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रहें न रहें हम–महका करेंगे: ‘ऐसे थे मजरूह सुल्तानपुरी’

मजरूह ने लगभग 350 फिल्मों में दो हजार से ज्यादा गीत लिखे.

Nazim Naqvi Updated On: May 23, 2017 06:18 PM IST

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रहें न रहें हम–महका करेंगे: ‘ऐसे थे मजरूह सुल्तानपुरी’

फिल्मी गीतों के बेताज बादशाह ‘मजरूह सुल्तानपुरी’ (1 अक्टूबर 1919 – 23 मई 2000) इस दुनिया से रुखसत हो गए लेकिन हमेशा महकते रहेंगे ‘बन के कली, बन के सबा, बाग़-ए-वफ़ा में.’

(ममता फिल्म (1966) का यादगार गीत जिसे मजरूह-रौशन की जोड़ी का शाहकार गीत माना जाता है.)

नाम था असरार हसन खां लेकिन पठान नहीं थे. वतन था सुल्तानपुर लेकिन जो मिला, बंबई से मिला. ‘मजरूह सुल्तानपुरी’ कलमी नाम था. मजरूह खुद भी इस बात को मानते रहे ‘मैं 1945 में बंबई आया, शायरी मैं पहले भी करता था लेकिन इस शहर में आकर मैं फिल्मों से भी जुड़ा और प्रगतिशील लेखक संघ से भी, यानि जो भी फिल्मी या इल्मी शोहरत पाई वो इसी शहर से मिली.’

मजरूह के फिल्मी करियर का आगाज फिल्म ‘शाहजहां’ (1946) से होता है. ये किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है, हुआ यूं कि मजरूह सुल्तानपुरी एक मुशायरे में बंबई आए थे, बात है 1945 की. मुशायरे में उन्होंने अपनी गजलों से धूम मचा दी. इस मुशायरे में फिल्म प्रोड्यूसर कारदार साहब भी मौजूद थे.

बाद में कारदार साहब ने जिगर मुरादाबादी से मजरूह का जिक्र किया और गीत लिखवाने कि ख्वाहिश जताई. जिगर ने मजरूह को कारदार का पैगाम पहुंचाया तो उन्होंने सुनते ही मना कर दिया ‘नहीं मैं फिल्मों के लिए नहीं लिखूंगा’. फिर जब जिगर मुरादाबादी ने समझाया कि इसमें पैसे खूब मिलते हैं तो समझ गए और इस तरह नौशाद-मजरूह कि जोड़ी ने ‘शाहजहां’ में साथ काम किया.

इस फिल्म का के.एल. सहगल कि आवाज में गाया मजरूह का गीत हमेशा-हमेशा के लिए मशहूर हो गया ‘गम दिए मुस्तकिल कितना नाजुक है दिल, ये न जाना- हाय हाय ये जालिम जमाना’.

मजरूह ने लगभग 350 फिल्मों में दो हजार से ज्यादा गीत लिखे लेकिन आज उनकी पुण्य-तिथि पर आइए उनसे जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से आपके साथ शेयर करते हैं जो मैंने एस.एम. मेहदी साहब से सुने, जो खुद अपने जमाने के मशहूर ड्रामा-निगार थे और मजरूह के बहुत करीबी दोस्त भी.

‘इस बात पर मजरूह को बड़ा फख्र था कि ‘मैं राजपूत हूं’... खान तो दुमछल्ला लगा दिया गया था, किसी जमाने में, शायद मुगलों के जमाने में, पुरखों में से किसी को ‘खां’ का खिताब दे दिया गया था, जैसे सर सय्यद अहमद को खान का खिताब मिला था, वैसे ही हमारे यहां खान का खिताब दे दिया गया वर्ना हम लोग राजपूत हैं’.

मजरूह कि गजल में जो बांकपन है वो राजपूतों वाला ही है. दरअसल मजरूह कि गजलों को पढ़िए तो पता चलता है कि लफ्जों को चुनने की और अच्छे लफ्जों को पिरोने की महारत किसे कहते हैं. मुशायरों में वो शुरू से ही बहुत मकबूल थे. बहुत अच्छी आवाज थी पढ़ने का अंदाज भी बहुत अच्छा था, खूबसूरत रंगों शेरवानियां पहनने का बड़ा शौक था. मलमल का कुर्ता और वही खास लखनवी पाजामा.

मजरूह जिस खानदान से आते थे वो बहुत पुराने ख्यालों का था शायद इसीलिए अंग्रेजी तालीम से दूर रखे गए. अरबी-फारसी सीखी और फिर तिब (हकीम की) तालीम ली. कुछ दिनों तक हकीमी भी करते रहे लेकिन शेर कहना भी जारी रहा. फिर जब बहुत मशहूर होने लगे. तो हिकमत छोड़कर बंबई आ गए. लेकिन अभी वही राजपूतों वाली बरकरार रही.

‘बम्बई में जिस दिन छुट्टी होती थी मतलब किसी काम से निकलना नहीं होता था तो जहां रहते थे वहीं अपने बड़े से कमरे में जितने भी अवध और लखनऊ के लोग बंबई में या फिल्मी दुनिया में थे, सबको बुला लेते, तो हम अक्सर लोगों से कहते थे ‘भई मजरूह सुल्तानपुरी बंबई में, अवध के एंबेसडर हैं’. अवध की तहजीब अवध के किस्से अगर सुनना हों तो आप मजरूह के दीवान-खाने में जाकर बैठिए.

मजरूह ने जब शुरू किया फिल्मों में काम तो जाहिर है बेताज बादशाह हो गए. इनसे ज्यादा मकबूल और कोई था ही नहीं, सब इनकी तरफ ही दौड़ते थे कि हमारी फिल्म के गाने लिख दीजिये.

‘मजरूह ने बहुत फिल्में लिखीं और बेइंतेहा गाने उनके मकबूल हुए लेकिन फिल्मों और अपनी निजी जिंदगी को अलग-अलग रखते थे. मसलन एक बार मेरी बीवी ने कहा, ‘मजरूह मुझे फिल्मों में काम करना है’ तो कहने लगे, ‘खबरदार नाम भी न लेना. ये जगह शोरफा (शरीफ़ लोग) के लिए नहीं हैं’. जब पूछा जाता कि हजरत फिर आप क्यों हैं यहां तो कहते ‘भई पैसों के लिए काम करता हूं लेकिन फिल्मी जिंदगी पसंद नहीं है मुझे’.

(फिल्म ‘फिर वही दिल लाया हूं’-1963)

‘उनका एक गाना उस ज़माने में बड़ा मशहूर हुआ था ‘कभी आर कभी पार लगा तीरे नजर... मैंने कहा मजरूह यार तुम तो बड़े अच्छे शायर हो फिर तुमने एक मुहावरे को दो-लखत (दो टुकड़े) क्यों कर दिया? अभी तक तो लोगों को ‘आर-पार’ कहते ही सुना था. अमां कमाल कर दिया तुमने. कहने लगे इसका किस्सा सुनोगे..?’

‘हुआ यूं कि म्यूजिक डायरेक्टर ओ.पी. नय्यर ने एक धुन सुनाई और कहा भई इसपर गाना लिखो. मैंने उसी वक्त एक मुखड़ा लिख कर उन्हें दिया... सुनकर बोले नहीं भई नहीं चलता ये... मैंने दूसरा मुखड़ा दिया... अंअंअं.... नहीं भई ये भी नहीं चलता... हमने तीसरा मुखड़ा दिया... फिर वही... ये भी नहीं चलता... अरे भाई थक गए हम ये भी नहीं चलता वो भी नहीं चलता.. परेशानी में मैंने माचिस कि डिबिया उठाई और उसे बजा-बजा कर गुनगुनाने लगा... कभी आर कभी पार लगा... वो फौरन चीख पड़े हां-हां यही यही मजरूह यही चाहिए...’

‘मुल्क को अभी आजादी नहीं मिली थी. उन दिनों बंबई में प्रगतिशील लेखक संघ कि बड़ी अहमियत थी. हम सब (सज्जाद, जहीर, कैफी, कृष्ण चंदर, राजिंदर सिंह बेदी वगैरह) रोज मिलते थे. यहां मजरूह ने भी आना शुरू कर दिया. यहीं आकर उनकी शायरी का अंदाज और उसका मूड बिलकुल अलग हुआ.’

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर

लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

‘ये उनका उसी जमाने का शेर है. शुरू में इसका दूसरा मिसरा (पंक्ति) इस तरह था कि ‘गैर साथ आते गए और कारवां बनता गया’ हम लोगों के बीच जब मजरूह ने इसे सुनाया तो बहस होने लगी. इस बात पर एतराज हुआ कि भई ये ‘गैर’ का क्या मतलब है? उस वक्त कृष्ण चंदर ने मजरूह के ‘गैर’ शब्द की काफी हिमायत की, कहा आप लोग बेवजह इस गैर के पीछे पड़ गए हैं. इसमें कोई बुराई नहीं है बल्कि इस जगह गैर लफ्ज ही सबसे ज्यादा फिट हो रहा है.’

“उस वक़्त कृष चंदर ने बहुत अच्छी तक़रीर की. ‘जेहनी सफ़र में जब इंसान चलता है तो हर शख्स उसके लिए गैर होता है, और फिर जब वो साथ मिल जाता है तो अपना हो जाता है’. चूँकि कृष्ण चंदर की बात में दम था इसलिए हम सभी मान गए”.

‘लेकिन बाद में मजरूह ने जब अपना दीवान प्रकाशित किया तो छपी हुई गजल में गैर की जगह ‘लोग’ शब्द रख दिया. मैंने पूछा ये क्या किया? उस दिन बहस में तो सबने गैर को सही माना था? बोले नहीं मुझे लगा कि गैर से ज्यादा अच्छा लफ्ज ‘लोग’ है इसलिए मैंने इसे बदल दिया... तो ये प्रगतिशील लेखक संघ कि बहसें ही थीं जिनसे मजरूह जैसे लोगों की जेहनी तरबियत एक नए तरीके से हुई.’

सुतुने दार पे रखते चलो सरों के चिराग़

जहाँ तलक ये जूनून कि सियाह रात चले

उनकी ये मशहूर गजल उसी जमाने की है... जाहिर है कि प्रगतिशील लेखक संघ जो सज्जाद जहीर और मुंशी प्रेमचंद ने बनाया था, उन दिनों इसका मकसद अंग्रेजों से मुल्क को आजाद करने का ही था...

मजरूह फिल्मों में गीत जरूर लिखते रहे लेकिन हमेशा ये भी कहते रहे कि अपने गीतों को मैं अपनी शायरी नहीं कह सकता. यहां तक कि जब कभी मुशायरों में किसी गीत की फरमाइश होती थी तो कभी नहीं सुनाते थे कहते थे ये गीत आप लता मंगेशकर से सुनिएगा मुझसे मेरी गजल सुनिए...

(फिल्म- अभिमान 1973)

बात लता कि निकल आई तो पेश है मजरूह कि एक नज्म जो उन्होंने लता मंगेशकर के लिए  लिखी थी...

मेरे लफ्जों को जो छू लेती है आवाज तेरी

सरहदें तोड़ के उड़ जाते हैं अशआर मेरे

तुझको मालूम नहीं, या तुझे मालूम भी हो

वो सियाह-बख्त जिन्हें गम ने सताया बरसों

एक लम्हे को जो सुन लेते हैं नगमा तेरा

फिर उन्हें रहती है जीने कि तमन्ना बरसों

जिस घडी डूब के आहंग में तू गाती है

आयतें पढ़ती हैं साजों पे सदा तेरे लिए

दम-ब-दम खैर मनाते हैं तेरी चंगो-रबाब

सीना-ए-नै से निकलती है दुआ तेरे लिए

नगम-ओ-साज़ के जेवर से रहे तेरा सिंगार

हो तेरी मांग में तेरे ही सुरों कि अफशां

तेरी तानों सी तेरी आंख में काजल की लकीर

हाथ में तेरे ही गीतों की हिना हो रकसां

(फिल्म पेइंग-गेस्ट 1957)

मोहम्मद मेहदी साहब एक और बड़ा दिलचस्प किस्सा मजरूह और साहिर के झगड़े का सुनाया करते थे. ‘हुआ यूं कि साहिर कि मां की बीमारी का तार साहिर को मिला. साहिर उन दिनों किसी फिल्म के गाने लिख रहे थे, उनकी कुछ समझ में नहीं आया तो वो मजरूह के पास आये और कहा कि तुम मेरी फिल्म के बाकी बचे दो-तीन गाने लिख दो और गानों की रिकॉर्डिंग के वक़्त स्टूडियो में डायरेक्टर कि मदद के लिए हाजिर रहना, जाहिर है कि मामला साहिर कि मां की बीमारी का था और मजरूह ने कहा ठीक है तुम जाओ मैं तुम्हारा काम संभाल लूंगा’.

‘साहिर चले गए और ज्यादा दिनों के लिए मां के पास रुक गए. वापस आये और जब उन्हें उनके फिल्मी गीतों का पेमेंट मिला तो वो पैसे लेकर मजरूह के पास गए और उन्हें उनके लिखे तीन गानों के पैसे देने लगे, मजरूह ने इंकार कर दिया कि नहीं मैं पैसे नहीं लूंगा’.

‘लेकिन साहिर अड़े हुए थे कि नहीं तुम्हें पैसे लेने पड़ेंगे. जब झगड़ा काफी बढ़ गया तो दोनों मेरे पास आए, साहिर कहने लगे देखो मेहदी ये मुझसे पैसे नहीं ले रहा है. मैंने सारा किस्सा सुना और कहा कि ‘साहिर मजरूह अगर पैसे नहीं ले रहा है तो क्या गलत कर रहा है, आखिर उसने अपने दोस्त की मदद ही की है, और अब तुम उसे पैसे दोगे तो ये तो बहुत गलत बात है. खैर साहिर कि समझ में बात आ गई और ये झगडा खत्म हुआ’.

तो ऐसे थे मजरूह सुल्तानपुरी.

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