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मशीनों से निकलने वाले संगीत के मुकाबले रूहानियत का संगीत है- कव्वाली

शास्त्रीय संगीत पर आधारित होने के बाद भी कव्वाली में गायकी का जकड़न नहीं है

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Sep 02, 2017 10:09 AM IST

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मशीनों से निकलने वाले संगीत के मुकाबले रूहानियत का संगीत है- कव्वाली

हिंदुस्तानी गायकी के अलग अलग अंदाज में आज हम बात करते हैं कव्वाली की. जरा सोच कर देखिए- नए दौर में नई तरह का संगीत बनता है. एक ऐसा संगीत जो कंप्यूटर से पैदा होता है. जिसको लेकर अक्सर विवाद होता है कि गायकी आज आसान हो गई है. एक ऐसा संगीत जिसमें गाने वाले की आवाज कम सुनाई देती है और ‘इलेक्ट्रॉनिक’ साज ज्यादा सुनाई देते हैं. एक ऐसा संगीत जो धड़कता है बड़े बड़े ‘ड्रम्स’ के सहारे लेकिन तमाम ‘इक्विपमेंट’ को इस्तेमाल करने वाला ये संगीत पल भर के लिए थम जाता है जब कोई भी कव्वाल अपनी बुलंद आवाज में एक तान छेड़ दे. कव्वाल गाएं तो समा बंध जाए, गुजरते हुए मुसाफिर रूक जाएं, हवा के परिंदे अपनी परवाज रोक दें.

कव्वाली की बात को और आगे बढ़ाए इससे पहले ये बेहद लोकप्रिय कव्वाली सुनिए.

हजरत अमीर खुसरो का कलाम है गोरी सोवे सेज पर मुख पर डाले केस, चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुं देस. हजरत अमीर खुसरो ने जो फरमाया जो सदियों के आर पार इस देश के लोगों ने गुनगुनाया. हजरत अमीर खुसरो ने जिन साजों को ईजाद किया उन साजों के सहारे हिंदुस्तानी संगीत सजा-संवरा और आगे बढ़ा. हजरत अमीर खुसरो ने जिस संगीत की परंपरा को शुरू किया वो सूफीयत के सहारे आज भी जिंदा है. जिसे हम कव्वाली के तौर पर जानते हैं.

दरअसल इतिहास बताता है कि सूफी संत जब भारत आए तो अपने पसंद का तराना भी साथ लेकर आए थे. शुरूआत में सूफी संत अल्लाह की शान में ‘हम्द’ गाया करते थे. हम्द की भाषाएं अलग अलग थीं. लेकिन इसमें खुदा के अलावा किसी और का नाम नहीं लिया जाता था नातिए-रसूल हजरत मोहम्मद की शान में गाए जाते थे. ऐसे ही मनकवद ख्वाजा गरीब नवाज यानी मोइनुद्दीन चिश्ती की शान में गाए जाते हैं. इसका उद्देश्य इस्लाम का प्रचार प्रसार करना भी था.

कव्वालों और शास्त्रीय गवैयों में फर्क

कव्वालों की गायकी के अंदाज के बारे में बात की जाए तो ऐसा कहा जाता है कि वो शास्त्रीयता के साथ तो गाते हैं लेकिन जितने खुलेपन से गाते हैं उतने खुलेपन से शास्त्रीय गवैये नहीं गाते हैं. इसमें शास्त्रीय संगीत की तरह की जकड़न नहीं है. फिर भी कव्वाली का संगीत शास्त्रीय संगीत पर ही आधारित है.

खास तौर पर कव्वाली की परंपरागत चीजें यानि नक्श, गुल, शोशो, गोशो में शास्त्रीयता हुआ करती थी. कव्वाली गायकी के विषयवस्तु में एक रूहानियत है. कव्वाली का इतिहास एक बड़ी अनोखी दास्तान बताता है जिसमें दो सूफी संतों का जिक्र काफी है- शम्स तबरेज और जलालुद्दीन रूमी. रूमी अक्सर कहा करते थे कि शम्स तबरेज रोशनी हैं और मैं उनका साया. कलाम उनका है और निकलता मेरी जुबां से है. कव्वाली के दस प्रमुख अंग हुआ करते थे लेकिन अब उनमें से तीन या चार ही प्रचलन में हैं.

अस्तुत, हम्द, नात, मनकवद, आरफाना, वहदानियत, रिंदाना, आशिकाना. सबसे पहले हम्द या नाते शरीफ गाया जाता था. कव्वाली को कौल से शुरू किए जाने की भी परंपरा है. कौल को मौसिकी में हजरत अमीर खुसरो लेकर आए. आप भी कौल सुनिए

ऐसी ही एक और बेहद लोकप्रिय कव्वाली आपको सुनाते हैं. मोपे किरपा करो महाराज, सर चौखट पर झुका हुआ और सुर आसमान की बुलंदियों को छूने वाले, ऐसे में महाराज कृपा ना करें तो कैसे ना करें.

ग़ज़ल गायकी के करीब है कव्वाली

कव्वाल अपने कार्यक्रम के दौरान तरह तरह के कलामों का गुलदस्ता पेश करते हैं. उसमें अलग-अलग शायरों के शेर आते हैं. इसीलिए ऐसा भी कहा जाता है कि कव्वाली गजल के करीब पड़ती है यानी कव्वाली गायकी का एक खास असर ग़ज़ल गायकी में भी देखने को मिलता है. कव्वाली में भी ग़ज़ल गायकी जैसा ही सौन्दर्य और विषय वस्तु है. कव्वाली और ग़ज़ल में गाई जाने वाली साहित्यिक रचना का स्वरूप एक जैसा ही होता है. इन समानताओं के साथ साथ कव्वाली और ग़ज़ल गायकी में कुछ खास अंतर भी हैं.

आम तौर पर कव्वाली गायकी बलपूर्वक और जोश से भरी हुई होती है जबकि ग़ज़ल गायकी बड़ी ही नजाकत, नफासत और कोमलता वाली चीज है. पांरपरिक तौर पर कव्वाल ग़ज़लें भी गाया करते थे. इसकी वजह है कव्वाली की तासीर. जो किसी इंसान को बेकरारी से बेखुदी तक ले जाती है. जिसमें हिंदुस्तान की मिट्टी की खुशबु है. जो सुनने वालों के दिलो दिमाग के साथ साथ रूह में बस जाती है.

एक और बेहद लोकप्रिय कव्वाली सुनिए-

कैसे धीरे धीरे बदलती चली गई कव्वाली

पांरपरिक तौर पर यूं तो कव्वाली सूफी संतों की दरगाहों से जुड़ी है, लेकिन वक्त बीता और कव्वाली जुड़ गई हमारे समाज के, हमारी जिंदगी के अलग अलग पहलुओं से, अलग अलग मौकों से. कभी बसंत आई तो कव्वाली गाई गई. कभी कोई त्योहार आया तो कव्वाली गाई गई. कव्वाली की लोकप्रियता धीरे धीरे ऐसी हो गई कि जिसमें फुहार भी, जिसमें बहार भी, जिसमें हमारे त्योहार भी. खास तौर पर खुदा की इबादत, हुस्नो इश्क, नाजो अंदाज से अलग शादी ब्याह और बसंत के आने पर भी कव्वाली गाई जाने लगी. बस ध्यान इस बात का रखा गया कि कव्वाली गाए जाने के समय और प्रकृति पर विचार जरूर किया जाए. विषयवस्तु के लिहाज से कव्वाली एक खास क्रम में ही गाई जाती है. ताल के लिहाज से कव्वाली ज्यादातर कहरवा, रूपक, खेमटा और दीपचंदी तालों में पेश की जाती है. कव्वाली का परंपरागत अंत रंग से किया जाता है तो आपको आबिदा हुसैन का गाया रंग सुनाते हैं.

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