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केजरीवाल पर बनी ये फिल्म राजनीति, मीडिया और सिनेमा के लिए सबक है

इनसिग्निफिकेंट मैन के नायक जहां अरविंद केजरीवाल हैं, प्रभावी एंटी हीरो योगेंद्र यादव हैं

Updated On: Nov 18, 2017 01:35 PM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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केजरीवाल पर बनी ये फिल्म राजनीति, मीडिया और सिनेमा के लिए सबक है

अरविंद केजरीवाल के आम आदमी पार्टी से दिल्ली के पहली बार मुख्यमंत्री बनने तक की यात्रा पर बनी फिल्म एन इनसिग्निफिकेंट मैन 17 नवंबर को रिलीज़ हो गई है. हिंदुस्तान के सबसे चर्चित राजनीतिक आंदोलन पर बनी ये डॉक्यूमेंट्री दुनिया भर में तारीफें बटोर चुकी है.

आज जब काल्पनिक मिथक और इतिहास पर बनी फिल्में लोगों की भावनाएं आहत कर रही हैं, खुशबू रांका और विनय शुक्ला की डायरेक्ट की हुई ये फिल्म हमें समकालीन इतिहास के एक बंद कमरे में ले जाती है. जिसमें मीडिया, राजनीति, जनता और आंदोलन से निकली बातों की पूरी पढ़ाई हो जाती है. कैसे अप्रासंगिक लगने वाली चीज़ें सच हो जाती हैं ये भी इस डॉक्युमेंट्री में देखने को मिलता है.

फिल्म के प्रोड्यूसर आनंद गांधी ने इससे पहले फर्स्टपोस्ट के साथ की अपनी बातचीत में बताया था कि ये फिल्म सिनेमा के तौर पर पॉलिटिकल डॉक्युमेंट्री को एक नया आयाम देती है. इसमें पर्दे के पीछे की बातों को दिखाया गया है, जो आज से पहले कभी नहीं हुआ. फिल्म आनंद के इस वादे और दावे पर पूरी तरह खरी उतरती है. पूरी फिल्म में बंद कमरों के पीछे के मीटिंग्स की भरमार है. न्यूज़ रूम में बहस खत्म होने के बाद ऐंकर और एक दूसर पर पर चिल्लाते पार्टी प्रवक्ता कैसे बदले सुर में बात करने लगते हैं ये भी दिखाया गया है.

अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी को कैसे और क्यों दिल्ली में इतनी सीटें मिली इसकी पूरी प्रक्रिया भी इस फिल्म में है. उस समय अजेय समझी जा रहीं शीला दीक्षित और आज अजेय माने जा रहे नरेंद्र मोदी की हाई प्रोफाइल सभाओं के बीच अरविंद, कुमार, प्रशांत भूषण और खासतौर पर योगेंद्र यादव के शिद्दत से तैयार कैंपेन का भारी पड़ना भी इस फिल्म में देखा जा सकता है. इसके अलावा संतोष कोली को देखना और उनका दुनिया से जाना भी एक भावुक कर देने वाला पल है.

केजरीवाल के आंदोलन से अलग एक फिल्म के तौर पर भी एन इनसिग्निफिकेंट मैन के क्राफ्ट की बात की जानी चाहिए. फिल्म के लिए लगभग 400 घंटों की फुटेज शूट की गई और उसमें से तकरीबन 100 मिनट की फिल्म बनाई गई. शॉर्ट फिल्म बनाने की उम्मीद रखने वाले तमाम नए लोगों को ये फिल्म सिखा सकती है कि छोटे स्तर पर अगर आप बेसिक फ्रेम और अच्छी कहानी वाले शॉट ले सकते हैं तो बिना हेवी कॉस्ट्यूम के डीएसएलआर पर बेहतरीन सिनेमा शूट हो सकता है.

फिल्म में कई ऐसे शॉट हैं जो खुशबू और विनय की तेज़ नजर को दिखाते हैं. एक जगह ‘आप’ की पूरी टीम चर्चा कर रही है कि दिल्ली में लाखों लोगों को पानी नहीं मिलता, पानी-पानी और पानी ही दिल्ली का सबसे बड़ा मुद्दा है. और उस समय स्क्रीन पर इन नेताओं के सामने रखीं मिनिरल वॉटर की दर्जन भर बोतलें दिखाई देती हैं.

इसी तरह फिल्म के नायक भले ही अरविंद केजरीवाल हों मगर प्रतिनायक (एंटीहीरो) योगेंद्र यादव हैं. चुनाव जीतने की खबरों के बीच एक ओर अरविंद चुनावी जीत की बात कर रहे हैं तो योगेंद्र यादव राजनीति करने का ढंग बदलने की बात कर रहे हैं. आज जब अरविंद और योगेंद्र की राह अलग हो चुकी है तो फिल्म कथानक में ये स्थापित करती है कि ये दोनों आम आदमी पार्टी और सत्ता को अलग नजरिए से देख रहे हैं.

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि इस फिल्म को राजनीतिशास्त्र, मीडिया और सिनेमा के विद्यार्थियों को देखना चाहिए. 2011 से 2017 और आने वाले 2019 में घटनाक्रम, सियासत और नायक होने के मतलब कैसे बदले हैं इसे समझने के लिए. इस फिल्म में एक सीन है जहां आजतक की ऐंकर अंजना ओम कश्यप अरविंद केजरीवाल से एक फिल्म थिएटर के बाहर सवाल पूछ रही हैं. अरविंद बातचीत के बीच कुछ नर्वसनेस, कुछ गुस्से और कुछ अस्वाभाविकता के चलते अपनी शर्ट ऐंठ रहे हैं. अरविंद केजरीवाल ऐक्टिविस्ट से मुख्यमंत्री बनने में क्या पीछे छोड़ आए हैं, इस एक शॉट में दिख जाता है.

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