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तुम सादेक़ैन को जानते हो? अरे वही जो मेहनतकशों का चित्रकार था

सादेक़ैन उन लोगों में से थे जिन्हें किसी खास काम के लिए पैदा होना पड़ता है.

Nazim Naqvi Updated On: Feb 10, 2017 02:09 PM IST

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तुम सादेक़ैन को जानते हो? अरे वही जो मेहनतकशों का चित्रकार था

पता है? आज यानी 10 फरवरी को सादेक़ैन की तीसवीं बरसी है. अच्छा? लेकिन ये सादेक़ैन हैं कौन? अरे तुम सादेक़ैन को नहीं जानते? अरे भई, मशहूर चित्रकार, जिनके कुछ चित्र और मुराल्स तो दुनिया में पिकासो की पेंटिंग की तरह मशहूर हैं. मतलब, वो क्या है, हां, क्या एमएफ़ हुसैन से भी ज्यादा मशहूर?

जाहिर है कि इस बातचीत में सवाल पूछने वाला यकीनन कोई चित्रकार या कला-प्रेमी नहीं है वर्ना ऐसी गुफ्तुगू कभी न करता. लेकिन चलिए इसी बहाने, बात तो निकल ही पड़ी सादेक़ैन की.

चित्रकारिता जगत में सादेक़ैन की विशिष्ट पहचान है उनका अपने आस-पास की जिंदगी को पूरी शिद्दत और सच्चाई से देखना. खुद मेहनत करते थे और दुनिया के तमाम मेहनतकशों के सुख-दुख के रंगों से तस्वीर गढ़ते थे. लोगों ने तो उन्हें जनपक्षधर ही नहीं, राजनीतिक तक कहा है. उनका ‘औरत की दुनिया’ दर्शाने वाला चित्र तो एक फ्रेम में पूरी कहानी बयान करता है.

सादेक़ैन अहमद नक़वी, जी हां यही पूरा नाम था लेकिन वो दुनिया में अपने चाहने वालों के बीच सिर्फ सादेक़ैन के नाम से मशहूर थे. 1930 में दिल्ली के करीब अमरोहा में जन्म हुआ. स्नातक तक की पढ़ाई यहीं हुई. बचपन से ही चित्रों से लगाव ऐसा था कि उंगलियां शब्द लिखती नहीं, बनाती थीं.

भारत की पैदाइश, पाकिस्तान की रिहाइश

सादेक़ैन 1948 में पकिस्तान चले गए लेकिन 80 के दशक में कुछ वर्षों के लिए एक बार भारत आए. यहां बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अलावा हैदराबाद और दिल्ली में भी अपनी कला के नमूने उकेरे जो नायाब हैं. 56 वर्ष की उम्र में, 1986 में वह इस दुनिया से रुखसत हो गए.

लोग कहते हैं कि वो कैलिग्राफी, और लोग क्या, खुद उनकी कैलिग्राफी इस बात का जीता-जागता सुबूत है कि वो उसके माहिर थे. उनका शौक उन्हें फ्रांस तक ले गया, जहां उन्होंने अल्बेर कामू के चर्चित उपन्यास ’द स्ट्रेंजर’ का चित्रण (इलस्ट्रेशन) किया और शोहरत कमाई.

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लेकिन जिस सादेक़ैन को हम यहां उकेरना चाहते हैं उसके लिए वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक की मदद जरूरी है. अशोक भौमिक अपने दुबई यात्रा के एक वृतांत में लिखते हैं- ‘दुबई में दूसरे ही दिन हुसैन साहब और सादेक़ैन साहब पर एक कार्यक्रम था, जिसे स्थानीय कैपिटल-क्लब में आयोजित किया गया था. कुछ चित्र हुसैन के थे और कुछ सादेक़ैन के.

भौमिक कहते हैं, 'लेकिन दिक्कत एक थी, और वह ये कि मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि किस वज़ह से सादेक़ैन और हुसैन को एक साथ रख कर यह आयोजन किया गया था. क्योंकि इन दोनों  कलाकारों का कला रचना का उद्देश्य ही बिलकुल अलग  है. एक कलाकार ने जिंदगी भर अपना एक भी चित्र नहीं बेचा, वहीं दूसरे कलाकार की कला रचना के पीछे यही एकमात्र घोषित उद्देश्य रहा.

'सवाल यहां किसी कलाकार के छोटे या बड़े होने  का नहीं है, सवाल है अपने लिए प्राथमिकताओं के चयन  का, जिसकी आजादी हुसैन साहब को भी उतनी थी, जितनी सादेक़ैन को.’

बेचने के लिए नहीं गढ़ने के लिए कला

दिल्ली में रह रहे उनके भांजे मोहम्मद अली हैदर नकवी, जिन्होंने उनकी याद में ‘सादेक़ैन मेमोरियल ट्रस्ट’ बनाया है, एक बड़ा दिलचस्प किस्सा बताते हैं. ‘एक दिन का वाकया है कि उन्होंने अपने नौकर के चेहरे पर परेशानी की झलक देखी. पूछा, तो पता चला कि वो अपनी बेटी की तरफ से बहुत परेशान है जिसकी शादी हाल ही में तय हो गयी है. लेकिन इसमें परेशानी की क्या बात है?

जवाब मिला कि पूरे पैसों का इंतजाम अभी तक नहीं हो पाया है. कितने कम पड़ रहे हैं? सादेक़ैन के इस सवाल पर उसने जवाब दिया ‘जनाब, अस्सी हजार’. सादेक़ैन सोच में डूब गए और उसे चाय लाने भेज दिया.

थोड़ी ही देर गुजरी थी कि एक कला-संग्राहक घूमता फिरता उधर निकल आया. एक पेंटिंग की तरफ इशारा करते हुए उसने उसकी कीमत पूछी. सादेक़ैन झट से बोले, अस्सी हजार. संग्राहक को इस ‘अस्सी-हजार’ पर थोड़ा ताज्जुब हुआ.  ‘सादेक़ैन साहब इसके तो मैं ज्यादा भी दे सकता था.’ सादेक़ैन फिर झट से बोले ‘तो फिर दे दो अस्सी हजार’. संग्राहक ने मुस्कुराते हुए पूछा लेकिन सिर्फ अस्सी हज़ार ही क्यों? सादेक़ैन ने कहा इसलिए कि इस वक्त मुझे इतनी ही जरूरत है.

सादेक़ैन वाकई फकीर थे किसी ने खाना खिला दिया तो खिला दिया नहीं तो सिगरेट और शराब तो थी ही जिंदगी जीने के लिए. कुछ लोग एक बोतल शराब थमा कर उनसे पेंटिंग ले जाते रहे. कुछ चाहने वाले ऐसे भी थे कि जब भी मिलने आते साथ कुछ खाने की चीजें जरूर लाते. सादेक़ैन यूं तो अकेले थे, शादी नहीं की, लेकिन आम लोगों का भरपूर प्यार मिलता रहा.

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सादेक़ैन की नतिनी (रिश्ते में) अंबरीन ने ‘सादेक़ैन जी से भुलाया न जाएगा’ नाम से प्रकाशित अपनी किताब में लिखा, ‘उस शाम मैंने देखा कि ब्रश और मुसव्विर (चित्रकार) के हाथ का क्या रिश्ता होता है. अपनी तस्वीरों की तरह कज-मज और टेढ़े-मेढ़े सादेक़ैन के हाथ से ब्रश को अलहदा करने के लिए सफ़ेद तामचीनी के बड़े तसले में गरम पानी लाया जाता है. सादेक़ैन अकड़ी हई उंगलियों में फंसे हुए ब्रश समेत अपना हाथ उसमें डालते हैं. और फिर गरम पानी से टकोर के बाद ही उनको उंगलियां ब्रश से जुदा होती हैं. वो मैले-कुचैले और रंगों से लिथड़े हुए दामन से अपनी गीली उंगलियां पोंछते हैं और मैं उनकी खमीदा (मुड़ी हुई) उंगलियों को देखती रहती हूँ जिन्होंने ब्रश से ऐसा इश्क किया कि फिर कभी आपकी हमारी उंगलियों की तरह सीधी न हो सकीं.’

शायर भी थे सादेक़ैन

सादेक़ैन शायर भी थे और उनकी शायरी में भी उनका चित्रकार मरता नहीं है. उनकी ये पंक्तियां तो सीधे दिल में उतर जाती हैं.

'दिन रात हो जब शाम या पौ फूटती है कन्नी मेरे हाथों से नहीं छूटती है फिर काम से दुख जाता है इतना मेरा हाथ रोटी को जो तोड़ूं तो नहीं टूटती है'

पकिस्तान के ही एक चित्रकार मुअज्ज़म अली, जो जलरंग में राजस्थानी औरतों के चित्रों के लिए बहुत मशहूर हैं,  सादेक़ैन की एक बात बताते हैं जिससे उस शख्सियत को समझने का एक इशारा जरूर मिलता है.

मुअज्ज़म कहते हैं कि एक बार सादेक़ैन ने अपने गिलास में शराब डालते हुए कहा था, ‘सैयद मुअज्ज़म अली रिज़वी, इस शराब को कभी हाथ न लगाना. कोई अगर पीने  के लिए जबरदस्ती करे तो कहना,  मैं तो पी ही नहीं सकता, क्योंकि मेरे हिस्से की पूरी शराब तो सादेक़ैन पी कर चला गया है.’

यकीनन सादेक़ैन उन लोगों में से हैं जिन्हें किसी खास काम के लिए पैदा होना पड़ता है.

फैज़ अहमद फैज़ जैसी शख्सियत तो उनमें ग़ालिब जैसी विशेषताएं देखती है और उसे लिखना पड़ता है, ‘जिस तरह ग़ालिब ने तसव्वुर (कल्पना) के इस आबगीने (शीशे) को पिघलाकर अलफ़ाज़ (शब्दों) के साग़र (मद का प्याला) में उंडेला उसी तरह सादकैन ने अलफ़ाज़ को गुदाज़ (निर्मल) करके रंग-ओ-ख़त के सागर में ढाला है. हम दोनों के शुक्रगुजार हैं.’

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