अक्षय कुमार के साथ भी है. यह इस बात का सबूत है कि कहानी कहने और तकनीकी के इस्तेमाल में दक्षिण भारत बहुत आगे रहा है.

उत्तर भारत के ज्यादातर दर्शक सेट मैक्स पर बेहद खराब ढंग से डब की गई दक्षिण भारतीय फिल्में देखते हैं. यह दक्षिण भारत की फिल्मों के स्तर को वास्तव में नीचे गिराता है. अमिताभ बच्चन को लेकर हिंदी में बनी सूर्यवंशम फिल्म को बार-बार टेलीविजन पर दिखाया जाता है.

लिहाजा उत्तर भारत के दर्शक सोचते होंगे कि दक्षिण भारत से आने वाली सबसे अच्छी फिल्म सूर्यवंशम ही होगी. अगर मलयालम सिनेमा की बात करें तो इसके पास प्रतिभाशाली निर्देशक, अभिनेता और कहानी लेखक हैं. वह विषय के चयन और ट्रीटमेंट में हमेशा सबसे अलग दिखता है.

बॉलीवुड को भारतीय सिनेमा का प्रतिनिधि मान लेना

मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के पास एक संस्कृति-विहीन स्वयंभू 'नंबर वन फिल्म क्रिटिक' कमाल आर खान है, जो राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले मोहनलाल सरीखे अभिनेता को छोटा भीम जैसा बताता है. जब मोहनलाल के फैन घेरते हैं तो उसे यह कहते हुए माफी मांगनी पड़ती है कि वह मोहनलाल के काम के बारे में नहीं जानता.

बॉलीवुड के साथ दिक्कत यह है कि वह खुद को भारतीय सिनेमा का प्रतिनिधि मानता है. कोई मोहनलाल, ममूटी, कमल हासन, इलैयाराजा और मणिरत्नम को पढ़े बगैर खुद को भारतीय सिनेमा छात्र मानने लगे तो दिक्कत तो होगी ही.

ऐसे में वे क्या करें? वे उन वजहों की तलाश करते हैं जिनकी वजह से बाहुबली पूरे भारत में हिट हो गई. उनकी नजर करण जौहर के साथ पार्टनरशिप करने के राजामौली के फैसले पर जाती है. निष्कर्ष निकलता है कि अगर करण जौहर न होते तो राजमौली को पूरे भारत के साथ 'कॉफी' पीने का मौका न मिलता.

ऐसा नहीं कि करण जौहर के साथ होने से बाहुबली को फायदा नहीं हुआ. अगर कुछ नहीं तो यह संदेश तो गया ही कि इस प्रोजेक्ट के साथ करण जौहर जैसा निर्माता-निर्देशक जुड़ रहा है तो फिल्म में कुछ तो बात होगी. अगर यह बेकार फिल्म होती तो करण जौहर पैसा न लगाते. लेकिन राजामौली को इससे मिला फायदा सर्टिफिकेट हासिल करने तक ही सीमित है.

दक्षिण को लेकर बॉलीवुड का रवैया

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दरअसल, दिक्कत रवैये से है. देश के लिए ऑस्कर समेत तमाम उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद ए आर रहमान को सिर्फ ‘मद्रास का मोजार्ट’ कहा जाता है. हम सलमान खान को ‘गैलेक्सी अपार्टमेंट्स का हीरो’ नहीं कहते. हाल ही में स्वर्गवासी हुए विनोद खन्ना को भारतीय अभिनेता बताया गया. लेकिन 2008 में गुजरे रघुवरन को टीवी चैनलों के टिकर पर भी जगह नहीं मिली.

मुझे याद है कि मुझसे एक न्यूज एडिटर ने पूछा था कि क्या वह रघुवरन को 'दक्षिण का अमरीश पुरी बताकर' बुलेटिन में ले लें.

ऐसा नहीं है कि दक्षिण भारतीय फिल्में हमेशा गुलाब की खुशबू बिखेरती हैं. चारों राज्यों में बहुत सी नॉनसेंस फिल्में भी बनती हैं.

लेकिन राजामौली का बड़ा सोचने का साहस, बाहुबली का विशाल कैनवास और उसकी सफलता का दक्षिण के फिल्म निर्माताओं पर असर पड़ेगा. उन्हें लगेगा कि उनकी फिल्में भी सफलता के झंडे गाड़ेंगी अगर उन्हें सही तकनीक के जरिए रचनात्मक तरीके से बनाया जाए.

अगर ऐसा होता है तो वे ईद, दिवाली या मकर संक्रांति का इंतजार किए बगैर अप्रैल की किसी साधारण तारीख पर अपनी फिल्में रिलीज करने साहस कर पाएंगे.

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