विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

रागदारी: किस नाम से दुनिया भर में मशहूर हुए मोहम्मद ज़हूर और अब्दुल हई?

राग पहाड़ी के जरिए एक कमाल की जोड़ी की कहानी-एक शायरी का जादूगर दूसरा संगीत का

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Sep 17, 2017 10:31 AM IST

0
रागदारी: किस नाम से दुनिया भर में मशहूर हुए मोहम्मद ज़हूर और अब्दुल हई?

आज जिस राग की कहानी हम आपको सुनाने जा रहे हैं उसके बहाने पहले आपको दो दोस्तों का किस्सा सुनाते हैं. ये दोनों ही दोस्त भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के बहुत बड़े फनकार रहे हैं. एक का असली नाम था मोहम्मद ज़हूर और दूसरे का अब्दुल हई. दोनों को जोड़ने वाली चीज थी उनकी पंजाबियत.

अब्दुल हई के पिता का नाम था चौधरी फज़ल मुहम्मद और मां थीं सरदार बेगम. अपने पति की अय्याशी से उबकर एक रोज सरदार बेगम ने अब्दुल हई का हाथ थामा और घर छोड़कर चली गईं. सरदार बेगम ने दिन रात रंगरलियां मनाने वाले अपने शौहर चौधरी फज़ल मुहम्मद पर मुकदमा भी किया. एक दशक से भी ज्यादा समय तक चले मुकदमे के बाद सरदार बेगम को जीत मिली. कोर्ट ने सरदार बेगम और फज़ल मुहम्मद के तलाक को मंजूरी दे दी. बाद में फज़ल मुहम्मद ने बेटे पर अपना हक़ हासिल करने के लिए भी मुकदमा किया लेकिन वो हार गया.

इससे झल्लाकर उसने कुछ गुंडों को मां-बेटे के पीछे लगाया. सरदार बेगम को धमकियां मिलीं लेकिन उसने अपने बेटे के साथ रहने का फैसला किया तो उसी पर अड़ी रही. दूसरे दोस्त की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. मोहम्मद ज़हूर का जन्म जालंधर के करीब हुआ. उन्हें फिल्मों का इस कदर शौक था कि वो घर से भागकर संगीत सीखने के लिए दिल्ली आ गए. घरवालों ने पढ़ाई पूरी करने के लिए वापस बुलाया. जैसे-तैसे पढ़ाई की लेकिन आखिरकार फिल्मों का ही रुख किया.

यह भी पढ़ें: रागदारी : 'पंख होते तो उड़ आती रे' जैसे हिट गाने बनाने वाले संगीतकार की कहानी

इन दोनों दोस्तों की कहानी को और आगे बढ़ाने से पहले इनके उन नामों का भी खुलासा कर देना ठीक होगा जिनसे उन्हें आसमान की बुलंदियों वाली शोहरत मिली. मोहम्मद ज़हूर यानी मशहूर संगीतकार खय्याम साहब और अब्दुल हई यानी कमाल के शायर साहिर लुधियानवी. आज जिस राग की हम बात करने जा रहे हैं वो राग है-राग पहाड़ी. राग पहाड़ी पर कंपोज किया गया ये गाना सुनिए फिर इस कहानी को आगे बढ़ाते हैं.

साठ के दशक में इन दोनों कलाकारों की दोस्ती परवान चढ़ चुकी थी. इस गाने के बनने के पीछे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. हुआ यूं कि खय्याम साहब की एसडी बर्मन से कुछ अनबन हो गई थी. उसके बाद ही खय्याम और साहिर और ज्यादा करीब आ गए. यहां तक कि 1960 में जब रमेश सहगल राज कपूर को लेकर ‘फिर सुबह होगी’ बना रहे थे तो उन्होंने गीतकार के तौर पर साहिर लुधियानवी को साइन किया था.

साहिर ने संगीतकार के तौर पर खय्याम का नाम सुझाया. रमेश सहगल खय्याम के नाम पर मानने को तैयार नहीं थे. उन्हें लगा कि राज कपूर शंकर जयकिशन के अलावा किसी और संगीतकार के नाम पर मंजूरी नहीं देंगे. आखिरकार राज कपूर इस बात के लिए राजी हो गए खय्याम के साथ एक बैठक की जाए.

बैठक में राज कपूर ने खय्याम साहब को एक ये बताते हुए एक तानपुरा दिया कि उस तानपुरे को उस वक्त तक किसी ने बजाया नहीं था और लता मंगेशकर ने उन्हें वो तानपुरा दिया है. खय्याम साहब ने उस तानपुरे को छेड़ा, कुछ धुनें राज कपूर को सुनाईं और उसके बाद बाकी बातें इतिहास में दर्ज हैं. ये गीत जो हम आपको अब सुनाने जा रहे हैं वो हमारे आज के राग पर आधारित तो नहीं है लेकिन खय्याम के ‘मास्टरपीस’ में से एक है.

बाद में खय्याम और साहिर की जोड़ी ने एक से बढ़कर एक फिल्मों में साथ काम किया. जिनमें से ‘शगुन’ फिल्म का जिक्र जरूरी है. जिसके गीत ‘पर्वतों के पेड़ों पर’ को हमने आपको सुनाया था. इस गाने में वहीदा रहमान के अभिनय की जमकर तारीफ हुई थी. ऐसी ही फिल्मों में ‘कभी-कभी’ का नाम भी प्रमुखता से लिया जाना चाहिए.

खैर चलिए वापस लौटते हैं अपने आज की राग पहाड़ी पर. भारतीय फिल्मी संगीत में राग पहाड़ी जबरदस्त ‘पॉपुलर’ राग रहा है. 1946 में आई फिल्म- अनमोल घड़ी का ‘आवाज दे कहां है’, 1957 में आई फिल्म-भाभी का ‘चल उड़ जा रे पंछी’, 1960 में आई फिल्म कोहिनूर का ‘दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात’, 1965 में आई फिल्म- वक्त का ‘आगे भी जाने ना तूं’, 1967 में आई फिल्म- राम और श्याम का ‘आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले’, 1971 में आई फिल्म-पाकीजा का ‘चलो दिलदार चलो’ और 1979 में आई फिल्म नूरी का ‘आजा रे आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा’ जैसे सैकड़ों गाने राग पहाड़ी पर तैयार किए गए हैं. इस लंबी फेहरिस्त में से कुछ गाने सुन लेते हैं.

फिल्मी गीतों के साथ साथ इस राग पर आधारित एक ग़ज़ल भी बेहद लोकप्रिय हुई.   ग़ज़ल सम्राट गुलाम अली की पसंदीदा ग़ज़लों में से एक ‘दिल में इक लहर सी उठी है अभी’ भी राग पहाड़ी पर ही कंपोज की गई है. नासिर काज़मी की लिखी इस ग़ज़ल की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कुछ समय पहले एक पंखा बनाने वाली कंपनी ने इन्हीं लाइनों को लेकर अपना विज्ञापन तैयार किया था. खैर आप भी सुनिए ये कमाल की ग़ज़ल-‘दिल में इक लहर सी उठी है अभी’

चलिए अब आपको हमेशा की तरह राग के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. राग पहाड़ी अपने भीतर निश्चित तौर पर पहाड़ के लोकगीत को समेटे हुए एक राग है. पहाड़ी संपूर्ण जाति का राग है लेकिन इसका मूल आधार भूपाली जैसा है. भूपाली के चलन को बदलकर और शुद्ध मध्यम और निषाद लगाने से इस राग का स्वरूप बनता है.  चूंकि मंद्र और मध्य सप्तक में ही राग खिलता है इसलिए मध्यम को सा मानकर इसे गाया बजाया जाता है. इस राग का आरोह अवरोह देखिए-

आरोह- प ध सा रे ग प ध सां

अवरोह- सां नी ध प म ग रे सा नी ध प ध सा

पकड़- सा ध प ध म ग प ध सा

फिल्मी संगीत की तरह ही शास्त्रीय संगीत के दिग्गज कलाकारों ने भी राग पहाड़ी को खूब गाया बजाया है. आपको उस्ताद राशिद खान की गाई ठुमरी ‘बातों बातों में’ सुनाते हैं जो इसी राग पर आधारित है. उसके बाद मशहूर सितार वादक शुजात खान का राग पहाड़ी पर एक वीडियो जिसमें परवीन सुल्ताना की गायकी भी है.

अगले हफ्ते एक और शास्त्रीय राग के साथ हाजिर होंगे.

 

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi