विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

तस्लीमा नसरीन का निर्वासन: प्रतिबंध और सेंसरशिप की दास्तान

मेरी किताबों को बैन किया गया, शारीरिक रूप से हमला किया गया और आखिरकार निकाल दिया गया.

Manik Sharma Updated On: Dec 05, 2016 11:31 AM IST

0
तस्लीमा नसरीन का निर्वासन: प्रतिबंध और सेंसरशिप की दास्तान

बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन अपनी नई किताब के साथ वापस आ गई हैं- इस बार 'एक्जाइल' नाम के अपने संस्मरण के साथ.

इसे पेंगुइन बुक्स ने छापा है. इस किताब में उन सात महीनों के संघर्ष का जिक्र है जो पश्चिम बंगाल, राजस्थान और भारत से उनके निकाले जाने की वजह बनी.

'उस वक्त वह नजरबंद थीं.  वे चिंता भरे दिन जो उन्होंने सरकारी सेफ हाउस में गुजारे. जब उन्हें घेरे रहने वाले नौकरशाह बड़ी बेचैनी से इस ताक में थे कि वे चली जाएं.’

हिन्दू और इस्लाम को भी आड़े हाथों लिया

फ़र्स्टपोस्ट को दिए एक साक्षात्कार में नसरीन ने एक लेखक के निर्वासन पर बात की. उन्होंने दोनों धर्मों (हिन्दू और इस्लाम) को भी आड़े हाथों लिया.

साथ-साथ उन्होंने अपने लेखन में पितृसत्ता और अपने उपन्यासों के सामाजिक सच्चाईयों से जुड़ाव पर भी विचार रखे.

आपके लेखन के प्रतिबंधित होने से लेकर, बहिष्कार, देशनिकाला और पैनल के लोगों द्वारा चर्चा और बहसों में आपके साथ स्टेज शेयर करने से इनकार, आप पर किसी न किसी तरह से हमला किया गया है. इन सबमें किस चीज ने आपको सबसे ज्यादा दुखी किया और क्यों?

हर तरह का प्रतिबंध दुखी करता है. लेकिन देशनिकाला सबसे ज्यादा तकलीफ देता है. देशनिकाला ने मेरे पांवों के नीचे की जमीन खींच ली.

अभी मुझे खड़े होने के लिए एक मजबूत जमीन की सबसे ज्यादा जरूरत है जहां से मैं अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए लड़ सकूं.

Taslima Nasrin

मुझे पश्चिम और पूर्व बंगाल दोनों जगह से निकाला गया. बंगाली की लेखिका होने के नाते बंगाल में मेरा रहना जरूरी है, हालांकि जहां भी मैं चाहूं वहां रहने और अपने विचार अभिव्यक्त करने का अधिकार मेरे पास है जो कई लोगों के विचारों से अलग है.

लेकिन देशनिकाला मुझे अपने पाठकों से दूर कर देता है. मुझसे नफरत करने वाले और मुझे खत्म करने तक की इच्छा रखने वालों के अलावा मुझे प्यार और पसंद करने वाले लोग भी हैं.

इनका उत्साह मेरी वजह से बढ़ता है और जिन्हें मेरी जरूरत है. मैं समाज के भले के लिए अपनी जिंदगी का खतरा उठाती हूं. चाहे जो हो मैं चुप नहीं बैठूंगी.

आपने अक्सर हमारी संस्कृति की दो दमनकारी व्यवस्थाओं धर्म और पितृसत्ता को लेकर खुलकर बात की है जो आपस में जुड़े हैं और ये एक दूसरे की आलोचना नहीं करते. आपको लगता है कि इन दोनों पर बात करने की आजादी या स्पेस है? जो ऐसा करना चाह रहे हैं, आप उन्हें उस अलगाव से निपटने के लिए क्या सुझाव देंगी जो इसका स्वाभाविक नतीजा होगा?

धर्म और पितृसत्ता पर बात करने के लिए न आजादी है और न ही स्पेस. सरकार लोगों को नियंत्रित करने के लिए धर्म का इस्तेमाल करती है और समाज औरतों को नियंत्रित करने के लिए पितृसतात्मक व्यवस्था का इस्तेमाल करता है.

जब भी मैं इन दोनों को चुनौती देती हूं, मुझ पर न सिर्फ महिला-विरोधी और कट्टरपंथी लोगों का हमला होता है, बल्कि सरकार और समाज भी मेरे पीछे लग जाते हैं.

मेरे किताबों को बैन किया गया, मुझे सेंसर, ब्लैकलिस्टेड किया गया, शारीरिक रूप से हमला किया गया और आखिरकार निकाल दिया गया.

मैं उन लोगों से आग्रह करती हूं जो धर्म और पितृसत्ता के खिलाफ लड़ते हैं कि वे इस लड़ाई को कभी न छोड़ें. चाहे जितनी दिक्कतें आएं, समानता और न्याय की लड़ाई में लगे रहें.

अपनी किताब में आप अपने लेखन की प्रतिक्रिया में आई बातों और साहित्यिक समुदाय के भीतर अपने संबंधों पर खुलकर बोलती हैं. क्या कोई ऐसा वक्त था जब आपको लगा कि आप अपने निजी जीवन का ज्यादातर हिस्सा सार्वजनिक कर रही हैं? आपको डर नहीं है कि आपका निजी जीवन पब्लिक नॉलेज बन रहा है?

मैंने ‘अपने लेखन की प्रतिक्रिया और साहित्यिक समुदाय के भीतर अपने संबंधों’ पर अपने रचनात्मक कृतियों में कहीं नहीं लिखा है.

लेकिन अपनी आत्मकथा में मैंने अपने निजी जीवन की तमाम बातों को उजागर किया है. एक आत्मकथा व्यक्ति के निजी जीवन के बारे में होती है. मैंने अपने अनुभवों को सामने रखने से कभी परहेज नहीं किया.

मैं न तो कोई अपराधी हूं, न मेरे दो चेहरे हैं और न ही मैं झूठी हूं. मैंने कभी किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया.

लेकिन साहित्यिक दुनिया के कुछ लोगों ने मुझ पर कीचड़ उछालने और तबाह करने की कोशिश की. विडंबना है कि उन्हें महान समझ जाता है.

कोई नहीं जानता कि वे कितने रूढ़िवादी और क्रूर हैं. मैं उनकी घटिया राजनीति का शिकार रही हूं. अपनी आत्मकथा में अगर मैं सच्चाई छिपा देती तो मुझे कतई आत्मकथा नहीं लिखनी चाहिए.

जितने विरोध आपने सहे, उसमें सबसे ज्यादा किसने आपको डराया- धार्मिक या पितृसतात्मक? आपको वो घटनाएं याद हैं जब इन खतरों ने आपको बुरी तरह डरा दिया हो?

धार्मिक कट्टरपंथी साफ दिखाई देते हैं. सब जानते हैं कि वे गलत लोग हैं. वे हत्या करते हैं.  लेकिन लोगों को यह नहीं पता होता कि पितृसतात्मक लोग भी आपको मार सकते हैं.

मैंने अपने पति को तलाक दे दिया, क्योंकि उसने मुझे धोखा दिया, पितृसतात्मक लोग मुझ पर आरोप लगाते हैं, उस पर नहीं.

मेरा अपने प्रेमी के साथ यौन संबंध था; वे मुझे वेश्या कहते हैं, लेकिन उसके खिलाफ कुछ नहीं कहते.

वे मुझसे नफरत करते हैं क्योंकि मैंने पारंपरिक जीवन नहीं बिताया और मैं पितृसत्ता की निंदा करती हूं व महिला विरोधी मानसिकता की आलोचना करती हूं. सारे धार्मिक कट्टरपंथी पितृसतात्मक हैं क्योंकि धर्म पितृसत्ता में धंसा हुआ है.

पितृसतात्मक लोग ऐसे भी होते हैं जो धार्मिक या धार्मिक कट्टरपंथी नहीं हैं. नास्तिकों और तार्किकों के बीच भी आपको महिला विरोध दिख जाएगा.

नास्तिक होना इतना मुश्किल नहीं है, लेकिन नारीवादी या महिला अधिकारों में सच्चाई के साथ भरोसा करने वाला बनना इतना आसान नहीं है.

Taslima_nasreen

क्या आपको लगता है कि लेखक और साहित्य ने खुद को हमारे समाज के जरूरी मुद्दों से अलग कर लिया है. इनमें अलगाव आया है? क्या हमारा साहित्य गंभीरता से लेने के लिहाज से बहुत नकली है.?

मैं सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध लेखिका हूं. मैं महिला अधिकारों, मानव अधिकारों, मानवता, तार्किकता, नारीवाद, अभिव्यक्ति की आजादी और कई अन्य मुद्दों पर कविताएं, कहानियां, निबंध और उपन्यास लिखती हूं.

बहुत से लेखक किसी भी समस्या के बारे में नहीं लिखते. वे प्रेम कथाएं लिखते हैं और पितृसत्ता में भरोसा करने वाली औरतों को पवित्र और महान औरत की तरह देखते हैं.

आपको ऐसी कोई कहानी नहीं मिलेगी जिसमें क्रांतिकारी महिला या यौन स्वतंत्रता में भरोसा करने वाली महिला जो सेक्स के लिए हां या न बोलने के लिए आजाद है, उसे महान औरत की तरह दिखाया गया हो.

बंगाल के ज्यादातर लोकप्रिय पुरूष नारीवाद से नफरत करते हैं, और औरतों का शोषण करते हैं. मैं नहीं समझती कि वे गंभीरता से समाज को बदलना चाहते हैं. वे यथास्थिति को पसंद करते हैं.

क्या एक किताब या किसी टेक्सट का अपना वतन होता है? आप लंबे समय से निर्वासन में हैं, लेकिन आपका लेखन हर जगह पहुंचता है. क्या आप किताबों की बजाय वतन पसंद करेंगी? क्या आप कभी सोचती हैं कि लेखन छोड़कर आप घर लौट जाएं?

न सोचा है और न सोचूंगी.

'एक्जाइल' को आपके कई निंदक भी पढ़ेंगे. उनके अलावा आपकी किताब का पाठक कौन हो सकता है? यूनिफॉर्म सिविल कोड कार्यकर्ताओं से लेकर तीन तलाक से लड़ने वाली औरतों तक, लोगों का कोई ऐसा समूह है जिसे तस्लीमा नसरीन आगे के संघर्षों के लिए प्रेरित करना चाहती हैं?

जो लोग मेरी किताबें पढ़ते हैं वे पढ़ते रहेंगे. मैं अपने बंगाली पाठकों को जानती हूं. लेकिन अंग्रेजी के पाठकों के लिए यह अलग है.

मैं अंग्रेजी भाषा के पाठकों में ज्यादा नहीं पढ़ी जाती. मैं उम्मीद करती हूं कि प्रगतिशील लोग मेरी किताब पढ़ेंगे.

लेकिन मैं बहुत खुश होउंगी अगर सभी तरह के लोग मेरी किताब पढ़ेंगे- औरत और मर्द, प्रगतिशील और पतनशील. मैं बदले हुए लोगों को बदलना नहीं चाहती. मैं चाहती हूं कि बंद-दिमाग और कचरा-दिमाग लोग मेरी किताब पढ़ें और खुद को बदलें.

विचारधारा से चिपके लोगों को बदलना आसान नहीं है, चाहे वो धार्मिक रूढ़िवाद हो, पितृसत्ता या महिला-विरोध. वे पिछड़े हुए लोग हैं जिन्हें आधुनिक, वैज्ञानिक और तार्किक विचारों की जरूरत है.

मुझे बेस्टसेलर लिखने में दिलचस्पी नहीं है. मेरे लेखन का उद्देश्य समाज को बदलना है. लेखन से ऐसा करने में कितनी मदद मिलती है, यह एक बहस का मुद्दा है.

यह बात अहम नहीं है कि मैं इसमें सफल होती हूं या असफल, लेकिन बदलाव के लिए मेरी लड़ाई जारी रहेगी और कोई ताकत मुझे नहीं रोक सकती.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi