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'औरतनाक': वर्जनाओं को तोड़ती पाकिस्तानी स्टैंडअप कॉमेडियंस

स्टैंडअप कॉमेडी इन सारी वर्जनाओं को तोड़ती है. इससे जो आत्मविश्वास पैदा होता है, हमारा समाज उसके खिलाफ रहा है.

Updated On: Dec 19, 2016 10:52 AM IST

Manik Sharma

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'औरतनाक': वर्जनाओं को तोड़ती पाकिस्तानी स्टैंडअप कॉमेडियंस

चालाक, चतुर, पैनी परख के साथ लोटपोट कर देने वाली कॉमेडी. पाकिस्तानी स्टैंडअप कॉमेडी के इस ग्रुप की केवल यही खासियत नहीं है. 'औरतनाक' नाम के इस ग्रुप की सबसे खास बात यह है कि इसमें केवल महिलाएं हैं.

औरतनाक स्टैंडअप कॉमेडी करने में माहिर है. अभी तक पुरुषों के कब्जे वाली इस कला मे यह मुकाम औरतनाक ने अपनी टाइमिंग और पंच लाइन के दम पर हासिल किया है.

इनका लाहौर और कराची दोनो जगहों पर ग्रुप है. इन महिलाओं ने अपनी स्टैंड अप कॉमेडी से खूब प्रशंसा और सुर्खियां बटोरी हैं. इनकी पंच लाइन और एक्टिंग पितृसत्तात्मक समाज की रूढ़िवादिता पर चोट करती है. कराची की औरतनाक मंडली ने फ़र्स्टपोस्ट को दिए इंटरव्यू में ढेर सारी बातें साझा की.

फर्स्टपोस्ट: ये बताएँ कि ग्रुप बना कैसे ? पहला परफॉर्मेंस किस तरह का रहा?

जवाब: हमारे एक दोस्त हसन बिन शाहीन ने सबसे पहले ये विचार दिया. वो खुद कॉमेडियन है. उसी ने कहा कि हमें सिर्फ महिलाओं से बना ग्रुप बनाना चाहिए. इसमें स्टैंडअप कॉमेडी किया जाए.

कुछ महीनों तक वो लड़कियों को समझाता रहा कि एक बार स्टैंडअप करके देखो. वो कम से कम कुछ वर्कशॉप में हमें प्रैक्टिस करवाना चाहता था. जिसे वो खुद लीड करने वाला था.

पहला वर्कशॉप कराची में था. हम छह लड़कियों में से सिर्फ तीन को कॉमेडी आती थी. फैज़ा सलीम ने इस शो का नाम औरतनाक रखा. वो खुद इस साल के शुरू में खवातीन नाम से सिर्फ महिलाओं से बनी अलग मंडली बना चुकी है. फैज़ा के अलावा पहले वर्कशॉप में दो और लड़कियां थीं, जिन्होंने इससे पहले कॉमेडी की थी.

पहले वर्कशॉप के बाद हसन ने दो और कॉमेडियन फ़हीम आज़म और अकबर शहज़ाद को बुलाया. अगले तीन हफ्तों तक दोनों ने हमें कॉमेडी की बुनियादी चीजें सिखाईं. इसके बाद लिखने की प्रैक्टिस कराई गई ताकि हम लगातार कुछ नया प्लान कर सकें.

हमारी टीम तैयार हो रही थी. कुछ लड़कियां अभ्यास के बीच में ही हमें छोड़ कर चली गईं तो कुछ नई लड़कियां हमसे जुड़ भी गईं. हमने छह के साथ शुरू किया था और अब हमारी मंडली में 11 लड़कियां हैं.

तीसरे हफ्ते में हम लोगों ने जमकर अभ्यास किया. फ़हीम ने हमें डायलॉग बोलना सिखाया. ये भी बताया कि भाव-भंगिमा और टोन का किस तरह का ध्यान रखना है.

अकबर ने काफी मदद की. उसने अपने घर को अभ्यास घर बना दिया. वो स्क्रिप्ट की कसावट पर जोर देते थे और मूल मुद्दे पर कब पहुंचना है, बीच-बीच में पॉज कैसे लेना है ये बताते थे.

हसन हमें हमेशा उत्साहित किया करता था. जिस सब्जेक्ट से डर लग सकता था उससे निपटना और मैनेज करना वो बड़ी आसानी से हमें बता दिया करता.

अगर ये तीनों नहीं होते तो हम शायद ये नहीं कर पाते और कोशिश भी करते तो दर्शकों को मायूस कर रहे होते.

शुरुआत में भले ही हड़बड़ी रही और सबकुछ बेतरतीब सा लगा पर हसन, अकबर और फ़हीम भाई ने हमें सफल बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी.

ये रोमांचक भी था और डरावना भी. एक ओर इसका रोमांच था कि सिर्फ महिलाएं स्टैंडअप कॉमेडी करेंगी. दूसरी ओर हम खुद आश्वस्त नहीं थे कि ऐसा कर पाएंगे. तो डर भी था. हम में से अधिकांश के लिए मंच पर जाना ही पहला अनुभव होने जा रहा था.

फैज़ा सलीम ने अपने फेसबुक पेज से शो की जबर्दस्त मार्केटिंग की. जल्दी ही कराची का शो सुपरहिट रहा. शो से पहले ही सारी टिकटें बिक गई थीं. औरतनाक कराची के सफल होने के बाद लाहौर की एक दोस्त यूसरा अमजद ने भी औरतनाक मंडली शुरू करने की ठानी.

सोशल मीडिया ग्रुप में इसकी चर्चा कर उसने कुछ लड़कियों को तैयार भी कर लिया. महिलाओं में इसके प्रति रूचि बढ़ने लगी. लेकिन उन्हें ट्रेनिंग देने वाला कोई नहीं था.

सितंबर में हसन ने समय निकाला. वो एक हफ्ते की ट्रेनिंग देने के लिए लाहौर गया. इसके बाद औरतनाक ने लाहौर में दो शो किए.

हम में से कुछ लड़कियों ने शो से दो दिन पहले ही सेट तैयार किया था. हसन बहुत सारे चुटकुले सुनाकर हमारा संकोच खत्म करता और हमें बिना संकोच डायलॉग बोलने के लिए तैयार करता था.

यूसरा रिहर्सल और शो के लिए जगह तलाश रही थी. हमने दो जगह चिन्हित किए. ओलोमोपोलो जो कला और संस्कृति का केंद्र है और दूसरी जगह द लास्ट वर्ल्ड जो चर्चित बुकस्टोर है.

हमने इस बात का खास ध्यान रखा कि शो की मार्केटिंग सिर्फ वयस्कों के लिए करें. खासकर तब जब हमारा कंटेंट ही ऐसा होता था. दोनों जगहों पर शो में अलग तरह के दर्शक थे. इसका स्वरूप भी अलग था. एक ही हफ्ते में हमने ये कर दिखाया. हमें खुद भी यकीन नहीं हो रहा था.

फ़र्स्टपोस्ट: सीमा के दोनों ओर मंच पर परफॉर्म करने की बात करें तो महिलाओं के लिए स्पेस सीमित है. एक ढर्रे की तरह. कॉमेडी को पुरुष कलाकारों का विषय बताना भी इसका ही हिस्सा रहा है. आपको क्या लगता है, ऐसा क्यों है?

जवाब: हम ये नहीं मानते कि कॉमेडी पुरुषों तक ही सीमित रहा है. कॉमेडी शो में महिलाएं भागीदार रही हैं जैसे फिफ्टी-फिफ्टी. स्टेज शो में भी महिलाएं हिस्सा लेती रही हैं. हालांकि उनके परफॉर्मेंस से संकुचित मानसिकता प्रकट होती आई.

जैसे, सास को बुरा दिखाना, बहू को आज्ञाकारी दिखाना. ये कला को नई ऊंचाई पर ले जाने में मददगार कतई नहीं है. कला और मंचन में भी सामाजिक परंपरा को निभाने की वजह से हमारा विकास नहीं हो पाया. ये मेरी निजी राय है.

हालांकि जैसा मैंने पहले भी कहा अब काफी संख्या में महिलाएं भी कॉमेडी कर रही हैं. स्टैंडअप कॉमेडी का ज्यादा जोखिम भरा फॉर्म है. खासकर महिलाओं के लिए क्योंकि इसमें आवाज ऊंची रखनी होती है, बेपरवाह होकर बोलना पड़ता है. कंटेंट पर नियंत्रण भी खुद ही रखना पड़ता है.

इस तरह की ऊंची आवाज और आक्रामक अंदाज में महिलाओं को परफॉर्म करने की इजाजत हमारा समाज नहीं देता. खासकर सार्वजनिक मंच से 'फहाश' के विषयों पर चर्चा करने की अनमुति तो नहीं ही है.

Auratnaak-Lahore

जैसे बलात्कार, बाल शोषण या शादी के बाद पार्टनर से मिली निराशा जैसे विषयों पर महिलाएं नहीं बोलती हैं. परंपरागत तौर पर हम अपनी खुद की कहानियां भी सार्वजनिक मंचों से साझा करने में विश्वास नहीं रखते हैं.

स्टैंडअप कॉमेडी इन सारी वर्जनाओं को तोड़ती है. इससे जो आत्मविश्वास पैदा होता है हमारा समाज उसके खिलाफ रहा है. यहां तो महिलाओं को खुले में खुलकर हंसने से भी परहेज करने को कहा जाता है.

शायद इन्हीं कारणों से पहले महिलाएं स्टैंडअप कॉमेडी से दूर रहती होंगी. यहां तक कि औरतनाक में भी कुछ लड़कियां हैं, जिनके परिजनों को नहीं मालूम कि वो क्या कर रही हैं.

फ़र्स्टपोस्ट: आपने कई इंटरव्यू दिए और कहा है कि आपके ग्रुप की कॉमेडी नारीवादी हो यह लाजमी नहीं. लेकिन आपके कई शो पर ऐसे ही आरोप लगते है. क्या आप खास तौर पर इसका ध्यान रखती हैं कि आपके ग्रुप को कॉमेडियन ही कहा जाए न कि नारीवादी कॉमेडियन?

जवाब: हम निजी तौर पर भी इस भेद से असहज महसूस करते आए हैं. कोई कार्लिन से तो नहीं पूछता कि वो पॉलिटिकल कॉमेडियन है या सिर्फ कॉमेडियन है. निश्चित तौर पर कोई ये तो नहीं ही पूछता होगा कि क्या तुम पुरुष कॉमेडियन हो.

हम ये किसी से उम्मीद नहीं रखते कि परफॉर्म करने के दौरान किसी तरह की सामाजिक राजनीतिक विचारधारा से वो जुड़ें और हम अपनी मंडली पर किसी तरह का लेबल भी नहीं लगाते. हमारे कई सारे चुटकुले  पितृसत्तात्मक समाज पर चोट करने वाले जरूर रहे हैं.

मीडिया को भी इसी तरह का कंटेंट ज्यादा लुभाता है क्योंकि उन्हें हेडलाइन मिलती है. अगर हम पांच हैरी पोटर जोक्स करें और एक महिलाओं के पीरियड पर तो लेखों में आप सिर्फ पीरियड वाले चुटकुले की चर्चा पाएंगे. हम अपने कंटेंट में विविधता चाहते हैं.

Auratnaak-Karachi

फ़र्स्टपोस्ट: पिछले सवाल को ही आगे बढ़ाते हुए पूछें तो कॉमेडी की दुनिया में महिलाओं को आगे लाने के लिए क्या करने की जरूरत है ताकि उन पर 'फेमिनाजी' जैसे लेबल न लगें. क्या सामाजिक मुद्दों को हंसी का विषय बनाया जा सकता है अगर इसे पीड़ित पक्ष से देखें? क्या स्क्रिप्ट लिखते समय आपको इसका भी खतरा रहता है?

जवाब:  अगर हम स्टेज पर परफॉर्म कर लोगों को हंसाते हैं और उसकी तुलना नाजी जनसंहार जैसी चीजों से की जाए तो फिर भारी दिक्कत है. हमें अपने अंदर झांकने की जरूरत है.

ऐसा कहना यही बताता है कि हम किस तरह की दुनिया में रहते हैं. हमें क्या करना चाहिए ताकि हम 'फेमिनाजी' से न नवाजें जाएं. सबसे पहले तो ये कि बदलती दुनिया में सार्वजनिक स्थानों और सांस्कृतिक मंचों पर महिलाओं को सहजता से स्वीकार किया जाए और हम मानते हैं कि ऐसा हो रहा है.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या पाकिस्तान में महिलाओं की कॉमेडी के लिए स्पेस है? आपकी जो सामग्री या विषय वस्तु है उसको लेकर वहां कैसी प्रतिक्रिया मिली?

जवाब: पाकिस्तानी शहरों में और खास कर कराची में कॉमेडी के लिए काफी जगह है और ये विधा फल फूल रही है. पिछले पांच वर्षों में ये सप्ताहांत मनोरंजन का एक अहम साधन रहा है.

कई ग्रुप हैं. एलओएल वलय, द प्लाटून, द खवातून्स और इनके अलावा और भी कई. सप्ताहांत में सोलो और ग्रुप दोनों तरह की कॉमेडी के लिए दर्शक मौजूद हैं. औरतनाक की महिलाएं अभी ग्रुप में ही परफॉर्म करती हैं. सोलो हमारे लिए अभी दूर की बात है.

हमने स्टैंडअप कॉमेडी में महिलाओं को जगह दिलाकर खाई पाट दी है. पहले पुरूष ही हावी थे और उनकी कॉमेडी में पुरुषों का अनुभव ही हावी रहता था. चुटकुलों में जो पंच लाइन होते थे उनमें महिलाओं और टांसजेंडरों का मजाक उड़ाया जाता था. महिलाओं के आने से ये तस्वीर बदली है.

औरतनाक के शो के बाद एक महिला सादिया के पास आई और बोली, थैंक्यू.'

मैं पहले कभी इस तरह के कमरे में नहीं रही जहां दर्शक भी महिलाएँ हों और मंच पर उठाया गया विषय भी हमसे जुड़ा है.

मुझे इस प्रतिक्रिया से काफी खुशी मिली थी.

बहुत सारे पुरूषों को हमारे शो से असहजता महसूस हुई. उन्होंने ऐसा माना भी. लेकिन इनकी तादाद बहुत नहीं है. अधिकतर लोग औरतनाक की सराहना कर रहे हैं. मैं ये नहीं कहूंगी कि शहरी पाकिस्तान में वूमन कॉमेडी के लिए बहुत स्पेस है पर इतना जरूर है कि हम अपनी जगह बनाने लगे हैं.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या आप कहेंगी कि आपकी कॉमेडी समाज को नए सिरे से गढ़ रही है?  क्या आपको लगता है कि यहां से आगे समाज की नई सिरे से संरचना होगी? क्या ये भी आपकी जिम्मेदारी या चुनौती है?

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जवाब: हां, औरतनाक का विषय वस्तु तो ऐसा ही है. स्टैंडअप कॉमेडी की ये खासियत है.

परफॉर्मेंस किस विषय पर आधारित होता है, उसे देखें. ये मुख्य रूप से निजी अनुभवों और रोजमर्रा की चीजों पर केंद्रित है. हम किसी कपोल कल्पित दुनिया को नहीं दिखाते बल्कि वही बातें सामने लाते हैं जो दुनिया में हो रही है. इन्हीं सांसारिक विषयों से हंसी का गुब्बारा भी फूटता है.

जैसे माहवारी, ब्रा और गर्भ निरोधक का उदाहरण लें. इस पर बात करने में हमें शर्म महसूस होती है. लेकिन इससे हर लड़की हर दिन महसूस करती है. तब भी हम ऐसा दिखाते हैं जैसे ये अस्तित्व में ही नहीं है. तो जब कोई लड़की स्टेज पर ये बताती है उसे पीरियड नहीं होता तो दर्शक हंसते हैं क्योंकि उन्हें सच्चाई पता है, जिस पर वो सार्वजनिक तौर पर बहस नहीं करते.

जहां तक समाज को नए सिरे से बनाने की बात है तो ये एक चुनौती भी है और जवाबदेही भी. लेकिन किसी कला को इस तरह की जवाबदेही से लाद देंगे तो फिर वो कला रह ही नहीं जाएगी. हम तो बस ईमानदारी से अपनी कहानी कहते हैं. इसमें विविधता भी है और विरोधाभास भी.

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