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गोलगप्पे की कहानी: क्या है महाभारत की कुंती और मगध साम्राज्य से कनेक्शन?

गोलगप्पे का असल इतिहास भले ही बहुत पुराना न हो मगर, उनके बारे में एक बात तय है कि ये हिंदुस्तान की शायद सबसे ज्यादा नामों वाली डिश है

Updated On: Aug 04, 2018 12:44 PM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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गोलगप्पे की कहानी: क्या है महाभारत की कुंती और मगध साम्राज्य से कनेक्शन?

कुछ दिन पहले खबर आई कि गुजरात के वडोदरा में कुछ समय के लिए गोलगप्पों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. 4,000 किलो गोलगप्पे, उनका पानी और आलू वगैरह फेंक दिए गए. असल में देश भर में फुचका, पानीपूरी, बताशे जैसे तमाम नामों से लोकप्रिय गोलगप्पों से जुड़े साफ-सफाई के मुद्दे बहुत गंभीर हैं. लेकिन यह बात भी सच है कि गोलगप्पों का मजा तो सड़क किनारे खाने में ही आता है. वैसे क्या आप जानते हैं कि लोग गोलगप्पों को महाभारत और मगध साम्राज्य तक से जोड़ देते हैं. चलिए जानते हैं गोलगप्पों के साथ जुड़ी कुछ चटखारेदार, चटपटी बातें और पानी के बताशों से जुड़ी कई और बातें.

क्या गोलगप्पे महाभारत कालीन हैं?

दुनिया में इतिहास और मिथक दो अलग-अलग चीज़ें होती हैं. महाभारत की कथा के साथ कई मिथक जुड़े हैं. इन्हीं में से गोलगप्पों से भी एक दंतकथा जोड़ दी गई है. इस कथा की प्रामाणिकता पर हम कोई टिप्पणी नहीं कर सकते, लेकिन कहानी रोचक है.

कहते हैं कि जब द्रौपदी की शादी पांचों पांडवों से हुई तो कुंती ने उनकी परीक्षा लेने की सोची. कुंती ने एक दिन द्रौपदी को खूब सारी सब्ज़ी और थोड़ा सा आटा दिया. द्रौपदी को उसी में पांचों पांडवों के लिए कुछ बनाना था. पांचाली ने आटे से गोल-गोल बताशे जैसे बनाए और उनमें बीच में सब्ज़ी भर दी. सारे पांडवों का पेट भर गया और माता कुंती खुश हो गईं. यही गोलगप्पों का सबसे पहला मॉडल था.

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वैसे इस मिथक से अलग गोलगप्पों का संबंध मगध साम्राज्य से भी जोड़ने की कोशिश होती है. इंटरनेट पर कई जगह लिखा मिलता है कि मगध साम्राज्य में फुलकिस बहुत लोकप्रिय था. अब इन फुलकिस का स्वाद कभी बुद्ध या अशोक ने चखा होगा, ऐसा होना मुश्किल है. गोलगप्पों का सबसे जरूरी अंग आलू है. आलू पुर्तगालियों की लाई सब्ज़ी है. इसी तरह से गोलगप्पों के पानी को चटपटा बनाने वाली लाल मिर्च भी भारत में 300-400 साल पहले ही आई इसलिए मगध साम्राज्य का सीधा संबंध भी आज के गोलगप्पों से नहीं जोड़ा जा सकता है.

असल में मिथकों से अलग गोलगप्पा बहुत पुरानी डिश नहीं है. फूड हिस्टोरियन पुष्पेश पंत बताते हैं कि गोलगप्पा दरअसल राज कचौड़ी से बना व्यंजन हो सकता है. इसकी शुरुआत भी उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच कहीं, या शायद बनारस में करीब 100-125 साल पहले हुई हो. तरह-तरह की चाट के बीच किसी ने गोल छोटी सी पूरी बनाई और गप्प से खा ली. इसी से इसका नाम गोलगप्पा पड़ गया.

गोलगप्पा भारतीयता का प्रतीक है

गोलगप्पे का असल इतिहास भले ही बहुत पुराना न हो मगर, उनके बारे में एक बात तय है कि ये हिंदुस्तान की शायद सबसे ज्यादा नामों वाली डिश है. हरियाणा में अनुप्रास अलंकार वाले पानी के पताशे, मध्य प्रदेश में फुल्की, उत्तर प्रदेश में ज्यादातर जगह गोलगप्पा और अवध में नाज़ुक से पानी के बताशे, बंगाल में खाते समय हुई फच्च की आवाज़ के चलते फुचका, ओडिशा में गप्प से खाने वाला गपचप, महाराष्ट्र में पानीपूरी, अनेक भाषा के बाद भी एक बना हुआ ये गोल पकवान भारत की विविधता और एकता का सच्चा प्रतीक है. और हां कभी कोई विदेशी आपसे 'पटैटो इन होल' पूछे तो उसे तुरंत किसी नजदीकी गोलगप्पे वाले के पास लेकर जाइए.

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वैसे गोलगप्पों, बताशों और फुचका का यह अंतर सिर्फ नाम तक ही सीमित नहीं है. मुख्य रूप से यह एक ही चीज़ है लेकिन जगह-जगह के हिसाब से इसके अंदर का मैटिरियल और पानी बदल जाता है.

मुंबई की पानीपूरी में सफेद मटर मिलती है. पानी में भी हल्का गुड़ मिला होता है. जबकि गोलगप्पा अक्सर आलू से भरा होता है. इसके साथ ही तीखे पानी में हरा धनिया पड़ा होता है. फुचका में आलू के साथ काला चना मिला होना एक आम बात है. जबकि ज़्यादातर बंगाल वाले पानी को तीखे की जगह खट्टा-मीठा रखना पसंद करते हैं. गुजरात और मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में अंकुरित मूंग भी अंदर भरी जाती हैं.

वैसे पानी के साथ-साथ दही और चटनी के साथ भी इन पूरियों को खाने का चलन है. उत्तर भारत के छोटे शहरों के बाज़ारों में आमतौर पर आपको गोलगप्पे में प्याज़ नहीं मिलेगा. इन गोलगप्पे वालों के पारंपरिक ग्राहक ज्यादातर प्याज़-लहसुन न खाने वाले मारवाड़ी दुकानदार या वैष्णव होते हैं. जबकि दिल्ली में प्याज़ वाले पानी के बताशे एक आम चलन है.

प्रयोग की खान है गोलगप्पा

गोलगप्पों का स्ट्रक्चर कुछ ऐसा है कि इसमें प्रयोग की काफी गुंजाइश होती है. पानी में अलग-अलग स्वाद के अलावा अंदर भरने में आलू की जगह विदेशी फल, पनीर, चिकन, तरह-तरह के नॉनवेज और तमाम चीज़ें भरकर प्रयोग किए जाते हैं. स्कॉच या वाइन के पानी वाले गोलगप्पे भी प्रयोग के तौर पर बनते हैं. विदेशियों को लुभाने के लिए गोलगप्पे के साथ टकीला शॉट जैसा पानीपूरी शॉट भी बनाया जाता है.

यूं तो 1000 रुपए के 4-5 मिलने वाले गोलगप्पे भी आते हैं, जिनमें अंदर कैवियार (एक खास मछली के अंडे) भरा जाता है और तलकर या माइक्रोवेव में फुलाने वाले ब्रांडेड गोलगप्पे भी मिलने लगे हैं. किंतु, जो आनंद सड़क पर शाम को गोलगप्पे खाने में हैं वो कहीं नहीं है. महंगी गाड़ी से आए लोग, कॉलेज के छात्र, आम आदमी सब हाथ में दोना लिए आस-पास खड़े रहते हैं. सबको बारी-बारी से एक गोलगप्पा मिलता है. जब अमीरी-गरीबी से परे सबको आखिर में एक सूखा और चुल्लू भर एक्स्ट्रा पानी मांगना पड़ता है. तभी गोलगप्पे का सच्चा सुख मिलता है.

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गोलगप्पा और सेहत

गोलगप्पे की कहानी वडोदरा में लगे बैन से शुरू हुई थी. गोलगप्पों के साथ सेहत के तमाम पहलू जुड़े हैं. निश्चित रूप से गोलगप्पे खाते समय साफ-सफाई पर ध्यान देना ही चाहिए. कई गोलगप्पे वाले पानी को खट्टा बनाने के लिए उसमें सिट्रिक ऐसिड जैसी चीज़ें मिलाते हैं. ये हमारे पेट के लिए खतरनाक है. अमूमन ऐसे गोलगप्पे वालों की उंगलियों पर इस ऐसिड का असर दिख जाता है, इससे कुछ अंदाज़ा लगा सकते हैं. वैसे मोटे तौर पर 2-3 गोलगप्पे में एक रोटी के बराबर कैलोरी होती है. अगर मीठी चटनी और आलू होगा तो कैलोरी और बढ़ जाएगी. इसलिए वजन कम करना हो तो 3-4 गोलगप्पों से ही संतोष करने की कोशिश कीजिए. अगर आपको डॉक्टर ने नमक कम खाने की सलाह दी हो तो गोलगप्पों से थोड़ा दूरी बनाना बेहतर है.

जाते-जाते महाभारत की कथा की एक और बात सुन लें. कोई भी मिथकीय कथा बिना आशीर्वाद के पूरी नहीं होती. तो इस कहानी में भी कुंती द्रौपदी से कहती हैं कि तुम्हारा बनाया ये पकवान अनंतकाल तक ख्याति पाता रहेगा. अब मिथकों में भरोसा रखें न रखें लेकिन गोलगप्पे की ख्याति में तो भरोसा रख सकते हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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