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अगले जनम मोहे जोगिन ही कीजो...

भारत की जोगी जनजाति के परंपराएं और रीति-रिवाज अद्भुत हैं

Nazim Naqvi Updated On: Jun 18, 2017 12:15 PM IST

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अगले जनम मोहे जोगिन ही कीजो...

‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ क़ुर्रतुल ऐन हैदर का उपन्यास है. यह मामूली नाचने-गाने वाली दो बहनों के इर्द-गिर्द घूमता है लेकिन मर्दों के छलावे को इतनी खूबसूरती से कहानी में पिरोता है कि भावनाओं का खोखलापन अपने आप उजागर हो जाता है.

उत्तर प्रदेश में कन्नौज जिले की सीमाओं से सटे ककवन विकास खंड में मनावां गांव के जोगिन डेरा के सामने, ये एहसास कुछ ज्यादा ही हो गया कि काश क़ुर्रतुल ऐन हैदर ने इस जोगी जनजाति को भी देख लिया होता तो शायद मर्दों की दुनिया से उनका यकीन ऐसे न उठता.

जिस समाज में औरत का मुकाम बुलंद होगा, वहां मर्दों का किरदार खुदबखुद ऊंचा हो जाता है. एक बात और, मिटटी और घास-फूंस से बनी इस बस्ती में आकर शिद्दत से जो बात महसूस होती है वो ये कि, ये गलत है कि सामाजिक विषमताओं में आर्थिक तंगी का ही हाथ होता है.

ये जोगिन का डेरा है, इसके कई रंग हैं, कई रूप हैं, लेकिन जिस वजह से या यूं कहूं जिस कौतूहल की उंगली पकड़ कर यहां तक पहुंचा हूं, वो हैं अपनी औरतों के प्रति इस समुदाय कि मान्यताएं.

जोगी जनजाति के लोगों की शादी में दुल्हन के बदले दुल्हन देने कि परंपरा है. अगर किसी घर में लड़की नहीं है और उस घर के लड़के को शादी करनी है, तो हो सकती है ऐसी शादी, लेकिन इस शर्त के साथ कि लड़के को लड़की के घर में जमाई बनकर सारी उम्र रहना पड़ेगा.

काम बदला है, पहचान नहीं

Nagin Band

वक्त के साथ बहुत कुछ बदलता है, बदलाव कुदरत का नियम है. जो परिवर्तन की अनित्यता को समझता है वही समझदार कहलाता है. इस समुदाय ने भी समय के साथ खुद को बदला है. जैसे इनके पेशे को ही ले लीजिए. दरअसल ये संपेरे हैं, लेकिन जब से सरकार ने सांप पकड़ने को अवैध कर दिया है, इन्होंने भी अपने धंदे बदले हैं, अब ये मेहनत-मजदूरी करते हैं कइयों ने ‘नागिन-बैंड’ खोल लिए हैं.

लेकिन जो नहीं बदला है वो है इनका अपने पूर्वजों के बनाए हुए कबीलाई नियमों पर, परंपराओं पर अडिग रहना. जिसकी वजह से इनके समुदाय का भाईचारा बचा हुआ है. इसके अलावा जो सबसे बड़ी बात बल्कि यूं कहिए कि इस समुदाय को सलाम करने वाली बात है, वो ये कि इनके यहां कन्या भ्रूण हत्या नहीं होती क्योंकि इस समुदाय की सबसे कीमती वस्तु, इनकी औरत है.

अभी तीन-चार साल पहले कन्नौज के ही पास औरय्या जिले के ढिकियापुर में नाथ सम्प्रदाय की महाअदालत लगी तो राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार और उत्तराखंड से करीब चालीस हजार जोगी इकठ्ठा हुए थे. वैसे तो ये महाअदालत सरकार से अनुसूचित जनजाति में जोगियों को शामिल करने का मुद्दा उठा रही थी लेकिन यहां ये बताने के लिए ये बात निकल आई है कि ‘संपेरे’ और ‘जोगी’ जैसे शब्दों से ये अर्थ न निकाल लिया जाय कि ये कोई असंगठित और बंजारे किस्म के लोग हैं. 40 हजार लोगों की मौजूदगी ये बताने के लिए काफी है कि ये पूरे देश में संगठित भी हैं और अपनी मांगों को लेकर जागरूक भी.

अद्भुत रीति रिवाज 

यहां लड़के वालों को जिस परिवार से दुल्हन लानी है उस परिवार में अपनी लड़की की शादी करना अनिवार्य है. इस परंपरा को ये लोग ‘साटा-पलटा’ कहते हैं.

एक और खास बात, शादी तय हो जाने के बाद, दोनों पक्षों में तय समय तक लड़के को होने वाली ससुराल में रहकर मवेशी चराने पड़ते हैं. जंगलों से हरा चारा लाना पड़ता है. इस पर खरा उतरने पर लड़की उसे सौंप दी जाती है. संदेश साफ है जो मवेशियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर सकता वो किसी औरत को अपने साथ कैसे रख सकता है. और हां, लड़के को सांप पकड़ने कि कला आना अनिवार्य है.

शिव की आराधना करने वाली जोगी-जनजाति का मूल निवास भारत है, विभाजन के बाद इनकी कुछ आबादी पकिस्तान के खैरपुर, सिंध इलाके में भी है जहां ये मुसलमान हैं और राजपर जोगी कहलाते हैं. ये कब मुसलमान हुए ये तो पता नहीं लेकिन इन्होंने जोगिया लिबास को वहां भी नहीं छोड़ा है.

मनावां जोगिन डेरा

इनके रीति रिवाज भी अनोखे हैं. शादी कि तिथि तय होने के बाद मुखिया पंचायत बुलाकर सभी को शादी में आने का न्योता देता है. शादी के दिन बारातियों को और मेहमानों को साथ में दूध और मक्खन लाना अनिवार्य है. शादी के भोजन में लोगों को चावल, घी और बूरा कि दावत दी जाती है.

एक और खास बात, शादी से एक दिन पहले दूल्हा और दुल्हन, दोनों घरों में मेंहदी कि रस्म होती है जिसमें पूरी रात सूफियाना अंदाज में ‘बैत’ गई जाती है. ये महिला संगीत नहीं बल्कि पुरुष-संगीत होता है. वाद्य-यंत्रों का इस्तेमाल पूरी तरह वर्जित होता है.

समुदाय के मुखिया शरीफनाथ बताते हैं कि हमारे यहां शादी के नियम थोड़े कड़े ज़रूर हैं लेकिन हम मानते हैं कि इससे हमारा आपसी भाई-चारा बढ़ता है और लड़की या लड़के के परिवार पर आर्थिक बोझ भी नहीं आता.

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