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आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं...एक अमर गाने के बनने की कहानी

शास्त्रीय राग मधमात सारंग की जमीन पर बने गीत खूब पसंद किए गए, आज इसी राग की कहानी

Updated On: Jul 22, 2018 09:12 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं...एक अमर गाने के बनने की कहानी

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एसएन त्रिपाठी बड़े नामों में शुमार हैं, उन्होंने अभिनय किया, फिल्मों में संगीत दिया, निर्देशन किया और गाने भी गाए. मूलत: बनारस के रहने वाले एसएन त्रिपाठी ने बतौर संगीतकार 50 से ज्यादा फिल्मों में संगीत दिया था. एसएन त्रिपाठी ने ज्यादातर धार्मिक फिल्मों का संगीत दिया था.

इसके अलावा कॉमर्शियल फिल्मों में बनाए गए संगीत में ‘जरा सामने तो आ छलिए’, ‘ना किसी की आंख का नूर हूं’ जैसे गाने उन्हें हमेशा-हमेशा अमर रखेंगे. ‘जरा सामने तो आजा छलिए’ तो उस दौर के सुपरहिट गाने में शुमार था. एसएन त्रिपाठी ने 1942 में बतौर संगीतकार अपने करियर की शुरूआत की थी. फिल्म थी चंदन. इसके बाद पचास के दशक के आखिरी सालों में उन्हें फिल्म निर्देशन में भी हाथ आजमाने की सूझी. उन्होंने 1957 में एक फिल्म बनाई- रानी रूपमती, जिसमें भारत भूषण और निरूपा रॉय जैसे कलाकारों ने अभिनय किया था. इस फिल्म का संगीत भी एसएन त्रिपाठी ने ही तैयार किया था. इस फिल्म के सभी गाने लोगों ने पसंद किए. जिसे मुकेश, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और मन्ना डे जैसे गायकों ने गाया था. इसी फिल्म का ये गाना सुनिए जो मुकेश के ऑल टाइम हिट गानों में से एक है. बोल हैं- आ लौट के आजा मेरे मीत.

एसएन त्रिपाठी ने बाद में कवि कालीदास और पक्षीराज जैसी फिल्मों का निर्देशन भी किया. इसके अलावा उन्होंने कुछ भोजपुरी फिल्में भी बनाईं. 1988 में मुंबई में उनका निधन हुआ. एसएन त्रिपाठी के बनाए संगीत का शास्त्रीय पक्ष हमेशा ही बहुत मजबूत माना जाता था. फिल्म रानी रूपमती का ये गाना भी उन्होंने शास्त्रीय राग मधमात सारंग की जमीन पर तैयार किया था. एसएन त्रिपाठी के बनाए एक और गाने का जिक्र किए बिना उनकी बात अधूरी रह जाएगी. वो गाना था- फिल्म संगीत सम्राट तानसेन का मुकेश का गाया गाना 'झूमती चली हवा याद आ गया कोई'. ये गाना आज भी बड़ा लोकप्रिय है.

खैर, लौटते हैं अपने आज के शास्त्रीय राग मधमात सारंग पर. इसी राग की जमीन पर 1958 में रिलीज फिल्म मधुमती का एक गाना बहुत हिट हुआ था. इस फिल्म को बिमल रॉय ने बनाया था और संगीत था सलिल चौधरी का. फिल्म में दिलीप कुमार और वैजयंती माला मुख्य भूमिका में थे. इस फिल्म में 11 गाने थे, कमाल की बात ये है कि सभी के सभी गाने सुपरहिट हुए. 1958 में इस फिल्म का संगीत बेस्ट सेलिंग बॉलीवुड साउंडट्रैक रहा. इस फिल्म को 9 फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले, जिसमें सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, सर्वश्रेष्ठ फीमेल प्लेबैक सिंगर जैसे अवॉर्ड शामिल थे. फिल्म मधुमती को उसी साल का सर्वश्रेष्ठ फिल्म का नेशनल अवॉर्ड भी मिला. इस फिल्म में भी सलिल दा ने एक गाना राग मधमात सारंग की जमीन पर कंपोज किया था. आइए आपको वो गाना सुनाते हैं. जिसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने गाया था.

इन बेहतरीन हिंदी फिल्मी गीतों के अलावा राग मधमात सारंग का इस्तेमाल लाइट क्लासिकल म्यूजिक के लिए भी हुआ है. इसमें सबसे मशहूर है गजल की दुनिया के बड़े नामों में शुमार उस्ताद गुलाम अली की गाई ये गजल. जिसके बोल हैं- बिन बारिश बरसात ना होगी, रात गई फिर रात ना होगी. पाकिस्तान के ही एक और बड़े मशहूर फनकार का गाया मधमात सारंग भी सुनिए. जिन्हें कव्वाली का सम्राट कहा जाता है. जी हां, हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान के मशहूर कव्वाली गायक उस्ताद नुसरत फतेह अली खान की.

आइए अब आपको राग मध्यमाद सारंग के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. ये राग खमाज थाट का राग है. इस राग में नी के अलावा बाकि सभी स्वर शुद्ध लगते हैं. राग मध्यमाद सारंग में ग और ध नहीं लगता है. इसलिए इस राग की जाति औडव है. राग मध्यमाद सारंग का वादी स्वर रे और संवादी स्वर प है. वादी संवादी स्वरों के बारे में हमने आपको बताया कि किसी भी शास्त्रीय राग में वादी संवादी स्वर का वही महत्व है जो शतरंज के खेल में बादशाह और वजीर का होता है. खैर, जैसा कि राग मध्यमाद सारंग के नाम से ही पता चलता है कि ये सारंग का ही एक प्रकार है. माना जाता है कि ये राग मेघ से भी काफी मिलता जुलता राग है. बड़ा फर्क ये है कि इस राग को सारंग अंग से गाया जाता है जबकि मेघ मल्हार को मल्हार अंग से गाया जाता है.

आइए आपको राग मध्यमाद सारंग का आरोह अवरोह बताते हैं-

आरोह- सा, रे, म, प, नी, सां

अवरोह- सां, नी, प, म, रे, सा

शास्त्रीय राग की प्रस्तुति की समझ के लिए हम आपको हमेशा विश्वविख्यात कलाकारों के वीडियो दिखाते हैं. आज आपको सुनाते हैं किशोरी अमोनकर जी का गाया राग मधमात सारंग. शास्त्रीय संगीत की दुनिया में किशोरी जी को प्यार और सम्मान से 'किशोरी ताई' कहा जाता था. ‘गान सरस्वती’ कहा जाता था. किशोरी अमोनकर का ताल्लुक जयपुर अतरौली घराने से रहा. उनकी मां मोगूबाई कुर्दीकर अपने समय की जानी-मानी शास्त्रीय गायिका थीं. मोगूबाई कुर्दीकर जयपुर अतरौली घराने के उस्ताद अल्लादिया खां साहब की शिष्या थीं. उनकी समकालीन और गुरू बहन थीं मशहूर गायिका केसरबाई केरकर. सुनिए किशोरी अमोनकर का गाया राग मधमात सारंग.

राग मध्यमाद सारंग के वादन पक्ष को समझने के लिए पंडित निखिल बनर्जी का बजाया ये राग सुनिए. पद्मभूषण से सम्मानित पंडित निखिल बनर्जी मैहर घराने के वरिष्ठ कलाकारों में से एक थे.

राग मध्यमाद सारंग की कहानी में आज इतना ही. अगले हफ्ते फिर मिलेंगे और आपको सुनाएं एक प्राचीन राग गुर्जरी तोड़ी की कई कहानियां.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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