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जिस गाने के लिए बड़े गुलामअली खान को रफी से 50 गुना पैसे मिले थे

इस बार कहानी राग सोहना की

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Oct 15, 2017 10:47 AM IST

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जिस गाने के लिए बड़े गुलामअली खान को रफी से 50 गुना पैसे मिले थे

आज की कहानी उस एतिहासिक फिल्म से जुड़ी हुई है जो भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक है. वो फिल्म है- मुगले-आजम. इस फिल्म को बनाने में लंबा वक्त लगा था. फिल्म को बनाने के बारे में के आसिफ ने 1944 में ही सोच लिया था लेकिन कुछ ना कुछ वजहों से फिल्म बनाने में करीब 16 साल लग गए. फिल्म के लिए हीरो हीरोइन को तय करने में भी कई नाटकीय मोड़ आए थे. कहते हैं कि अनारकली का रोल पहले सुरैया को ऑफर किया गया था. बाद में वो रोल मधुबाला ने किया.

फिल्म के निर्देशक के आसिफ और दिलीप कुमार में भी शुरू में असहमति ही थी. ये भी कहा जाता है कि दिलीप कुमार इस फिल्म को करना ही नहीं चाहते थे बाद में फिल्म के निर्माता के समझाने पर वो रोल करने को तैयार हुए. एक दिलचस्प किस्सा ये भी है कि राजकुमार सलीम के कम उम्र वाले रोल के लिए तबला उस्ताद जाकिर हुसैन का नाम तय किया गया था लेकिन बाद में जलाल आगा ने वो रोल किया. जलाल आगा की वो पहली फिल्म थी.

सच्चाई ये है कि इस फिल्म के बनाए जाने से लेकर रिलीज होने तक ऐसे दर्जनों किस्से हैं जिसकी बदौलत हम मुगले-आजम को भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे चर्चित फिल्म मानते हैं. ये तो हम जानते ही हैं कि इस फिल्म ने कामयाबी के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. इसके अलावा इंटरनेट पर मौजूदा जानकारी के हिसाब से 60 के दशक में इस फिल्म को बनाने में करीब डेढ़ करोड़ रुपये खर्च हुए थे.

इस फिल्म के कई डायलॉग ऐसे हैं जो फिल्म के रिलीज होने के आधी सदी से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी लोगों को याद हैं. यही इस फिल्म का जादू भी है. इस कॉलम में हम हमेशा किसी शास्त्रीय राग की बात करते हैं. आज भी करेंगे लेकिन पहले फिल्म मुगले-आजम के चुनिंदा डायलॉग सुनकर एक बार फिर अपनी यादों को ताजा कर लेते हैं.

खैर, चलिए अब इस फिल्म के बहाने हम अपने आज के राग की बात करते हैं. इस फिल्म के निर्माता निर्देशक ने फिल्म के संगीत के लिए नौशाद साहब को चुना था. नौशाद तब तक फिल्म इंडस्ट्री में करीब दो दशक का वक्त बिता चुके थे. उन्हें एक कामयाब संगीतकार के तौर पर पहचान मिल चुकी थी. उन्होंने उस वक्त तक करीब पचास फिल्मों का संगीत तैयार किया था. जिसमें तमाम गानों को खूब कामयाबी मिली थी. बैजू बावरा और मदर इंडिया जैसी कामयाब फिल्में आ चुकी थीं. जाहिर है कि नौशाद बड़े फिल्मकारों की पहली पसंद बन चुके थे.

कहते हैं के आसिफ पैसों से भरा बीफ्रकेस लेकर नौशाद साहब के पास गए और उन्होंने उन्हें ब्रीफकेस सौंपते हुए कहा कि इस फिल्म के लिए यादगार संगीत तैयार कर दीजिए. नौशाद को के आसिफ का ये तरीका पसंद नहीं आया उन्होंने वो ब्रीफकेस वापस कर दिया. बाद में के आसिफ को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने नौशाद साहब की पत्नी को समझा बुझा कर उन्हें राजी कराया. ऐसे में नौशाद साहब फिल्म मुगले-आजम के संगीत को तैयार करने का जिम्मा उठाने को तैयार हुए. इस फिल्म में उन्होंने उस्ताद बड़े गुलाम अली खान से दो गाने गवाए. इनमें से एक गाना आपको सुनाते हैं. बोल हैं- प्रेम जोगन बन के.

इस गाने को नौशाद साहब ने राग सोहनी में कंपोज किया था. जैसा कि हमने शुरू में ही कहा था कि इस फिल्म के साथ जुड़े किस्सों की भरमार है. एक और खूबसूरत किस्सा ये है कि निर्देशक के आसिफ ने जब उस्ताद बड़े गुलाम अली खान से फिल्म में गाने की गुजारिश की तो खान साहब ने साफ मना कर दिया. उन्होंने कहाकि उन्हें फिल्मी गीत गाने में कोई दिलचस्पी नहीं है. इस पर के आसिफ ने उन्हें मुंहमांगी कीमत देने की बात कही.

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कहते हैं कि बड़े गुलाम अली खान ने एक गाने के लिए 25,000 की रकम मांगी. इस रकम का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि उस दौर में बड़े बड़े फिल्मी गायकों का पारिश्रमिक 500 रुपये से ज्यादा नहीं होता था. बावजूद इसके के आसिफ तैयार हो गए. उन्होंने बड़े गुलाम अली खान को एडवांस पैसा भी दे दिया. लगे हाथ ये भी बताते हैं कि के आसिफ भी बड़ी हस्ती थे.

इटावा के एक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार में जन्म लेने वाले के आसिफ का नाम आसिफ करीम था. बॉम्बे जाने के बाद उन्होंने अपना नाम के आसिफ रखा. उन्होंने अपनी 48 साल की छोटी सी जिंदगी में सिर्फ दो फिल्में बनाई. फूल और मुगले-आजम. तीसरी फिल्म अधूरी रह गई थी. के आसिफ ने इस फिल्म के लिए करीब 20 गाने तैयार कराए थे. जिसमें से कुछ गाने फिल्म में नहीं रखे गए.

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फिल्म मुगले-आजम की कहानियों से बाहर निकलने का दिल तो नहीं कर रहा है लेकिन हमें अपने आज के राग के बारे में भी आपको बताना है. उस्ताद बड़े गुलाम अली खान के इस गाने के अलावा और भी कई कंपोजीशन हैं जो इस राग पर तैयार की गई हैं. इसमें से 1957 में आई फिल्म-स्वर्ण सुंदरी का ‘कुहु कुहु बोले कोयलिया’, 1962 में रिलीज फिल्म- संगीत सम्राट तानसेन का ‘झूमती चली हवा याद आ गया कोई’ और 1963 में आई फिल्म- गृहस्थी का ‘जीवन ज्योत जले’ काफी सुने और सराहे गए थे. इसमें से आपको एक गाना सुनाते हैं.

चलिए अब आपको राग सोहनी के शास्त्रीय पक्ष की जानकारी भी देते हैं. इस राग की उत्पत्ति मारवा थाट से है. राग सोहनी में कोमल ‘रे’ और तीव्र ‘म’ लगता है. इस राग में ‘प’ नहीं लगता है. साथ ही आरोह में ‘रे’ भी नहीं लगाया जाता है. रात के अंतिम पहर में गाए बजाए जाने वाले इस राग का वादी स्वर ‘ध’ और संवादी स्वर ‘ग’ है. इस राग को चंचल प्रवृत्ति का राग माना जाता है. राग सोहनी का आरोह अवरोह देखते हैं.

आरोह- सा, ग, म(तीव्र) ध नी सां

अवरोह- सा नी ध, म (तीव्र) ग, म (तीव्र) ध म(तीव्र) ग रे सा

पकड़- सा, नी ध म(तीव्र) ग, म (तीव्र) ध नी सां

हमेशा की तरह हम आपको एनसीईआरटी का बनाया ये वीडियो दिखाते हैं. जिसमें राग सोहनी के बारे में और विस्तार से जानकारी दी गई है.

राग सोहनी के शास्त्रीय पक्ष के वीडियो में आज आपको संतूर पर पंडित शिवकुमार शर्मा का राग सोहनी सुना रहे हैं और गायकी में कलापिनी कोमकली जी को सुनते हैं. कलापिनी कोमकली महान शास्त्रीय गायक पंडित कुमार गंधर्व की बेटी हैं और कमाल की शास्त्रीय गायिका हैं.

अगले हफ्ते फिर एक नए राग के साथ मुलाकात होगी.

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