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शारदा सिन्हा: जिनके व्यक्तित्व में उनके गीतों जितनी ही मिठास है

शारदा सिन्हा उन लोगों से हैं जिनसे मुलाकात कर किसी अपने से मिलने का अहसास होता है

Updated On: Jan 29, 2018 03:52 PM IST

Swati Arjun Swati Arjun
स्वतंत्र पत्रकार

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शारदा सिन्हा: जिनके व्यक्तित्व में उनके गीतों जितनी ही मिठास है

भोजपुरी गायिका शारदा सिन्हा को इस साल 26 जनवरी के मौके पर, संगीत के क्षेत्र में किए गए उनकी बेमिसाल काम और सेवा को देखते हुए भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया है. इससे पहले शारदा जी को साल 1995 में पद्मश्री से भी नवाज़ा जा चुका है. पच्चीस सालों के अंतराल के बाद भारत सरकार और देश के लोगों से मिले इस प्यार और अपनेपन भला कौन कलाकार खुश नहीं होगा, लेकिन इस मौके पर एक टीवी चैनल के दिए गए अपने इंटरव्यू में जब शारदा सिन्हा से कुछ कहने को कहा गया तो उन्होंने छठ के गीतों से आभार व्यक्त किया. उन्होंने बिहार में बोली जाने वाली भाषा भोजपुरी, मैथिली, मगही और बज्जिका और अंगिका जैसी बोलियों के समृद्ध इतिहास का धन्यवाद किया..बिहार की मिट्टी का शुक्रिया अदा किया.

उन्हें सुनते हुए मुझे उनके साथ अपनी एक मुलाक़ात याद आ गई जब मैं एक बीबीसी हिंदी की तरफ से उनका साक्षात्कार करने करीब पांच साल पहले, दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर पहुंची थी. वो 26 अगस्त 2012 की सुबह थी, उनसे मिलने से पहले मेरी सारी बातचीत उनके बेटे अंशुमान से फोन पर हो रही थी, अंशुमान उनके साथ थे और वे अपनी मां के सभी कार्यक्रमों की देखरेख किया करते थे. फोन पर अंशुमान से मेरी मुलाकात से पहले 4-5 बार बातचीत हो चुकी थी- हर बातचीत में वो शारदा जी के कुछ सवालों को मेरी तरफ दागते, और मैं उनका संभल-संभल कर जवाब देती.

मसलन, आपका कार्यक्रम कितने देर का होगा, शाम के किस समय प्रसारित होगा, सिर्फ रेडियो पर होगा या ऑनलाइन स्टोरी भी जाएगी, आप सवाल हिंदी में करेंगी या अंग्रेज़ी में, आपके साथ कौन-कौन होगा, तस्वीरें आप खुद खीचेंगी या कोई प्रोफेश्नल फोटोग्राफर होगा, संगीत की आपको कितनी जानकारी है, आप सिर्फ मां द्वारा फिल्मों में गाए गानों पर तो बात नहीं करेंगी आदि, आदि.

कहना न होगा कि मैं बुरी तरह से नर्वस हो चुकी थी, एक बार में मन में ख़्याल आया कि छोड़ दूं, प्लानिंग एडिटर को कह दूं कि स्लॉट किसी और को दे दें, लेकिन फिर लगा की चलो कर लेती हूं, इस बहाने मुलाकात तो होगी बिहार कोकिला शारदा सिन्हा जी से, ऐसा लोभ जिसे संभाल पाना मुश्किल हो रहा था. अगले दिन तय समय पर मैं इंडिया हैबिटैट सेंटर पहुंची, 10-मिनट लेट होने के कारण और डर गई थी... शारदा जी के बेटे अंशुमान मुझे अंदर ले गए और बाहर के कमरे में इंतज़ार करने को कहा. शारदा जी अंदर के कमरे में थीं, उनकी कुछ आवाज़ें आ रहीं थी, समझ में आ गया कि वे तैयार हो रहीं हैं.

SHARDA SINHA

फिर, मुझे अंदर बुलाया गया ये कहते हुए कि जल्दी कर लीजिएगा आधे घंटे के भीतर, मैंने पांव छूकर उन्हें प्रणाम किया, वे थोड़ी असहज हुईं पर हल्का सा मुस्कुरा दीं. उस मुस्कुराहट की ओट से ढेर सारी नरमी और उनके होठों पर सजी पान की हल्की सी लाली ने छिपने से इंकार कर दिया था. शारदा जी को गाते हुए तब 40 साल से ज्य़ादा हो गए और अगर आज कहें तो 45 से ज्यादा, पर जब मैंने पूछा कि आपको कितने वर्ष हो गए गीत गाते हुए तो वे सोच में पड़ गईं- कहा कि कभी बैठकर हिसाब-किताब नहीं किया है, खुद को संगीत की एक विद्यार्थी ही मानती हूं, सिर्फ एक एहसास है कि संगीत के साथ जीवन का अहम समय बिताया है.

इंटरव्यू के दौरान वे एक किस्सा शेयर कर रहीं थीं कि कैसे- उन्होंने बड़े भाई की शादी में भाभी के कहने पर द्वार छेंकाई का संस्कार गीत मैथिली में गाया जो उनके द्वारा गाया गया पहला लोकगीत था. इस दौरान उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं रेडियो (बीबीसी-विदेशी प्रसारण) पर मैथिली में बोल सकती हूं? तब मैंने उनसे कहा बिल्कुल- क्योंकि ये हिंदी सेवा है जो हमारे देश के सभी हिंदी के श्रोताओं के लिए है, जिसमें तमाम भाषा-बोलियों के लिए जगह है. बातचीत के दौरान जब भी उनके पिता का ज़िक्र आता वे बार हाथ जोड़कर प्रणाम करतीं और कहतीं कि पिता की दूरदर्शिता थी, जो उन्होंने उस समय में उनकी रूचि और गुण को बढ़ावा देने का निर्णय लिया. गांव में दुर्गा पूजा के दौरान जब वे स्कूली छात्रा थीं तब मंच पर उन्हें पहली बार पिता की आज्ञा से गीत गाने का मौका मिला तो नन्हीं शारदा ने गाया :

भरब हम गगरी, भरब हम गगरी, भरब हम गगरी....

                           कते दिन रामा, भरब हम गगरी

                           ठारे भरूं तो गगरिया न डूबे

                           ठारे भरूं तो गगरिया न डूबे  

                           निहुरी भरूं तो, हाय निहुरी भरूं तो

                           भिजुल मारे चुनरी, हाय कते दिन रामा.

लेकिन, हर लड़की की तरह शादी के बाद उन्हें भी अपने ससुराल में थोड़ा संघर्ष करना पड़ा, पति का भरपूर सहयोग मिलने के बावजूद सासु मां और रिश्तेदारों की नाराज़गी भी सहनी पड़ी पर बाद में उन्हीं सासु माँ ने उन्हें गांव-देहात के लोकगीत से उनका परिचय भी कराया था और उसे गाने का गुर भी सिखाया था. इसकी वजह शायद शारदा सिन्हा के व्यक्तिव का वो भदेसपन था, उनका अपने देस-गांव की संस्कृति के प्रति लगाव जिसने उनकी राह आसान कर दी. जब मैंने उनसे उनसे उनकी बेहद ही ख़ास, ख़नकती, कशिश भरी आवाज़ के बारे में पूछा कि- इसका ख़्याल कैसे रखती हैं, इतना ठहराव कहाँ से आता है तो उनका जवाब था- शास्त्रीय संगीत की शिक्षा और रियाज़. इन दोनों के बग़ैर किसी भी तरह गायन में ठहराव नामुमकिन है. फिर उन्होंने अपना हार्मोनियम निकाल कर- अपनी सासु मां द्वारा गाए कन्यादान का गीत को उन्हीं के शिल्प में गाकर सुनाया और बाद में उस गीत का अपना वर्ज़न, गीत के बोल थे...

  हरिहरअअअ....बांसाअअअ....कटहिये जे बाबाआआआ...

                       मांढ़अअअ...चढ़िअअअअ.....बनाईहिएएएए.....

                       अईता...सुंदरररर...बर त बहिसे...बबब..

                       तो दूसब त मढ़अअ...तो सोहिएए.... 

बातचीत के दौरान मैंने शारदा जी से थोड़ी लिबर्टी लेते हुई उनके ये भी कहा कि उनकी आवाज़ बहुत ही सेक्सी है, जिसपर वो हंस दीं, जब मैं बहुत सवाल कर रही थी तो उन्होंने कहा कि मुझे किसी स्टूडेंट की तरह डर लग रहा है कि आपका अगला सवाल क्या होगा? ये कि भोजपुरी गीतों में एक किस्म का गंवई भाव होता है, जिसमें कई बार डर होता है कि कुछ अश्लील न परोस लिया जाए इसलिए मैं इन्हें चुनने, उन्हें परिष्कृत करने, संशोधन करने से लेकर गाने तक में एक्टिव भूमिका अदा करती हूं. शायद यही वजह है कि शारदा सिन्हा के चुने और गाए हुए गाने ग्रामीण जीवन की सरसता और समरसता का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनके गानों में जीवन का उत्सव है- जिसे वे कई तरह के गीत, गज़ल, भजन और फिल्मी गानों के ज़रिए देश-विदेश में बसे भारतीयों के जीवन में रंग भर रहीं हैं.

एक पत्रकार होने के नाते हम कई बार कई शख़्सियतों से मिलते हैं, लेकिन कई बार वो मुलाक़ात बस उस एक असाईनमेंट के साथ खत्म हो जाती है, लेकिन शारदा सिन्हा वो शख़्स हैं जिनसे मिलकर मुझे लगा कि मैं अपनी मां या मौसी मिल रही हूं और जब मैंने उनसे ये बात कही तो उन्होंने भी उसी वक्त़ मुझे गले से लगाते हुए कहा कि ‘आधे घंटे कहा था, दो घंटे होने को आए, तुमसे बात करते हुए पता ही नहीं चला कि किसी पत्रकार को इंटरव्यू दे रही हूं, लगा कि बेटी से बात कर रही हूं तभी इतनी देर बात कर पायी.’

आते हुए मैंने उनके पांव छुए, उन्होंने मुझे गले से लगाते हुए आशीर्वाद दिया... अपने हाथों का बना मीठा पान खिलाया और कहा, स्वाति जब भी पटना आओ तो घर ज़रूर आना, तुम्हारी शारदा आंटी कितनी भी व्यस्त होगी तो भी तुमसे मिलने का समय निकाल ही लेगी.

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