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'लालबत्ती नेताओं का जन्मसिद्ध अधिकार है'

केंद्र सरकार को जाने किसने सुझाव दिया कि लाल-नीली बत्ती का खेल ही खत्म कर डाला

Piyush Pandey Updated On: Apr 20, 2017 09:09 AM IST

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'लालबत्ती नेताओं का जन्मसिद्ध अधिकार है'

एक हैं लल्लन भैया. हमारे इलाके के विधायक. इस भीषण गर्मी में कल वो अचानक ठंडे पड़ गए. उनके मुस्कुराते नूरानी गुंडई चेहरे की आभा अचानक उसी तरह गुल हुई जिस तरह यूपी के गांव-कस्बों में बिजली गुल होती है.

कोई बिजलीकर्मी लेखक अगर उनके चेहरे को परिभाषित करने की कोशिश करता तो कह सकता था कि उनके चेहरे का ट्रांसफॉर्मर अचानक फूंक गया. न्यूज चैनलों पर एक खबर रेंगना शुरू हुई और लल्लन भैया का लट्टू सा मुंह लटकता ही चला गया.

लल्लन भैया न केवल लालबत्ती धारक राजनेता थे बल्कि जब वे धारक नहीं भी थे तब भी लालबत्ती की आदत उन्हें इस कदर थी कि उन्होंने अपनी एक स्पेशल लालबत्ती, कार पर लटका रखी थी.

उन्हें नेतागीरी की प्रेरणा ही इलाके के एक लालबत्ती धारक को देखकर मिली थी. लेकिन-केंद्र सरकार को जाने किसने सुझाव दिया कि लाल-नीली बत्ती का खेल ही खत्म कर डाला.

'मान्यता प्राप्त लालबत्ती प्रेमी' लल्लन भैया को डर था कि लाल बत्ती छीने जाने के बाद उन्हें कहीं सदमे में हार्ट अटैक न पड़ जाए. हमें डर था कि कहीं वो चल बसे तो ऐसे महान लालबत्ती धारक के इंटरव्यू से हम चूक जाएंगे.

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सरकारी आदेश के बाद लाल बत्ती हटाते कर्मचारी

लालबत्ती यानि दिल..जिगर..जान

तो अपन पहुंचे सीधे लल्लन भैया के घर. दर्द उनका काफी ज्यादा था लेकिन संक्षिप्त में पेश है उसी दर्द भरी बातचीत का एक अंश:

सवाल- आपके लिए लालबत्ती का क्या महत्व है भैयाजी?

जवाब- ये कैसा बेहूदा सवाल है गुरू. लालबत्ती दिल-जिगर-जान सब है हमारे लिए. हमने अपना ऑफिशियल हनीमून मनाया था लालबत्ती की कार में. हम नेता किसलिए बने जी-लाल बत्ती के लिए. हमने राजनीति के कीचड़ में क्यों कदम रखा जी-लालबत्ती के लिए.

'लालबत्ती तो नेताओं की गाड़ी की मांग का चटख लाल सिंदूर है. बिना लालबत्ती के सरकारी गाड़ी विधवा लगेगी. लालबत्ती की गाड़ी में बैठकर दो हड्डी का कंकाल पहलवान हो जाता है. आत्मविश्वास देती है लाल बत्ती की गाड़ी.'

सवाल- आप केंद्र सरकार के फैसले को किस तरह देखते हैं?

जवाब- मुझे इसमें विदेशी समाजवादी शक्तियों का हाथ दिखाई देता है. एक जमाने में जिस तरह साम्राज्यवादी शक्तियां उत्पात मचाया करती थीं, अब समाजवादी शक्तियां मचा रही हैं. ये ऐसी ही किसी विदेशी समाजवादी शक्ति की करतूत है. लालबत्ती राजनेताओं का जन्मसिद्ध अधिकार है. लेकिन केंद्र सरकार लालबत्ती छीनकर हमारे मौलिक अधिकार का हनन कर रही है.

सवाल- लेकिन लालबत्ती तो सबकी छिनी है.आप क्यों इतने परेशान हैं?

जवाब- क्या फालतू बात करते हो जी. नेता की किसी से क्या तुलना. आईपीएस, आईएएस, जज-फज वगैरह का क्या है. थोड़ी पढ़ाई कर ली तो चार इम्तिहान पास कर लिए, बन गए बड़े बाबू और ले ली घनघनाती बत्ती. लेकिन हिन्दुस्तान में नेता बनाने वाला कोई इम्तिहान नहीं होता, कोई कोर्स नहीं होता.

'नेता बन भी गए तो सांसद-विधायक बनने का मतलब है सौ जन्मों के पापों के बावजूद सही करेक्टर सर्टिफिकेट पा जाना. लोमड़ी-भालू-बंदर-कुत्ता-बिल्ली-शेर जैसे तमाम जानवरों की योनियों में जन्म लेकर उनके गुर सीखकर जो बंदा इंसानी जन्म में भी उन्हें याद रख जाए- वो नेतागीरी में आकर कुछ कमाल करता है. '

'नेता परिश्रम से बनता है और इस परिश्रम पर गर्व का पहला अहसास तब होता है जब वो नेता लालबत्ती की गाड़ी में बैठकर अपने इलाके में निकलता है.'

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ज्यादातर सरकारी अफसरों की गाड़ियों में भी लाल बत्ती लगी होती है

प्रधानमंत्री का विरोध

सवाल- प्रधानमंत्री के इस फैसले का क्या आप विरोध करेंगे? और करेंगे तो किस तरह?

जवाब- बिलकुल करेंगे. ये कोई बात हुई भला! न खाऊंगा न खाने दूंगा का नारा देते-देते लालबत्ती में नहीं बैठूंगा और न बैठने दूंगा का नारा देने लगो. तुम्हें नहीं बैठना तो मत बैठो या कार में भगवा बत्ती लगा लो, हमें तो बिन लाल बत्ती की कार बेकार लगती है.

'इत्ते साल चापलूसी की...गुंडई की...झूठ बोला आखिर क्यों? क्या इसलिए कि जब लालबत्ती मिले तो बिना किसी गलती के छीन ली जाए. जिस तरह मैं सरकार के हर कदम की निंदा करता हूं उससे आगे जाकर मैं इस कदम की निंदा के साथ भर्त्सना भी करता हूं.'

'जहां तक विरोध का सवाल है तो हम सभी लालबत्ती गंवाचक लोगों का एक एसोसिएशन बनाएंगे, जंतर-मंतर पर धरना देंगे पीएम के खिलाफ मोर्चा निकालेंगे. इसके अलावा विरोध में अपनी गाड़ी में ऐसा स्पीकर लगाएंगे जिससे निकलते कानफोड़ू संगीत को सुनकर ही लोग कहने लगें- भइया आपके साथ अन्याय हुआ है.

सवाल- लेकिन लाल-नीली बत्ती के खत्म होने से देश में वीआईपी कल्चर खत्म होगा?

जवाब- घंटा खत्म होगा. अंग्रेजों के जाने से क्या अंग्रेजी खत्म हो गई. दारू पे पाबंदी से क्या दारूबाजी खत्म हो गई. वीआईपी कल्चर लालबत्ती में नहीं जनता की सोच में है. जनता मानती है कि लालबत्ती-नीली बत्ती वाले ही उनके माई बाप हैं तो लाल बत्ती वाले भी मानते हैं कि वो माई बाप हैं.

'अब ज्यादा बकवास ना करो...फूट लो वरना कूट देंगे. क्योंकि लालबत्ती की गाड़ी सिर्फ रौब के काम आती है, कूटने के काम में गुंडे ही आते हैं और वो हमारे पास अभी भी हैं उन्हें कोई माई का लाल हमसे छीन नहीं सकता.'

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