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अनारकली ऑफ आरा मूवी रिव्यू: बॉलीवुड के 'मसाला रियलिज्म' में मील का पत्थर

अनारकली ऑफ आरा ग्रे व गुलाबी का अद्भुत मेल है

Madhavan Narayanan Updated On: Mar 24, 2017 05:09 PM IST

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अनारकली ऑफ आरा मूवी रिव्यू: बॉलीवुड के 'मसाला रियलिज्म' में मील का पत्थर

लक्ष्य ऊपर रखो, निशाना नीचे साधो. चटखारे के साथ जरा कड़वा मिक्स करो. बॉलीवुड के नए अवतार में आपका स्वागत है. यहां मनोरंजन के साथ दुखी करने के उतार-चढ़ाव हैं, खूबसूरत सीन्स के साथ झकझोरने के दृश्य हैं और जीवन के आशावाद के साथ परेशान करने वाली सच्चाइयां भी हैं.

अनारकली ऑफ आरा निर्देशक अविनाश दास की पहली फिल्म है. फिल्म की स्टार स्वरा भास्कर हैं. फिल्म बिहार की एक ऑर्क्रेस्टा गायिका के जीवन के उतार-चढ़ाव की कहानी है. यह उस ट्रेंड का अगला अध्याय है जिसे मैं ‘मसाला रियलिज्म’ कहना पसंद करता हूं. यह इस ट्रेंड की पहली प्रस्तुति नहीं है लेकिन अपनी कई परतों के जरिए यह इस राह में मील का पत्थर जरूर बन जाती है.

आरा हिंदीपट्टी का जाना-माना नाम है. ‘आरा हिले, पटना हिले’ वाला गाना याद है न!

फिल्म की अनारकली एक ऐसा किरदार है जो ऐसे गाने गाती जिन्हें दिल्ली, मुंबई, कोलकाता के रिक्शेवाले दिन भर की मेहनत की थकान मिटाने के लिए सुनते हैं. जब वह महिला के तौर पर अपनी गरिमा के लिए छिछोरे लेकिन राजनीतिक रूप से मजबूत वाइस-चांसलर से टकराती है तो नतीजा चौंकाता, परेशान करता है. हमें भारतीय समाज में फैले ताकत के, भ्रष्टाचार व दोहरे मानदंडों का गंदा चेहरा नजर आता है.

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अन्याय और शोषण की यह थीम भारतीय सिनेमा के लिए नई नहीं है. विमल रॉय की दो बीघा जमीन से लेकर श्याम बेनेगेल व गोविंद निहलानी की फिल्मों में हमें ये दिखाई देता है. लेकिन जो नया है वह मसाला रियलिज्म का यह नया आयाम है- इसने मेनस्ट्रीम और पैरलल सिनेमा के अंतर को खत्म किया है. साथ ही अधिक गहरी सच्चाइयों को दिखाने के लिए बेहतर तकनीक इस्तेमाल की हैं.

हम कह सकते हैं कि राम गोपाल वर्मा की सत्या (1998) मसाला रियलिज्म के आगमन का पहला बड़ा संकेत थी. इससे पहले सुधीर मिश्रा की इस रात की सुबह नहीं (1996) और इसके बाद विशाल भारद्वाज की ओमकारा, दिबाकर बनर्जी की ओए लकी, लकी ओए, सुभाष कपूर की जॉल एलएलबी और अनुराग कश्यप की तकरीबन सभी फिल्मों (खासकर गैंग्स ऑफ वासेपुर) ने इसे और समृद्ध किया.

इनकी प्रेरणा में कहीं न कहीं मार्टिन स्कोर्सोजे या क्वेंटिन टैरेन्टिनो हों लेकिन हम इन भारतीय फिल्मकारों को उनकी नकल नहीं कह सकते. यह खालिस भारतीय जीनियस हैं. इन निर्देशकों ने ह्यूमर, एक्शन, ड्रामा, पंचलाइन और संगीत के सभी मुहावरों को मिलाकर जो मसाला बनाया है, वैसा ही कुछ 60 व 70 के दशक में आरडी बर्मन ने संगीत के साथ किया था. यह पश्चिम के प्रभाव को एक भारतीय संवेदनशीलता और समझ देना था.

लहंगे में लिपटी, कमर मटकाती और फूहड़ गाना गाने वाली अनारकली के लिए जमकर सीटियां बजती हैं. वह खुद कहती है कि वह सती-सावित्री नहीं है. वह अपने शादीशुदा बिजनेस पार्टनर के साथ रोमांस करती है और पैसे के लिए ‘साइड-बिजनेस’ भी करती है. लेकिन वह एक ऐसी महिला है जो अपने काम को अपनी शर्तों पर करती है.

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जब शराब में धुत्त धर्मेंद्र चौहान स्टेज पर उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाता है तो वह उससे टक्कर लेती है. इसके बाद उसे जो झेलना पड़ता है, वह ग्रामीण बिहार के गंदे समीकरणों की दास्तान है.

चौहान के किरदार में संजय मिश्रा बिल्कुल फिट हैं. स्वरा के साथ उनकी केमिस्ट्री, फिल्म की शानदार पंचलाइन्स, ‘कर्रे’ डायलॉग्स और स्याह सच्चाई के बीच छांकता-छुपता रोमांस का रंग इस फिल्म को अलग बनाता है.

आप अनारकली ऑफ आरा को गांवों की ‘पिंक’ कह सकते हैं. अनिरुद्ध रॉय चौधरी की पिंक पिछले साल आई थी. अनारकली पिंक की अकेली, कमाऊ शहरी लड़कियों की ग्रामीण समकक्ष है, भले वह ‘ढीले चरित्र’ वाली लड़की है.

हालांकि पिंक की तरह यहां अमिताभ बच्चन की बैरीटोन आवाज नहीं है लेकिन यहां भास्कर खुद अपनी बात रखती हैं. असर कहीं कम नहीं पड़ता.

दरभंगा के जन्में अविनाश दास की सफलता यह है कि वह स्वरा व संजय मिश्रा के मुख्य किरदारों के अलावा शानदार किरदारों की एक फौज खड़ी कर देते हैं. दास के निर्देशन में छोटे किरदार (सीडी बनाने वाला, पंजाबी मकान मालकिन या प्यार का मारा दिल्ली में रहने वाला बिहारी) भी अहम हो जाते हैं. साथ ही अविनाश बिहार के खुले गांव में बसे ग्रे किरदारों से लेकर दिल्ली की भीड़ में मिलने वाले खुलेपन को बखूबी कैद कर लेते हैं.

अनारकली ऑफ आरा ग्रे व गुलाबी का अद्भुत मेल है जिसने मसाला रियलिज्म को नई ऊंचाई दी है.

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