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अल पचीनो: वो हॉलीवुड स्टार जिसने दुनिया भर के एक्टर्स को गुंडा बनना सिखाया

अल पचीनो के 'गॉडफादर' के किरदार माइकल कॉर्लियानी ने दुनिया के अधिकतर हीरो प्रेरित किया है

Avinash Dwivedi Updated On: Apr 25, 2017 03:25 PM IST

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अल पचीनो: वो हॉलीवुड स्टार जिसने दुनिया भर के एक्टर्स को गुंडा बनना सिखाया

1990 में अमिताभ बच्चन की फिल्म आई थी अग्निपथ. इस फिल्म में अमिताभ दर्शकों को बदले हुए लगे थे. दरअसल, अमिताभ अपनी आवाज को और मोटी करके डायलॉग बोल रहे थे. दर्शकों को फिल्म पसंद नहीं आई और बुरी तरह पिटी. बाद में अमिताभ ने पूरी फिल्म दुबारा से अपनी आवाज रिकॉर्ड की. पर फिल्म नहीं चली तो नहीं ही चली.

सिनेमा के जानकार फिल्म के न चलने के कई कारण बताते हैं. जिनमें से एक कारण है कि अमिताभ की आवाज लोगों को पसंद नहीं आई. दरअसल लोगों को अमिताभ के डायलॉग ही नहीं समझ आए कि वो कह क्या रहे हैं? ये फिल्म करण जौहर के पिता यश जौहर ने बनाई थी. इसके निर्देशक थे मुकुल एस. आनंद.

पर क्या आप जानते हैं, अमिताभ ने नॉर्मल से मोटी आवाज में डायलॉग क्यों बोले? हॉलीवुड स्टार अल पचीनो के कारण. निर्देशक मुकुल आनंद ने ही अमिताभ बच्चन को अपनी आवाज बदलने को कहा था. कारण था कि यह फिल्म हॉलीवुड की अल पचीनो अभिनीत फिल्म 'स्कारफेस' से प्रेरित थी. जिसमें अल पचीनो की आवाज भी भारी थी और बेहद हिट रही थी. दर्शकों ने आवाज और फिल्म दोनों को खूब पसंद किया था.

amitabh and al pacino

सदी का महानायक जिसको कॉपी करता है वो अल पचीनो है कौन?

अलपचीनो वही है, जिसने ऑनस्क्रीन गैंगस्टर्स और माफियाओं का रोल दुनिया भर के एक्टर्स को निभाना सिखाया. दिमाग में इस बात को जज्ब कर लें कि जब अमिताभ बच्चन एक टांग पर एक टांग चढ़ाकर सोफे पर बैठते हैं और दायें हाथ की कोहनी को दायें पैर के घुटने पर रखकर हाथ ऊपर की ओर उठाते हैं.

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या जब राजनीति फिल्म में रणबीर को थप्पड़ लगता है. या जब रक्तचरित्र में विवेक ओबराय प्रेमिका को छोड़कर पिता के बदले की ओर बढ़ते हैं. या जब गैंग्स ऑफ वास्सेपुर में नवाज, 'सबका बदला लेगा रे तेरा फैजल!' कहते हैं तो इन सबके अंदर से अल पचीनो का निभाया, माइकल कॉर्लियानी का किरदार झांकता दिखता है.

भारत की ही फिल्मों की बात करें तो हिंदी सहित दूसरी भाषाओं में बनीं, 'आतंक ही आतंक', 'सरकार', 'राजनीति', 'गैंग्स ऑफ वास्सेपुर', 'रक्त चरित्र', 'नाडुवाझिकल', 'नयागन' और 'सिंहासनम्' ऐसी फिल्में हैं जिनमें सीधे तौर पर 'दी गॉडफादर' की झलक देखने को मिलती है. 'दी गॉडफादर' से प्रेरित ऐसी सैकड़ों फिल्में दुनिया भर में बन चुकी हैं.

ranbir coping al pacino

इन सभी फिल्मों की कहानी एक सी होती है. बाप गुंडा, जिसकी मौत के बाद बड़ा बेटा उसका काम-धंधा संभालता है पर जल्द ही वो भी दुनिया को अलविदा कह जाता है. फिर माफियाराज संभालने की जिम्मेदारी आती है छोटे बेटे पर, जिसे इस तरह के काम का कोई एक्सपीरिंयस नहीं होता. फिर भी वो अपने बाप की कुर्सी संभालता है और आश्चर्यजनक रूप से उसका सच्चा उत्तराधिकारी बनकर उभरता है.

आगे चलकर वो माफियाराज, अंडरवर्ल्ड की दुनिया में अपने बाप से भी आगे निकल जाता है. इनमें से कई फिल्मों में तो सीधे-सीधे सीन भी 'द गॉडफादर' से कॉपी कर लिए गये हैं. अल पचीनो ने माफिया के किरदार इतनी संजीदगी से निभाये है कि ये किरदार दुनिया के बहुत से एक्टर्स के लिए भी मिसाल बन चुके हैं.

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अच पचीनो यानी अल्फ्रेड जेम्स पचीनो ने जीवन की शुरुआत से ही थियेटर किया है और वो इसे अपना पहला प्यार भी कहते हैं. जिंदगी में जब भी बुरी फिल्मों का दौर आया अल पचीनो ने थियेटर में लौटकर खुद को सुकून दिया. हालांकि बहुत कम ही लोग जानते हैं, करियर की शुरुआत उन्होंने स्टैंड-अप कॉमेडियन के तौर पर की थी. पर ये काम उन्होंने बहुत कम वक्त तक नहीं किया.

जिस आवाज ने पहचान दिलाई वो खो भी सकते थे अल पचीनो

हॉलीवुड में अपने वक्त में सबसे ज्यादा डिमांड में रहा बैचलर अल पचीनो, जिसने कभी शादी भी नहीं की. दरअसल अल पचीनो जिंदगी के शुरुआती दौर में ही बहुत धक्के खा चुके थे. फिर यूं ही भटकते-घूमते वो 9 साल की उम्र में ही सिगरेट पीने लगे. ज्यादा सिगरेट पीने से उनकी आवाज भारी हो गई और ये अल पचीनो की एक पहचान बन गई.

पर कभी जिस सिगरेट के चलते अल पचीनो को ये खास आवाज मिली थी. वही उनके लिए मुसीबत बन गई. 1990 के दशक में उन्हें डॉक्टर ने बताया कि अगर वो सिगरेट पीना जारी रखेंगे तो उनकी आवाज जाने का खतरा है. इसलिए उन्होंने अपनी आवाज बचाने के लिए 1994 में रोज दो पैकेट सिगरेट पीने की आदत छोड़ दी. वैसे एक वक्त तो 1980 के दशक के बीच का भी था. जब उन्होंने एक दिन में 4 पैकेट सिगरेट पीनी शुरु कर दी थी.

अल पचीनो और 'द गॉडफादर' से जुड़े कुछ अविश्वसनीय किस्से

गॉडफादर में माइकल कॉर्लियानी का क्लासिक रोल अल पचीनो की सबसे बड़ी पहचान रहा है और इसके बाद का शायद ही कोई गैंगस्टर दुनिया की फिल्मों में रहा हो जिसने माइकल के अंदाज को कॉपी करने की कोशिश न की हो. ऐसे लोगों में बॉलीवुड में सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन का भी नाम आता है. द गॉडफादर में अल पचीनो का सबसे चर्चित डायलॉग रहा था, 'अपने दोस्तों को करीब रखो, अपने दुश्मनों को दोस्तों से ज्यादा करीब.'

एक्टर, डायरेक्टर दोनों ही फिल्म के पूरा होने से पहले ही निकाले जाने से डरे हुए थे

गॉडफादर के प्रोड्यूसर इस फिल्म में किसी और को लेना चाहते थे. गॉडफादर में माइकल कॉर्लियानी का रोल उस वक्त के बड़े-बड़े हॉलीवुड स्टार करना चाहते थे. इनमें जैक निकोलसन, रेयान ओ नील, रॉबर्ट डी नीरो और ऐसे ही कई प्रख्यात कलाकार शामिल थे. पर डायरेक्टर फ्रांसिस फोर्ड कोपोला ने अल पचीनो को लेने का दिल बना लिया था.

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हालांकि प्रोड्यूसर और कुछ साथी कलाकार नहीं चाहते थे कि पचीनो इस फिल्म में रहें. इसलिए फिल्म की शूटिंग के साथ लगातार अल पचीनो और डायरेक्टर कोपोला को फिल्म से निकाले जाने का डर बना रहा. हां फिल्म पूरी हुई तो एक्टर और डायरेक्टर दोनों के लिए बहुत बड़ा ब्रेक साबित हुई.

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पैसों के मामले में डायरेक्टर कोपोला ने अल पचीनो को ऑन स्क्रीन मारने की धमकी दी

जब गॉडफादर के सभी पार्ट के डायरेक्टर रहे, फ्रांसिस फोर्ड कोपोला ने गॉडफादर- III बनाने की बात अल पचीनो से कही और पचीनो को फिल्म में कास्ट करना चाहा तो पचीनो ने इस फिल्म के लिए 70 लाख डॉलर की मांग की. इस बात से कोपोला इतना गुस्साए कि उन्होंने अल पचीनो को फिर से स्क्रिप्ट लिखने की धमकी दे डाली. कोपोला ने कहा नई स्क्रिप्ट में कहानी उनके यानी माइकल कॉर्लियॉनी की शव यात्रा से शुरू होगी. इसके बाद दोनों में 50 लाख डॉलर की बात पर सौदा पट गया.

अल पचीनो ने ऑस्कर एकेडमी को फ्रॉड बताया और सेरेमनी में नहीं गए

गॉडफादर को साल 1973 में कई अवॉर्ड और नॉमिनेशन मिले थे. नए एक्टर अल पचीनो ऑस्कर के बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के नॉमिनेशन से खुश नहीं थे. उनका तर्क था कि स्क्रीन पर उन्होंने अपने साथी कलाकार मर्लिन ब्रेंडो (गॉडफादर के ऑनस्क्रीन पिता) से ज्यादा वक्त गुजारा है. इससे पचीनो को बेइज्जती महसूस हुई और उन्होंने इसे फिल्म कैटेगरी में खुद के साथ हुआ धोखा बताते हुए 1973 में हुई ऑस्कर अवार्ड सेरेमनी का बायकॉट किया.

'गॉडफादर' मर्लिन ब्रेंडो ने भी ऑस्कर लेने से किया था इंकार

अल पचीनो अकेले नहीं थे, जिन्हें 1973 के ऑस्कर अवार्ड का विरोध किया. अपने नॉमिनेशन और बेस्ट एक्टर का ऑस्कर जीतने के बावजूद मर्लिन ब्रेंडो ने भी ऑस्कर सेरेमनी में शिरकत नहीं की. उन्होंने अपनी जगह पर नेटिव अमेरिकन लोगों के हकों के लिए काम कर रहे एक्टिविस्ट सैचिन लिटिलफीदर को अपनी जगह पर भेजा था. जब ब्रेंडो की जीता घोषित किया गया. तो लिटिलफीदर, पोडियम पर पहुंचे और अवॉर्ड लेने से मना कर दिया. उनका कहना था कि फिल्म में नेटिव अमेरिकन लोगों को गलत तरह से दिखाया गया है.

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अल पचीनो के मजेदार रिकॉर्ड

थोड़े से वक्त के लिए ही सही पर फिल्मों की वेबसाइट आईएमडीबी पर हॉलीवुड की सबसे बेहतरीन और सबसे खराब दोनों पायदानों पर अल पचीनो की ही फिल्में थीं. ये भी खुद में एक रिकॉर्ड है. बेस्ट फिल्म थी 1972 में आई 'द गॉडफादर' और सबसे खराब 2003 में आई 'गिगली'.

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ये भी एक मजेदार बात है कि अल पचीनो ने अपने करियर में 'अपोकेलिप्स नाऊ', 'बॉर्न ऑन द फोर्थ ऑफ जुलाई', 'प्रिटी वुमेन' और 'क्रिमसन टाइड' जैसी फिल्में ठुकराई हैं.

अल पचीनो और ऑस्कर

अल पचीनो ने अपना पहला ऑस्कर, पहली बार ऑस्कर के लिए नॉमिनेट होने के 21 साल बाद जीता. ये उन्हें 1992 में आई फिल्म सेंट ऑफ वुमन के लिए मिला था. 21 साल में कई बार नॉमिनेट होने के बाद ऑस्कर न मिल पाने और अंतत: ऑस्कर पाने पर पचीनो ने सबसे पहले कहा, 'आपने मेरी धारा तोड़ दी. इसके (ऑस्कर के) लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.'

पचीनो ने अपने भाषण में कहा, 'अभी एक फंक्शन के दौरान एक लड़की मेरे पास चलकर आई और उसने कहा कि मैंने उसे प्रोत्साहित किया है. जरूरी नहीं है कि केवल अपने काम से बल्कि इस बात से भी कि हम एक ही जगह से आते हैं. मैं उस लड़की को नहीं भूल सकता. मैं उन बच्चों को नहीं भूल सकता, जो आज रात (मुझे ऑस्कर पाता देखकर) ये सोच रहे होंगे कि अगर वो कर सकता है तो हम भी कर सकते हैं.'

1992 में आई फिल्म 'सेंट ऑफ वुमन' में अल पचीनो ने एक रिटायर्ड कर्नल बने थे. जो एक युद्ध के दौरान अपनी आंखें खो देता है. इस फिल्म के आखिरी में पचीनो ने सच के रास्ते को चुनने को लेकर जो जोशीला भाषण दिया है वो हॉलीवुड के बेहद चर्चित सीन्स में से एक है. स्टू़डेंट्स के बीच दिया भाषण यूं है-

मैं भी अपनी जिंदगी में चौराहों पर पहुंचा हूं.

मैं हमेशा जानता था कि सही रास्ता क्या है.

बिना शक, मैं जानता था

पर मैंने कभी वो रास्ता चुना नहीं.

आप जानते हैं क्यों?

क्योंकि साला वो बहुत कठिन था.

अभी यहां चार्ली (एक लड़के का नाम) है, जो ऐसे ही चौराहे पर पहुंचा.

इसने एक रास्ता चुना.

जो कि सही रास्ता है.

ये एक ऐसा रास्ता है जो आदर्शों से बना है.

जो कि चरित्र निर्माण तक ले जाता है.

इसे अपना सफर पूरा करने दीजिए

कमेटी, आपने अपने हाथों में इस लड़के का करियर दबोच रखा है.

ये एक मूल्यवान भविष्य है.

मेरा विश्वास कीजिए.

इसे खत्म मत कीजिए.

इसे बचाइए...

इसे बढ़ाइए...

ये एक दिन आपको गर्व से भर देगा. मैं आपसे वादा करता हूं...

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