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Review: ‘थ्री स्टोरीज’ इसलिए लुभाती है क्योंकि इसकी कहानियों में बॉलीवुड का तड़का शामिल नहीं है

100 मिनट की ये फिल्म आपको बांधकर रखेगी

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Mar 09, 2018 06:42 PM IST

Abhishek Srivastava

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Review: ‘थ्री स्टोरीज’ इसलिए लुभाती है क्योंकि इसकी कहानियों में बॉलीवुड का तड़का शामिल नहीं है
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‘थ्री स्टोरीज’ की दूसरी कहानी में एक बड़ा मार्मिक सीन है. कहानी की किरदार वर्षा अपने पति की बेरोजगारी से तंग आ चुकी है और पति के शराब की लत की वजह से रोज किसी नए झगड़े से दो-चार होती है. ऐसे ही एक झगड़े के बाद जब वर्षा परेशान होकर अकेले में अपनी पति की खाली शराब के बोतल से कुछ घूंट पीने की कोशिश करती है तब उसका असर कुछ और ही होता है. एक ही सीन में वर्षा की मनोदशा से दर्शकों का परिचय हो जाता है. ‘थ्री स्टोरीज’ अर्जुन मुखर्जी की बतौर निर्देशक पहली कोशिश है और उनकी पहली कोशिश काबिले तारीफ है. खामियां हैं फिल्म में लेकिन उनको आप दरकिनार कर सकते हैं. मुंबई के एक चॉल में रहने वाले कुछ लोगों की दास्तां बयां करती ये फिल्म अपनी गति और ट्वीस्ट्स की वजह से बांध कर रखती है.

चॉल की कहानी जुदा है

फिल्म की पृष्ठभूमि मुंबई के एक चॉल की है. कहानी है इस तीन मंजिला चॉल के तीन परिवार की. पहली कहानी है फ्लोरी मेंडोसा (रेणुका शहाणे) की जिसको अपना घर बेच कर गोवा अपनी बहन के पास जाना है. विलास नायक (पुलकित सम्राट) को घर की दरकार है और घर खरीदने की उसकी खोज फ्लोरी के पास ले आती है. जब कागज पर घर के ट्रांसफर के दस्तखत हो जाते हैं उसके बाद जब कॉफी पीते वक्त एक-दूसरे से खुद के परिवार के बारे में बातें करते है तब कुछ ऐसी चीजें निकल कर सामने आती हैं जिसकी उम्मीद विलास को कतई नहीं होती है. दूसरी कहानी वर्षा के बारे में है जो अपने पति की वजह से परेशान है. शराब की लत की वजह से दोनों एक दूसरे से अनजाने हो चुके हैं लेकिन अपने बेटे हरी की वजह से इन दोनों का रिश्ता अभी तब बना हुआ है. जब वर्षा का सामना उसके पुराने प्रेमी शंकर से होता है तब दोनों की जिंदगी एक अलग करवट ले लेती है. तीसरी कहानी मालिनी और फैजल की है जो एक दूसरे से शादी करना चाहते हैं लेकिन दोनों के ही परिवार इस बात पर आमादा हैं कि उनकी शादी किसी भी हालत में नहीं हो सकती. फिल्म के अंत में इसकी वजह का खुलासा होता है जो धमाकेदार है.

100 मिनट की ये फिल्म आपको बांधकर रखेगी

पोर्टमंटो विदेश की फिल्मों का एक जॉनर है जो बेहद लोकप्रिय है. ‘थ्री स्टोरीज’ इस जॉनर में नहीं आती है लेकिन इसके काफी करीब है. पोर्टमंटो में कुछ कहानी अलग रूप से चलती है जो फिल्म के अंत में मिल जाती है. लगभग 100 मिनट की फिल्म आपको अपने सीट से बांधकर रखती है. इस फिल्म को एक थ्रिलर के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है जो ये है नहीं. तीन साधारण कहानियां हैं जो एक चॉल में रहने वाले लोगों की जिंदगी में घटती है. लेकिन सटीक निर्देशन की वजह से इसको देखने का मन करता है. इस फिल्म में कुछ चीजें हैं जो बेहद लुभाती हैं और इसकी वजह है फिल्म का शानदार स्क्रीनप्ले जो आजकल कम ही नजर आता है. लाउड साउंड ट्रैक इसमें न के बराबर है जो एक तरह से फिल्म के नैरेशन का औचित्य साबित करता है. पर्दे के घटनाक्रम को देखकर लगता है कि चीजें किसी चॉल में घट रही हैं और आप वहां पर मौजूद हैं.

सभी का फिल्म मे सटीक अभिनय

अभिनय के मामले में सभी ने कसावट बरती है और सभी का अभिनय उम्दा है. चाहे फ्लोरी मेंडोसा के रोल में रेणुका शहाणे हों या फिर वर्षा के रोल में मासूमेह या फिर शंकर के रोल में शरमन जोशी. यहां तक कि पुलकित सम्राट जिनके बारे में यही ख्याल आता है कि सलमान खान की नकल एक बार फिर से देखने को मिलेगी, ने बेहतर काम किया है. लेकिन ये भी सच है कि सलमान का हैंगओवर उनके ऊपर से पूरी तरह से गया नहीं है. रेणुका शहाणे को देखकर यही लगता है कि इस अभिनेत्री के अभिनय कौशल के साथ बॉलीवुड ने न्याय नहीं किया है. एक एंग्लो इंडियन के रोल में उनका काम बेहद शानदार है. उनको देखकर यही लगता है कि वो वाकई में एक एंग्लो इंडियन हैं. वर्षा के रोल में मासूमेह ने भी शानदार अभिनय किया है. उनका परफॉरमेंस काफी कंट्रोल्ड है और अगर शायद ये थोड़ा लाउड होता तो मुमकिन था कि इसका उतना असर नहीं होता और इसके लिए दाद देनी पड़ेगी निर्देशक को. मासूमेह की पिछली फिल्म दस साल पहले आई थी और उनको अब देखकर लगता है कि उनके अभिनय कौशल की धार पहले से तेज हो गई है. शरमन जोशी से आप उनकी हर फिल्म में उम्मीद रख सकते हैं और यहां भी उन्होंने निराश नहीं किया है. मासूमेह के पुराने प्रेमी के रोल की भूमिका को उन्होंने ईमानदारी से निभाया है.

इस फिल्म के प्रोडक्शन को देखकर लगता है कि पैसे की तंगी थी फिल्म बनाने के लिए. चाहे कैमरा वर्क हो या प्रॉप्स-देखकर लगता है कि कंजूसी बरती गई है. इस फिल्म का कैमरा वर्क बेहद ही साधारण है ये फिल्म के शूटिंग एंगल को देखकर ही पता चल जाता है. इस फिल्म की तीनों कहानियों को यही विषय जोड़ता है कि तीनों किरदारों के अतीत में कुछ न कुछ हुआ था जिसके ऊपर आजतक पर्दे लगे हुए हैं और हकीकत काफी अलग है. मासूमेह-शंकर और मालिनी- फैजल की कहानी पर तो अर्जुन ने अपनी पकड़ बनाकर रखी है लेकिन जिस कहानी से फिल्म की शुरुआत होती है उस कहानी के साथ अर्जुन न्याय नहीं कर पाए हैं. फ्लोरी को कैसे इस बात का पक्का यकीन है कि विलास उसके बेटे की कहानी के साथ जुड़ा हुआ है-इस बात को ठीक तरह से वो दर्शकों के सामने रख नहीं पाए हैं. ये कहानी काफी हद तक अधपकी लगती है लेकिन शानदार अभिनय की वजह से कुछ हद तक कलाकार इसके ऊपर सफेदी मार देते हैं. ‘थ्री स्टोरीज’ एक ऐसी फिल्म है जो सभी को अपील नहीं करेगी और इसकी वजह काफी सिंपल है. लोगों को रिझाने के बालीवुड के जो फॉर्मूले होते हैं वो इस फिल्म में नजर नहीं आएंगे. सिर्फ कहानी कहने पर ध्यान दिया गया है. अगर आप कुछ संजीदगी भरी कहानी का दीदार करना चाहते हैं जो बिना तड़के की कहानी है तो आप ‘थ्री स्टोरीज’ आजमा सकते हैं.

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