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रागदारी : 'पंख होते तो उड़ आती रे' जैसे हिट गाने बनाने वाले संगीतकार की कहानी

एक काबिल संगीतकार को 20 साल बाद किस शास्त्रीय राग ने दिलाई थी फिल्मी संगीत में पहचान

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Aug 21, 2017 11:17 PM IST

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रागदारी : 'पंख होते तो उड़ आती रे' जैसे हिट गाने बनाने वाले संगीतकार की कहानी

साल 1944 की बात है. उस दौर के बड़े संगीतकार राम गांगुली के पास एक दिन एक नया कलाकार आया. उस कलाकार को बांसुरी बजानी आती थी. शहनाई बजानी आती थी. वो बॉम्बे काम की तलाश में आया था. राम गांगुली ने उसे अपने साथ रख लिया.

उस कलाकार ने संगीतकार राम गांगुली को संगीत बनाने में मदद देने का काम शुरू कर दिया. इसके करीब चार साल बाद की बात है. जाने-माने कलाकार राज कपूर पहली बार फिल्म डायरेक्शन की दुनिया में कदम रखने जा रहे थे. फिल्म का नाम था- आग. फिल्म में राज कपूर और नरगिस थे. इस फिल्म में संगीत देने का जिम्मा राम गांगुली का था.

इस फिल्म में राम गांगुली ने उस कलाकार से काम लिया. कलाकार ने फिल्म में जहां-जहां जरूरत थी वहां बांसुरी और शहनाई बजाई. ऐसे ही वक्त बीतता गया. दो साल बाद उस कलाकार को बतौर संगीत निर्देशक अपनी पहली फिल्म मिली. उस फिल्म को डायरेक्टर राजकुमार संतोषी के पिता पीएल संतोषी बना रहे थे.

अफसोस कि वो फिल्म पूरी नहीं हो सकी. जाहिर है लोग उस कलाकार की प्रतिभा को जान नहीं पाए. ऐसे ही गुमनामियों के दौर में जी रहे उस कलाकार की किस्मत कुछ तब चमकी जब उसकी मुलाकात जाने-माने निर्देशक वी शांताराम से हुई. वी शांताराम ने उस कलाकार के साथ दो फिल्में की. पहली ‘सेहरा’ और दूसरी ‘गीत गाया पत्थरों ने’.

सेहरा फिल्म का संगीत खूब पसंद किया गया. फिल्म के लगभग सभी गाने खूब चले. हसरत जयपुरी के लिखे गीत ‘पंख होते तो उड़ आती रे रसिया ओ बालमा’, ‘तकदीर का फसाना’ और ‘तुम तो प्यार हो सजनी’ को लोगों ने खास तौर पर खूब सराहा. इस फिल्म के बाद ही जाकर कहीं लोग जान पाए कि फिल्म इंडस्ट्री में रामलाल नाम के एक संगीतकार भी हैं जो लगभग बीस साल से काम कर रहे हैं.

अगले ही साल वी शांताराम ने फिल्म गीत गाया पत्थरों ने बनाई. इस फिल्म के साथ ही अभिनेता जीतेंद्र ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी.

इस फिल्म में वी शांताराम ने अपनी बेटी राजश्री को भी लॉन्च किया था. राजश्री वी शांताराम की दूसरी पत्नी जयश्री से उनकी औलाद थीं. बाद में उन्होंने जानवर और ब्रह्मचारी जैसी फिल्मों में भी अभिनय किया. इस फिल्म में जितेंद्र ने एक ऐसे मूर्तिकार का रोल निभाया था जो अभिनेत्री को देख देखकर उसकी मूर्तियां बनाता था. इस फिल्म में भी वी शांताराम ने संगीत निर्देशन का जिम्मा रामलाल को ही दिया. गीत एक बार फिर हसरत जयपुरी के ही लिखे हुए थे. इस फिल्म में रामलाल ने शास्त्रीय राग दुर्गा पर एक गाने को कंपोज किया जो उस दौर में काफी हिट हुआ.

आप भी उस गाने को सुनिए. इसके बाद राग दुर्गा की बात करेंगे. कहा जाता है कि पंख होते तो उड़ आती रे गाने के हिट होने के बाद ही फिल्म इंडस्ट्री ने संगीतकार रामलाल के असली हुनर को पहचाना.

आज की राग की कहानी एक संगीतकार के बहाने से निकली है तो आपको बता दें कि फिल्म गीत गाया पत्थरों ने की कामयाबी के बाद संगीतकार रामलाल ने दो-तीन फिल्में की. एक फिल्म बनाने की कोशिश भी की लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी. उनकी किस्मत ने साथ देना बंद कर दिया था. लिहाजा वो हमेशा गुमनामी के अंधेरे में ही रहे.

कुछ ऐसी ही कहानी इससे पहले 1960 में आई फिल्म बंजारन की भी है. फिल्म बंजारन में संगीतकार परदेसी ने भी एक गाने की धुन राग दुर्गा पर तैयार की थी. इस गाने को लता मंगेशकर और मुकेश ने गाया था. गान के बोल थे ‘चंदा रे मोरी पतिया ले जा.’

अफसोस की बात ये है कि रामलाल की तरह ही फिल्मी दुनिया में संगीतकार परदेसी को भी कम ही पहचान मिल पाई. आप आज से लगभग साठ साल पहले के इस गाने के संगीत को सुनिए और एहसास कीजिए कि उस दौर के संगीतकारों में किस तरह की काबिलियत थी.

एक और दिलचस्प कहानी ये भी है कि रामलाल और परदेसी के बाद के संगीतकारों को इसी राग पर कंपोज किए गए गानों के लिए जमकर तारीफ मिली. 1964 में आई फिल्म जिद्दी का गाना- रात का समा झूमे चंद्रमा और 1967 में आई फिल्म मिलन का गाना- सावन का महीना पवन करे शोर इन गानों के संगीतकारों लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और एस डी बर्मन को बाद में फिल्म इंडस्ट्री में जबरदस्त कामयाबी मिली. इन लोकप्रिय गानों में से कुछ गाने आप भी सुनिए.

आइए अब आपको राग दुर्गा के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. जिसके लिए सबसे पहले आप एनसीईआरटी का वो वीडियो देखिए जिसमें राग दुर्गा के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है.

राग दुर्गा का जन्म बिलावल थाट से हुआ है. इसमें ‘ग’ और ‘नी’ वर्जित है. इस राग की जाति औडव-औडव है. इस राग का वादी स्वर ‘ध’ और संवादी स्वर ‘रे’ है. इस राग में लगने वाले सभी स्वर शुद्ध हैं. इसे रात के दूसरे प्रहर में गाया बजाया जाता है. इस राग का आरोह अवरोह देखिए आरोह- सा रे म प ध सा अवरोह- सा ध प म रे सा पकड़- ध, म रे S प, प ध म S रे, सा रे S ध सा

वैसे इस राग के वादी-संवादी स्वरों को लेकर दो विचारधाराएं भी हैं. दूसरी विचारधारा के मुताबिक इस राग में ‘म’ वादी और ‘सा’ संवादी है.

शास्त्रीय गायकों में आज हम आपको एक ऐसे महान कलाकार का गाया दुर्गा सुना रहे हैं जो अद्भुत प्रतिभा के धनी थे. जयपुर अतरौली घराने के महान कलाकार मल्लिकार्जुन मंसूर की आवाज में सुनिए राग दुर्गा. उनके साथ-साथ एक ऐसे कलाकार का गाया राग दुर्गा सुनिए जिन्होंने शास्त्रीय गायकी में एक अलग ही मुकाम हासिल किया. दिलचस्प बात ये है कि उन्होंने खुद को घराने की गायकी से अलग रखा. वो किसी घराने के कलाकार नहीं बने, पंडित कुमार गंधर्व.

शास्त्रीय वाद्ययंत्रों में आज आपको शहनाई और बांसुरी सुनाते हैं. इन दोनों वाद्ययंत्रों के साथ ऐसे कलाकारों का नाम जुड़ा हुआ है जो इनके पूरक माने जाते हैं. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और पंडित हरि प्रसाद चौरसिया का बजाया राग दुर्गा सुनिए.

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