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रागदारी: पहले नापसंद था, फिर इस राग के प्यार में डूब गए देव आनंद

किसी भी राग में मिश्र के लगते ही उसकी शास्त्रीयता कुछ कम जरूर हो जाती है लेकिन मधुरता बढ़ जाती है

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Apr 23, 2017 04:16 PM IST

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रागदारी: पहले नापसंद था, फिर इस राग के प्यार में डूब गए देव आनंद

साल 1965 की बात है. मशहूर अभिनेता देव आनंद ‘गाइड’ बना रहे थे. फिल्म के संगीत का जिम्मा सचिव देव बर्मन पर था. अचानक एक बड़ा हादसा हुआ. बर्मन दादा को हार्टअटैक हुआ. उन्हें इलाज और आराम दोनों की जरूरत थी.

ऐसे मुश्किल वक्त में देव आनंद ने एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने फिल्म की शूटिंग को 6 महीने के लिए टाल दिया. उन्होंने कहा कि इस फिल्म का संगीत तो बर्मन दादा ही तैयार करेंगे उसके लिए चाहे उन्हें 6 महीने इंतजार क्यों ना करना पड़े. इस बीच कुछ और बड़े निर्देशकों ने एसडी बर्मन को दिया हुआ काम वापस लेकर किसी और संगीतकार से कराया लेकिन देव आनंद अपने फैसले पर अड़े रहे.

खैर, बर्मन दादा स्वस्थ होकर लौटे तो उन्होंने वापस फिल्म के संगीत को तैयार करने का काम शुरू किया. न जाने ये संयोग था या बर्मन दादा को अपनी तबियत के खराब होने की वजह से हुई देरी का अफसोस, लेकिन कहते हैं कि एसडी बर्मन ने सिर्फ पांच दिन में फिल्म गाइड के सभी गानों को तैयार कर दिया. देव आनंद को तो उन पर भरोसा था ही उन्होंने सभी गानों को तुरंत अप्रूव कर दिया.

मुसीबत ये थी कि देव आनंद को एक गाना पसंद नहीं आया लेकिन फिल्म आने के बाद राग मिश्र भैरवी में तैयार किया गया वही गाना फिल्म गाइड का सबसे हिट गाना साबित हुआ.

आज अपने इस कॉलम में हम राग मिश्र भैरवी की ही बात करेंगे. इस बातचीत को आगे बढ़ाने से पहले आप खुद भी वो सुन लीजिए वो गाना जो शुरूआत में देव आनंद ने ‘रिजेक्ट’ कर दिया था. फिर ये गाना कैसे फिल्म में आया इसकी भी दिलचस्प कहानी आपको सुनाएंगे.

इस गाने की शूटिंग उदयपुर में हुई थी. देव आनंद इस गाने को मुंबई में रिकॉर्ड करवाकर आ तो गए लेकिन उन्हें ये गाना पसंद नहीं आ रहा था. उन्होंने अपने साथियों से इस बात की चर्चा भी की. देव आनंद इस गाने को लेकर बर्मन दादा के काम से खुश नहीं थे. हालांकि जब गाना यूनिट के बाकि लोगों ने सुना तो सभी ने खुलकर तारीफ की लेकिन देव आनंद अड़े रहे. बाद में फिल्म के डायरेक्टर विजय आनंद ने ये कहकर बात टाली कि फिलहाल इस गाने को शूट कर लेते हैं.

अगर बाद में फिल्म में अच्छा नहीं लगा तो कोई दूसरा गाना रिकॉर्ड कर लेंगे. अगले जितने भी दिन इस गाने की शूटिंग हुई देव आनंद ने एक बात नोटिस की, सेट से लेकर होटल तक आते जाते यूनिट का हर इंसान यही गाना गुनगुना रहा होता था- आज फिर जीने की तमन्ना है. देव आनंद ने सैकड़ों बार लोगों को यही गुनगुनाते हुए सुना. आखिर में वो भी मान गए कि ये गाना फिल्म में इस्तेमाल किया जाएगा. देव आनंद ने बाद में माना कि ये गाना जैसे का तैसा ही फिल्म में इस्तेमाल किया जाएगा. कहरवा ताल पर तैयार किए गए इस गीत को शैलेंद्र ने लिखा था जो बाद में कितना लोकप्रिय हुआ वो हम सभी जानते हैं. गाने के बोल भी कमाल के थे.

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इस गाने की एक और खासियत थी इस पूरे गाने को एसडी बर्मन ने एक ही धुन पर तैयार किया था. आम तौर पर फिल्मी संगीत में सबसे ज्यादा मेहनत मुखड़े की लाइनों पर की जाती है. एक बार अच्छा मुखड़ा बन गया तो अंतरे पर काम होता है. अंतरा अलग तरीके से उठाया जाता है, और अंतरे की आखिरी लाइन घूम कर मुखड़े की धुन से आ मिलती है. लेकिन इस गाने को आप गुनगुना कर देखिए. जिस धुन में मुखड़ा है यानी 'कांटों से खींच के ये आंचल' उसी धुन को अंतरों में भी रिपीट किया गया है, चाहे वो 'अपने ही बस में नहीं मैं' हो या फिर 'मैं हूं गुबार या तूफां हूं.

ये एक अनोखा प्रयोग एसडी बर्मन ने इस गाने में किया था जहां पूरा का पूरा गाना यानी मुखड़ और अंतरा सब एक ही धुन में तैयार किया गया था. राग अलग है लेकिन ये प्रयोग एसडी बर्मन ने इस गाने में भी किया था जहां पूरा का पूरा गाना एक ही धुन में तैयार किया गया था.

राग मिश्र भैरवी में ठुमरी खूब गाई गई है. अगर इस राग को थोड़ा बारीकी से समझें तो समझ आता है कि किसी भी राग में मिश्र के लगते ही उस राग की शास्त्रीयता कुछ कम जरूर हो जाती है लेकिन राग और मधुर हो जाता है. राग मिश्र पीलू, राग मिश्र खमाज, राग मिश्र काफी, राग मिश्र किरवानी ये सारे नाम आपको सिर्फ इसलिए बता रहे हैं जिससे आप जब अगली बार इन रागों को कहीं गाते बजाते सुने तो समझ जाएं कि गाने या बजाने वाले ने उसे मधुर बनाने के लिए क्या किया है. नीलाद्री को कहरवा ताल पर ही राग मिश्र भैरवी बजाते हुए सुनिए.

राग मिश्र खमाज बड़े बड़े दिग्गज कलाकारों के दिल के काफी करीब रहा है. यहां हम आपको भारतीय शास्त्रीय संगीत के दो बड़े दिग्गज कलाकार उस्ताद विलायत खान और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की बीस साल से भी पुरानी जुगलबंदी सुना रहे हैं, जिसमें उन्होंने राग मिश्र भैरवी को बजाया है.

जैसा कि हमने आपको बताया कि राग मिश्र भैरवी में ठुमरियां खूब गाई गई हैं. आपको मशहूर शास्त्रीय गायिका शोभा गुर्टु जी और परवीन सुल्ताना जी की इसी राग में गाई गई ठुमरियां सुनाते हैं. मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित अजय चक्रवर्ती ने भी इस राग में कई कॉम्पोजीशन तैयार किए हैं. आप इन तीन वीडियो को देखिए और इस राग की खूबसूरती को समझिए

जहां तक बात है मिश्र भैरवी के आरोह अवरोह की तो शुद्ध भैरवी राग में आरोह और अवरोह दोनों में सातों स्वर लगते हैं और ‘रे’ ‘ग’ ‘ध’ ‘नी’ ये चारों स्वर कोमल लगते हैं. यानी शुद्ध भैरवी का आरोह अवरोह होगा -

आरोह- सा रे म प नी सां

अवरोह- सां नी प म रे सा

अब दिलचस्प बात ये है कि भैरवी ऐसा राग है जिसमें विद्वान लोग गाते बजाते वक्त बारहों सुरों का इस्तेमाल करते हैं, यानी राग की ख़ूबसूरती बढ़ाने के लिए कभी शुद्ध ‘ध’ भी लग जाता है, तो कभी शुद्ध ‘ग’ या ‘नी’ ‘भी’. ऐसा मिश्रण करते ही राग भैरवी, राग मिश्र भैरवी बन जाती है. मिसाल के तौर पर- 'कांटों से खींच के ये आंचल' में एक जगह शुद्ध ‘ग’ लगाया गया है, जबकि भैरवी में गंधार कोमल होता है. इसीलिए कहा गया कि ये गाना मिश्र भैरवी में बना है.

अगली बार इसी कॉलम में एक और नए राग की बारीकियों से आपको परिचित कराएंगे तब तक आप एक बार फिर भारतीय फिल्म इतिहास के सबसे लोकप्रिय गानों में से इस गाने का मजा एक बार फिर से लीजिए

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