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रमजान कहें या रमादान, खुदा हाफिज या अल्लाह हाफिज

अरब का प्रभाव बढ़ने के साथ-साथ भाषा और रोजमर्रा के संबोधनों में भी अंतर आता चला गया

Seema Tanwar Updated On: May 27, 2017 05:54 PM IST

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रमजान कहें या रमादान, खुदा हाफिज या अल्लाह हाफिज

रमजान होता या फिर रमादान? दोनों में अंतर क्या है? दोनों में से सही कौन सा है? रमजान का पवित्र महीना शुरू होते ही हर साल ये सवाल आपने जेहन में कभी ना कभी उठे होंगे.

सवाल उठना भी लाजिमी है क्योंकि कहीं आप रमजान लिखा देखते हैं और कहीं रमादान. तो इन सभी सवालों का जबाव है कि रमादान कहिए या रमजान, दोनों ही सही है, दोनों का एक ही मतलब है.

अंतर है तो सिर्फ भाषा का. अरबी भाषा में इस्लामी कैलेंडर के सबसे पवित्र महीने को रमादान कहते हैं जबकि उर्दू और फारसी में रमजान.

यह ठीक वैसे ही है जैसे अंग्रेजी बोलते समय हम 'सेप्टेंबर' या 'डेसेंबर' कहते हैं और हिंदी बोलते समय 'सितंबर' और 'दिसंबर'.

भाषा विज्ञानियों का कहना है कि मूल रूप से अरबी भाषा में शब्द रमादान ही है, लेकिन पहले फारसी और फिर उर्दू में ‘द’ की जगह ‘ज़’ का इस्तेमाल होने लगा.

लंदन में रहने वाली पाकिस्तानी मूल की वकील आयशा इयाज खान पाकिस्तानी अखबार ‘ट्रिब्यून’ में अपने लेख में कहती हैं कि जब वह उर्दू में या किसी पाकिस्तानी से बात करती हैं रमजान कहना पसंद करती हैं लेकिन बात अगर किसी अरब, अमेरिकी या ब्रिटिश व्यक्ति से हो तो वह रमादान कहती हैं.

जिया जिम्मेदार?

zia ul haq

वह बताती हैं कि रमजान की जगह रमादान शब्द का इस्तेमाल 1980 के दशक में शुरू हुआ, जब खाड़ी देशों में काम करने वाले पाकिस्तान अपने वतन लौटने लगे. यह वही दौर था जब पाकिस्तान में सैन्य शासक जनरल जिया उल हक की सरकार थी और देश पर सऊदी प्रभाव के साथ साथ कट्टरपंथी रंग चढ़ना शुरू हुआ था.

भारत से भी बड़ी संख्या में लोग सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों में काम करने जाते हैं. जिस तरह ब्रिटेन या अमेरिका जाने वाले भारतीय वहां के एक्सेंट यानी अंग्रेजी बोलने के तरीके को अपना लेते हैं, ठीक उसकी तरह खाड़ी देशों में जाने वाले लोगों का रमजान को रमादान कहना भी स्वाभाविक ही है.

रमादान की तरह हाल के सालों में विदा लेते समय 'खुदा हाफिज' की बजाय 'अल्लाह हाफिज' कहने का चलन भी मजबूत हुआ है. जानकार इसे पूरी तरह पाकिस्तान में गढ़ा गया संबोधन बताते हैं.

ब्रितानी अखबार ‘द गार्डियन’ में सैयद हमद अली लिखते हैं कि जिया उल हक के दौर में 'खुदा हाफिज' की जगह 'अल्लाह हाफिज' को खूब बढ़ावा दिया गया.

कुछ मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान में पहली बार 'अल्लाह हाफिज' का इस्तेमाल 1985 में सरकारी टीवी चैनल पीटीवी पर एक जाने-माने एंकर ने किया था, हालांकि लोगों को इसे अपनाने में कई साल लग गए.

भाषा की सियासत

भाषा के स्तर पर देखा जाए तो 'खुदा हाफिज' और 'अल्लाह हाफिज' दोनों का एक ही मतलब होता है कि ईश्वर आपकी रक्षा करें. लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि जहां खुदा शब्द का इस्तेमाल किसी भी भगवान के लिए किया जा सकता है, वहीं अल्लाह शब्द का इस्तेमाल विशेष रूप से कुरान में ईश्वर के लिए हुआ है.

हमद अली के मुताबिक मजे की बात यह है कि सऊदी अरब में लोग विदा लेते हुए 'अल्लाह हाफिज' नहीं कहते हैं, बल्कि वे 'मा सलामा' या 'अल्लाह यसालमाक' कहते हैं. यानी 'अल्लाह हाफिज' संबोधन का जन्म पाकिस्तान में हुआ और यहीं से यह परवान चढ़ा है.

पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ की रिपोर्ट कहती है कि 2002 में कराची मे बाकायदा बैनर लगाकर लोगों से कहा गया कि वे 'खुदा हाफिज' की जगह 'अल्लाह हाफिज' कहें.

इस रिपोर्ट के मुताबिक आज हालत यह है कि अगर आपने किसी से विदा लेते हुए 'खुदा हाफिज' की जगह 'अल्लाह हाफिज' कह दिया तो सामने वाला आपको घूर कर देखेगा और मुमकिन है कि आपको एक लंबा चौड़ा उपदेश भी सुनना पड़े कि क्यों 'खुदा हाफिज' नहीं बल्कि 'अल्लाह हाफिज' कहना चाहिए.

कई लोग 'खुदा हाफिज' को कहीं ज्यादा बहुलतावादी मानते हैं और इसके मुकाबले 'अल्लाह हाफिज' उन्हें ज्यादा धार्मिक नजर आता है.

आयशा लिखती है कि 'असलाम अलैकुम' का जितना नियमित तरीके से इस्तेमाल पाकिस्तान में होता है, उतना तो अरब दुनिया में भी नहीं होता जबकि यह एक अरबी संबोधन है.

उनके मुताबिक वहां लोग मिलने पर 'मरहबा' जैसे शब्द का इस्तेमाल कहीं ज्यादा होता है, जो अधिक धर्मनिरपेक्ष है. इसके अलावा अरबी लोग 'सुबह अल खैर' (गुड मॉर्निंगन) या 'मासा अल खैर' (गुड इवनिंग) का भी खूब इस्तेमाल करते हैं. जानकार कहते हैं कि भाषाएं समय के साथ विकसित होती हैं और आगे बढ़ती हैं, लेकिन कुछ शब्द जब विचारों और सामाजिक ताने बाने को प्रभावित करने लगें तो विचार करने की जरूरत है.

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