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Review: नीरज पांडे की 'अय्यारी' एक बेतुकी फिल्म है

फिल्म की कहानी में ढेर सारी खामियां हैं

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Feb 16, 2018 04:40 PM IST

Abhishek Srivastava

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Review: नीरज पांडे की 'अय्यारी' एक बेतुकी फिल्म है
निर्देशक: नीरज पांडे
कलाकार: मनोज वाजपेयी, सिद्धार्थ मल्होत्रा, रकुलप्रीत सिंह, आदिल हुसैन, कुमुद मिश्रा, नसीरुद्दीन शाह

अय्यारी उन फिल्मों की श्रेणी में आती है जिसके लिए निर्देशक नीरज पांडे जाने जाते हैं. यानि कि ऐसी कहानी जिसमें थ्रिल होता है, डबल क्रॉस की बातें होती हैं और जहां सेना के जवानों को गुप्त मिशन में काम करते हुए दिखाया जाता है. नीरज पांडे की पहचान ए वेडनसडे, स्पेशल 26 और बेबी जैसी फिल्मों से ज्यादा है न कि एम एस धोनी से. यानि कि दूसरे शब्दों में नीरज पांडे की ये सबसे पसंदीदा दुनिया है जहां पर उनका टैलेंट उभरकर सामने आता है. लेकिन लगभग 160 मिनट की इस फिल्म में बतौर दर्शक हमें कुछ मिलता है तो वो है लम्बे-लम्बे बोरिंग सीक्वेंसेज जो आपके धीरज का इम्तिहान हर वक्त लेती है. विश्वपटल पर शस्त्रों की खरीद-फरोख्त में जो भारतीय इस भ्रष्ट व्यापार से जुड़े हैं, अय्यारी उनके बारे में बात करती है. हॉलीवुड के लिए शायद इसका ट्रीटमेंट बायें हाथ का खेल होगा लेकिन नीरज पांडे के हाथ में ये खिलौना बन गया है और उन्हें समझ में नहीं आया है कि इस विषय के साथ किस तरह से खेलना है. जरा गौर फरमाइए फिल्म के कुछ सीन्स पर. एक सीन में सिद्धार्थ मल्होत्रा अपने यूनिट के सर्वर रूम से चीजें चुराते हैं लेकिन क्लोज्ड सर्किट कैमरा को बंद करने की बात उनके दिमाग में नहीं आती है या फिर अपना पहचान पत्र वो एक रेस्टोरेंट में जान-बूझ कर छोड़ देते हैं जिसकी वजह और भी बेतुकी है. नीरज पांडे की अय्यारी एक बचकानी फिल्म है.

फिल्म की कहानी में ढेर सारी खामियां हैं

अय्यारी में आपको गुप्त मिशन, गुप्त टीम, भारतीय सेना के कुछ एक अफसर के बीच भ्रष्टाचार की बात देखने को मिलेगी. नीरज पांडे की इस फिल्म में आपको भारतीय सेना की एक गुप्त टीम जिसको डी एस डी के नाम से फिल्म में दिखाया गया है, उन्हीं के कुछ एक अफसरों के बीच मुद्दों के बीच की टकराव की कहानी दिखाई गई है.

फिल्म की कहानी कर्नल अभय सिंह की है जो सेना की एक स्पेशल यूनिट के सर्वे सर्वा हैं और गुप्त ऑपरेशन ही उनके मिशन होते हैं. अभय सिंह देश की खातिर किसी भी हद तक जा सकते हैं. उनके नायाब हैं मेजर जय बक्शी जो सेना के डिफेंस डील्स में फैले भ्रष्टाचार से दु:खी हो जाता है. उसकी सोच यही है कि डील से कुछ पैसे वो भी कमाएं. जय सिंह की सोच अभय सिंह की सोच से कहीं मेल नहीं खाती है और इसी की वजह से दोनों के बीच मुद्दों में टकराव होता है. जब अभय सिंह को जय सिंह की कारगुजारियों के बारे में पता चल जाता है तब सेना के लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं उससे पकड़ने के लिए.

160 मिनट की ये फिल्म आपके धीरज का इम्तिहान लेती है

फिल्म में एक के बाद एक मिशन के नजारे दर्शकों को होते हैं. और सच यही है कि ये सब कुछ बोर करता है. फिल्म की स्क्रीनप्ले में जगह और समय इतनी तेजी से बदलते हैं जैसे कि अटलांटिक महासागर का मौसम. कई चीजों को देखकर यही लगता है कि उन्हें जबरदस्ती फिल्म में ठूसा गया है. फिल्म में इतने फ्लैशबैक हैं कि आप एक समय के बाद उनकी गिनती खो देते हैं. कुछ सीन्स बेहद ही लम्बे बन पड़े हैं जो दर्शकों का ध्यान खींचने में कामयाब नहीं हो पाएंगे. फिल्म के क्लाइमेक्स में जब नसीर साहब की बात बताई जाती है, उसके बाद यही कहने का मन करता है कि अब बस और नहीं लिया जाता है. फिल्म का क्लाइमेक्स भी कोई खास असर नहीं छोड़ता है. फिल्म के आधे घंटे के बाद आपको पता चल जाता है कि नीरज पांडे की पकड़ फिल्म पर ढीली हो गई है.

मनोज बाजपेयी को छोड़कर सभी बेजान हैं फिल्म में

अभिनय की बात करें तो इस फिल्म में मनोज बाजपेयी पूरी तरह से छाये हुए हैं. दाद देनी पड़ेगी उनको कि एक लचर कहानी के बीच वो अपनी प्रतिभा दिखाने में कामयाब रहे हैं. सेना के एक अफसर के रोल में बाजपेयी पूरी तरह से जचे हैं. सिद्धार्थ मल्होत्रा के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है. मेहनत तो उनकी नजर आती है लेकिन उनके काम के बीच उनका अनुभव आड़े आ जाता है. एक्सप्रेशन निकालने में उनको अभी और भी सीखना पड़ेगा. लेकिन सारी गलती उनके सर नहीं मढ़ी जा सकती है. उनके किरदार के ऊपर लेखक ने मेहनत नहीं की है और उनकी जो दलील है आर्मी के खिलाफ जाने की वो कहीं से भी दमदार नजर नहीं आता है. सिद्धार्थ मल्होत्रा और रकुलप्रीत सिंह के भी सीन्स बेहद कमजोर हैं. आदिल हुसैन और कुमुद मिश्रा की धार इस फिल्म में नजर नहीं आती है. जिस शिद्दत के साथ वो जय बक्शी को पकड़ने की कोशिश करते हैं, वो स्क्रीन पर निकल कर नहीं आ पाती है. नसीरुद्दीन शाह को देखकर यही लगता है कि नीरज पांडे आज भी उनको ए वेडनेसडे के किरदार में ही देखते हैं.

अपनी तीन थ्रिलर फिल्मों में नीरज पांडे हर बार कुछ ऐसी चीजों को निकलने में कामयाब रहे थे जिनका सीधा सरोकार जनता से था और वो चीजें एक तरह से दिमाग में घर कर गई थीं. अगर ए वेडनसडे में एक आम आदमी के संघर्ष की बात कही गई थी तो बेबी में बात देश की थी, लेकिन अय्यारी में इस तरह का कोई भी हुक गायब नजर आता है. अय्यारी का परिप्रेक्ष्य भले ही भारतीय सेना है लेकिन ये फिल्म किसी भी तरह के सेंटीमेंट्स को टटोलने में नाकामयाब रहती है. ऊपरी स्तर पर फैले भ्रष्टाचार के बारे में ये जरूर बात करती है लेकिन एक उबाऊ कहानी के बीच ये कहीं छुपकर रह जाती है. इस फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट की बात की जाए तो शायद सालों बाद इस तरह की फिल्म देखने को मिली है जिसमें शानदार अभिनेताओं का जमावड़ा है लेकिन एक लचर कहानी और उबासी भरा निर्देशन इनकी कोशिशों पर पानी फेर देता है. अय्यारी को एक थ्रिलर का दर्जा देना लोगों को बेवकूफ बनाने वाली बात ही होगी. अय्यारी नीरज पांडे की निर्देशन में बनी है ये देखकर बेहद आश्चर्य होता है. सिनेमा घरों में अभी भी पद्मावत और पैड मैन चल रही है चाहे तो उनका लुत्फ एक बार फिर से उठा लीजिये या अगर आप कुछ अय्यारी किस्म की फिल्म ही देखना चाहते है तो जाइये और जाकर कोई भी हॉलीवुड की कोई थ्रिलर फिल्म देख लीजिये जिसमें सेना की बात कही गई है. अय्यारी देखना पैसे की बर्बादी ही होगी.

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