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Review: थ्रिलर और कॉमेडी की भीड़ में ‘हक से’ का ड्रामा आपको लुभाएगा

हक से की कहानी मशहूर लेखिका लुइसा मे अलकोट की विख्यात नोवेल लिटिल वूमेन पर आधारित है

Updated On: Feb 09, 2018 11:41 AM IST

Abhishek Srivastava

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Review: थ्रिलर और कॉमेडी की भीड़ में ‘हक से’ का ड्रामा आपको लुभाएगा

बोस, रागिनी एम एम एस और द टेस्ट केस के बाद बहुत ही कम समय के अंदर अल्ट बालाजी ने अपनी चौथी वेब सीरीज दर्शकों के सामने परोस दी है. थ्रिलर के बाद इस बार थाली में ड्रामा परोसा गया है और कहना पड़ेगा कि निर्देशक केन घोष अपनी इस कोशिश में कामयाब रहे हैं.

किसी भी वेब सीरीज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रहती है कि उसे एक सामान्य फिल्म के बराबर कैसे रखी जाए तो जाहिर सी बात है आप वेब सीरीज के प्रोडक्शन क्वालिटी के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं कर सकते. फिल्मों की तो बात दूर है, इनके लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नेटफ्लिक्स और अमेजन के कंटेंट के वार को किस तरह से सहा जाए क्योंकि अगर इनके प्रोडक्शन बजट मिलियंस में होंगे तो सामने वाला सोचने पर मजबूर हो जाता है.

लेकिन ‘हक से’ के बारे में कहना पड़ेगा कि इसका लुक फिल्मों की ही तरह है लेकिन अगर कहानी के बारे में कहा जाए तो कुछ एपिसोड के बाद इसकी कहानी लड़खड़ा जाती है. अगर एक एपिसोड की लम्बाई महज 20 मिनट है तो ये कहने की बात नहीं है कि इसके अंदर पेस होना बहुत जरूरी है. शुरू के एपिसोड में वो तेज गति जरूर दिखाई देती है लेकिन आगे चल कर ये काफी मध्यम पड़ जाती है जिसका सीधा असर दर्शक पर होता है.

हक से की कहानी मशहूर लेखिका लुइसा मे अलकोट की विख्यात नोवेल लिटिल वूमेन पर आधारित है. जाहिर सी बात है जब ये नावेल 1868 में लिखी गई थी तब दुनिया का स्वरूप कुछ अलग था और उस वक्त अमेरिका सिविल वार की चपेट में था. हक से की कहानी को भारतीय ढांचे में रखकर इसे फिल्माया गया है और इस बार पृष्ठभूमि कश्मीर है. कहानी चार बहनों की है जो अपनी मां के साथ श्रीनगर से कुछ दूर रहती है. पिता सेना में काम करने की वजह से घर पर नहीं रहते हैं. इन चार बहनों की खाला भी हैं जिनका अधिकतर समय दिल्ली में बीतता है लेकिन कश्मीर से वो अपना रिश्ता बनाए हुए है. जब खाला कश्मीर के एक नेता के साथ इश्क मे पड़ जाती है तब पूरे परिवार में एक तरह का भूचाल आ जाता है. कहानी चार बहनों की अपनी अपनी जिंदगी के बीच चलती रहती ही जिसके केंद्र में उनके घर की कहानी है.

इसी वेब सीरीज से राजीव खंडेलवाल और सुरवीन चावला भी फिल्मों के अलावा एक दूसरे मीडियम में अपने पैर पसार रहे हैं. सुरवीन चावला, पारुल गुलाटी, निकेशा सीरीज में बहनों के रोल में दिखाई देंगी. सुरवीन चावला डॉक्टर की भूमिका में नजर आएंगी जिसकी यही कोशिश होती है कि परिवार को बांध कर चले और आर्थिक रूप से अपनी मां की मदद कर सके.

दूसरी बहन यानी कि पारुल गुलाटी एक तेज तर्रार पत्रकार की भूमिका में है जो हमेशा सच की खोज में लगी रहती है और इसी वजह से जब वो अपने खाला के आशिक के चेहरे को बेनकाब करती है तब एक तरह से हड़कंप मच जाता है. राजीव खंडेलवाल एक नो नॉनसेंस डॉक्टर रिजवी की भूमिका में नजर आएंगे जो बच्चों के अस्पताल में डायरेक्टर हैं और सुरवीन उनके साथ उनके अस्पताल में काम करती है.

हक़ से की ये समीक्षा शुरू के पांच एपिसोड के ऊपर आधारित है. अभिनय के बारे में बात करें तो सभी के बीच में बाजी मारी है पारुल गुलाटी ने. पत्रकार जन्नत मिर्जा की भूमिका में जिसे सिर्फ अपने काम से मतलब है और जवानी की दहलीज पर होने के बावजूद प्यार और इश्क जैसे शब्द उसके लिए ज्यादा मायने नहीं रखते है. इस रोल में उन्होंने पूरी तरह से जान डाल दी है. राजीव खंडेलवाल भी एक नो नॉनसेंस डॉक्टर के रोल में काफी जचे हैं और सुरवीन का कंट्रोल्ड परफॉरमेंस भी काफी लुभाता है.

अभिनय के बारे में आप ज्यादा उंगलिया नहीं उठा सकते हैं लेकिन तीसरे एपिसोड के बाद कुछ एक ऐसे सीक्वेंसेज हैं जिनको देखकर लगता है कि जबरन ठूंसे गए हैं. जब सुरवीन पार्टी में मिर्ची खाना शुरू कर देती है या फिर जब सुरवीन अपने डॉक्टर दोस्तों की बातों को सुनकर राजीव खंडेलवाल को अपनी अपनी पत्नी का हत्यारा मान कर जो हरकतें करती है वो थोड़ा अटपटा लगता है. वेब सीरीज की आजकल सबसे आम बात यही है कि ज्यादातर उनमें से थ्रिलर या कॉमेडी होते हैं और ड्रामा कम ही देखने को मिलता है. 20 मिनट अगर एक एपिसोड की अवधि है तो ‘हक से’ को आजमाने में कोई नुकसान नहीं है. ‘हक से’ एक तरह से आपको थ्रिलर और कॉमेडी के जंजाल से थोड़ा राहत दिलाएगा. इस वेब सीरीज की सबसे बड़ी कामयाबी मैं यही मानूंगा कि कश्मीर की थोड़ी-बहुत खुश्बू मिलती है.

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