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लता मंगेशकर ने सबसे पहले सीखा था कौन सा शास्त्रीय राग

यमन, भैरव या भूपाली नहीं बल्कि एक मुश्किल राग से शुरू हुई थी लता जी की संगीत शिक्षा

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Oct 01, 2017 03:14 PM IST

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लता मंगेशकर ने सबसे पहले सीखा था कौन सा शास्त्रीय राग

अभी 28 सितंबर को ही लता मंगेशकर का जन्मदिन बीता है. इस खास मौके पर फ़र्स्टपोस्ट ने आपको लता जी के संगीत सफर से जुड़े कई पहलुओं से परिचित कराया था. अब क्यों ना इस बार के रागदारी में भी लता जी की ही चर्चा की जाए.

यूं तो हम रागदारी में रागों की कहानी सुनाते हैं लेकिन आज आपको लता जी के बहाने राग की कहानी सुनाता हूं. क्या आप जानते हैं कि विश्व विख्यात गायिका  और महान कलाकार लता मंगेशकर ने किस राग से अपनी संगीत साधना की शुरूआत की थी? है ना ये दिलचस्प जानकारी कि हजारों गाने गाने वाली लता मंगेशकर ने पहला राग कौन सा सीखा था?

इस सवाल का जवाब मिलता है फिल्म लेखन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार ‘स्वर्ण कमल’ से सम्मानित कृति लता सुर-गाथा में, जो यतींद्र मिश्र की लिखी हुई है. इसी किताब में यतींद्र मिश्र बताते हैं कि लता जी ने जो पहला राग सीखा वो राग था- पूरिया धनश्री. उस वक्त उनकी उम्र थी कुल 6 साल. लता जी ने ये राग अपने पिता और मशहूर नाट्यकर्मी-गायक-संगीतकार पंडित दीनानाथ मंगेशकर की गोद में बैठकर सीखा था.

यहां आपको ये बताना जरूरी है कि आम तौर पर शास्त्रीय गायकी की शिक्षा की शुरूआत राग भैरव, राग यमन या राग भूपाली से की जाती है. इन रागों की अपेक्षा राग पूरिया धनश्री कठिन राग है लेकिन लता जी की शिक्षा इसी कठिन राग से शुरू हुई. चलिए इस राग की कहानी को और आगे बढ़ाने से पहले आपको राग पूरिया धनश्री में गाया हुआ लता जी का ही एक गाना सुनाते हैं.

लता जी ने ‘मेरी सांसो को जो महका रही है’ गाना 1978 में रिलीज हुई फिल्म-बदलते रिश्ते के लिए महेंद्र कपूर के साथ गाया था. जिसे स्टेज पर रीना रॉय के ऊपर फिल्माया गया था. रीना रॉय उस फिल्म में एक म्यूजिक टीचर का रोल कर रही थीं. फिल्म में जीतेंद्र और ऋषि कपूर भी थे जबकि संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का था. इस गाने के अलावा और भी कई फिल्मी गाने हैं जो राग पूरिया धनश्री पर कंपोज किए गए हैं. इसमें कई गाने 90 के दशक में आई फिल्मों में भी तैयार किए गए.

1952 में आई फिल्म बैजू बावरा में भी राग पूरिया धनश्री पर एक गाना कंपोज किया गया था. संगीत निर्देशक नौशाद द्वारा तैयार की गई इस कंपोजीशन ‘तोरी जय जयकार’ को उस्ताद अमीर खान साहब ने गाया था. हिंदी सिनेमा की इस एतिहासिक फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि इस फिल्म के सभी गानों को शास्त्रीय रागों पर कंपोज किया गया था. जिसमें उस्ताद अमीर खान और डीवी पलुस्कर जैसे शास्त्रीय संगीत के बड़े दिग्गज कलाकारों ने भी गाने गाए थे. आइए आपको सुनाते हैं फिल्म बैजू बावरा का राग पूरिया धनश्री में कंपोज किया गया गाना.

इसके अलावा साल 1962 में आई फिल्म सूरत और सीरत का प्रेम लगन, 1981 में आई फिल्म प्रेमगीत का ‘तुमने क्या-क्या किया हमारे लिए हम ना कुछ भी कर पाए तुम्हारे लिए’, 1991 में आई फिल्म आई मिलन की रात का ‘कितने दिनों के बाद है आई सजना रात मिलन की’, 1995 में आई फिल्म रंगीला का गाना ‘हाय रामा ये क्या हुआ क्यों ऐसे हमें सताने लगे’, 1997 में आई फिल्म आस्था का ‘लबों से चूम लो’ और  1999 में आई फिल्म 1947: अर्थ का गाना रूत आ गई रे, रूत छा गई रे राग पूरिया धनश्री पर आधारित है. फिल्म रंगीला और 1947: अर्थ का संगीत ए आर रहमान ने तैयार किया था. आइए इनमें से कुछ गाने आपको सुनाते हैं.

राग पूरिया धनश्री पर कंपोज किए गए एक और गीत की चर्चा जरूरी है. 'कोयलिया उड़ जा यहां नहीं’ गीत मुकेश ने गाया था. ये गाना किसी फिल्म में तो इस्तेमाल नहीं हुआ लेकिन मुकेश की गायकी को पसंद करने वाले लाखों लोगों को ये गीत पसंद है. आइए आपको ये गाना भी सुनाते हैं.

आइए अब आपको हमेशा की तरह राग के शास्त्रीय पक्ष की जानकारी देते हैं. आज का राग है पूरिया धनश्री. इस राग की उत्पत्ति पूर्वी थाट से हुई है. इस राग में ‘रे’ और ‘ध’ कोमल और तीव्र ‘म’ लगते हैं. बाकि के सभी स्वर शुद्ध लगते हैं. इसके आरोह अवरोह में सात-सात स्वर लगते हैं इसलिए राग पूरिया धनश्री की जाति संपूर्ण संपूर्ण होती है. इस राग का वादी स्वर ‘प’ और संवादी ‘रे’ है. वादी-संवादी स्वर के बारे में हम पहले भी आपको बता चुके हैं कि किसी राग में वादी-संवादी स्वर का महत्व शतरंज के बादशाह और वजीर की तरह होता है। इस राग को गाने बजाने का समय शाम का होता है. आइए आपको राग पूरिया धनश्री का आरोह अवरोह और पकड़ भी बताते हैं.

आरोह- ऩी रे ग म प, म नी सां

अवरोह- रे नी प, म ग, म रे ग, रे सा

पकड़- ऩी रे ग म प, प, म ग म, रे ग, रे सा

(सभी म तीव्र हैं)

इस राग में राग पूरिया और राग धनश्री यानी दो रागों का मिश्रण है. इस राग की बारीकियों को और विस्तार से जानने के लिए आप एनसीईआरटी का ये वीडियो देखिए.

राग पूरिया धनश्री की शास्त्रीय प्रस्तुतियों में आज आपको पंडित कुमार गंधर्व का गाया राग पूरिया धनश्री सुनाते हैं. इसके साथ-साथ आपको सुनाते हैं पंडित कुमार गंधर्व की शिष्या रहीं शुभा मुद्गल का गाया राग पूरिया धनश्री. यहां आपको यह बताना जरूरी है कि पंडित कुमार गंधर्व शास्त्रीय संगीत के शिखर पुरूष होने के बाद भी किसी घराने की गायकी को ‘फॉलो’ नहीं करते थे. जाने-माने पत्रकार स्वर्गीय प्रभाष जोशी पंडित कुमार गंधर्व के बारे में कहा करते थे कि वो घरानों की कुलीगीरी नहीं करते हैं. सुनिए पंडित कुमार गंधर्व और उनकी शिष्या रही शुभा मुदगल का राग पूरिया धनश्री.

शास्त्रीय गायकों की तरह की शास्त्रीय वाद्ययंत्रों को बजाने वाले कलाकारों में भी राग पूरिया धनश्री काफी लोकप्रिय है. शायद ही किसी कलाकार ने इस राग मंच पर ना बजाया हो. शास्त्रीय गायकी में राग पूरिया धनश्री के बाद आपको विश्व विख्यात सरोज वादक उस्ताद अमजद अली खान और नए कलाकारों में सितार वादक अनुष्का शंकर का बजाया राग पूरिया धनश्री सुनाते हैं.

अगले हफ्ते एक और नए शास्त्रीय राग के कहानी किस्सों के साथ आपसे मुलाकात होगी.

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