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'दंगल' में जीते आमिर: झूठे देशभक्तों और विरोधियों की करारी हार

फिल्म की कामयाबी ने आमिर खान का विरोध करने वाले, देशप्रेम का दिखावा करने वालों को अच्छा सबक सिखाया है

Updated On: Dec 26, 2016 10:58 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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'दंगल' में जीते आमिर: झूठे देशभक्तों और विरोधियों की करारी हार

आमिर खान और उनकी फिल्म का विरोध करने वालों के बीच के ‘दंगल’ का विजेता कौन रहा, इसे जानने के लिए जीनियस होने की जरूरत नहीं. आंकड़े इसकी गवाही खुद दे रहे हैं. शुरुआत के केवल तीन दिनों में ही, फिल्म की कमाई 100 करोड़ के पार पहुंच गई है. सुल्तान के बाद इस साल की ये सबसे बड़ी हिट फिल्म साबित हुई है.

फिल्म के असर की तुलना गीता फोगाट के धोबी पाट से की जा सकती है- जहां विरोधी को उठाकर, हवा में घुमाकर, गीले कपड़े की तरह जमीन पर पटक दिया जाता है. ये उनके लिए है जो फिल्म का बायकॉट कर आमिर को सबक सिखाना चाहते थे. उम्मीद है, उन्हें ये एहसास हो गया होगा कि भारत इस तरह के असहिष्णुता को बर्दाश्त नहीं करता.

फोटो. आमिर खान के ट्विटर हैंडल से साभार

फोटो. आमिर खान के ट्विटर हैंडल से साभार

दंगल के क्लाइमेक्स को किसी ने भी मिस नहीं किया होगा. जिस थियेटर में हमने पहले दिन, पहले शो में फिल्म को देखा- वहां बैन या बायकॉट की किसी भी अपील पर लोगों की प्रतिक्रिया दिखती है. फिल्म के आखिरी में जब राष्ट्रगान बजता है. कैमरा आमिर खान के चेहरे पर फोकस करता है, तब सबसे ज्यादा तालियों की गड़गड़ाहट और नारे लगते हैं (कुछ लोग 'भारत माता की जय' के नारे लगाते हैं).

दर्शक खुद खड़े हो जाते हैं

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से शुरु हुए 'जन गण मन..' को फिल्म में दो बार चलाया जाता है. फिल्म के शुरु होने से पहले, जब राष्ट्रगान चलाया जाता है तो दर्शक केवल औपचारिकतावश खड़े होते हैं. दर्शकों को अपने अंदर देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति का गुण लाना सीखना जरुरी है. लेकिन जब आमिर की जीत और खुशी मिलने पर राष्ट्रगान बजता है तो दर्शक खुद खड़े हो जाते हैं. वो आमिर जैसी ही खुशी और गौरव महसूस करते हैं.

फिल्म में जब आमिर ने देश के लिए अपना प्रेम और सम्मान दिखाया, तो देशभक्ति का झूठा दावा करने वाले लोग केवल उन कुछ पलों में लाखों बार मरे होंगे. इन लोगों ने ही आमिर को देशद्रोही करार दिया था.

दंगल

दंगल फिल्म के पोस्टर में आमिर खान और साथी कलाकार

लेकिन फिर यही असली भारत है- उदार, सहनशील, सिनेमा प्रेमी- जिसकी केवल एक विचारधार है- मनोरंजन. झूठी देशभक्ति के नाम पर ये सोशल मीडिया पर कुछ लोगों द्वारा चलाए जा रहे पक्षपात, कट्टरता और नफरत का विरोध है.

असली भारत से हमेशा ही 'धोबी पाट' 

ये कोई पहला दंगल नहीं जिसे आमिर, और शायद कहें तो भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसे जीतते हैं. सोशल मीडिया पर छाती पीटते कट्टर राष्ट्रवाद और धार्मिक पक्षपात चलाने वाले आंदोलनों को असली भारत ने हमेशा ही धोबी पाट दिया है.

हिंदू ब्रिगेड के भारी विरोध के बावजूद आमिर ख़ान की 'पीके' 2014 की सबसे बड़ी हिट फिल्म थी. उन्होंने फिल्म में हिंदू धर्म को गलत ढंग से दिखाने और उसका मखौल उड़ाने का आरोप लगाया था.

आमिर के स्नैपडील वेबसाइट का ब्रैंड एंबेसडर होने की वजह से विरोधियों ने ट्विटर पर उसके बायकॉट की बात कही थी. 'ए दिल है मुश्किल' पर बैन लगाने और बायकॉट के ऐलान के बावजूद दीवाली पर फिल्म ने अच्छा बिजनेस किया. चीनी सामान के खिलाफ विरोध जताने के बाद भी लोगों की अलमारी वहां के सामानों से भरे रहते हैं.

बॉयकॉट करने वाले अक्सर इस 'दंगल' में हार क्यों जाते हैं? इसका आसान जवाब है कि ये लोग बेकार हैं, जो कभी गुस्सा दिलाते हैं, तो कभी मनोरंजन करते हैं. इससे ज्यादा और कुछ नहीं.

शायर राहत इंदौर के शब्दों में कहें तो...

खिलाफ हैं, तो होने दो, जान थोड़ी है

ये सब धुआं है, कोई आसमान थोड़ी है

विरोधाभास में खुद दफन

इसके कई दूसरे कारण भी हैं. लंबे समय तक नफरत की भावना रख पाना मुश्किल है. भारतीय लोग ये बताया जाना पसंद नहीं करते कि, किसी मुद्दे पर उन्हें क्या करना है.

सिनेमा और उसके सितारों के लिए लोगों का प्यार सियासत से पार निकल जाता है, और खासकर सोशल मीडिया के जेहादियों की पोल खुल जाती है और वो अपने विरोधाभास में खुद दफन हो जाते हैं. जैसे कि, करोड़ों की लागत से बनने वाली विशाल मूर्ति या प्रतिमा बनाने में समर्थन करना.

साथ ही 'दंगल' के लिए 200 रुपये नहीं खर्च करना चाहिए. क्योंकि इतने पैसे से किसी गरीब का पेट भरा जा सकता है. बैन या बायकॉट की अपील करने वालों पर कभी-कभी दया नहीं दिखाना मुश्किल होता है.

वो ये सब आत्म-सम्मान के नाम पर करते हैं, हिंदुत्व के नाम पर करते हैं, देशप्रेम के नाम पर करते हैं. मालदा, बंगाल, सैनिकों, पाकिस्तान को सबक सिखाने के नाम पर करते हैं.. बस कुछ भी. बस, बायकॉट कर दे, बाबा !

दंगल की कामयाबी दिखाती है कि भारत अब भी बड़े दिलवाला और काफी उदार है. लेकिन ये केवल उनको ही अपना प्यार, सम्मान और गाढ़ी कमाई देता है जो इसके काबिल होते हैं. उनको नहीं जो राह से भटके हुए, अपना एजेंडा लागू करने के लिए इसे मांगते हैं.

बायकॉट की मांग करने वालों के लिए आखिर में ये 'हानिकारक' साबित होता है.

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