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रागदारी: कैसे बन गई एक कलाकार और एक पहलवान के बेटे की जोड़ी

यश चोपड़ा के पसंदीदा संगीतकारों के बहाने राग आसावरी की कहानी

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Aug 06, 2017 09:59 AM IST

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रागदारी: कैसे बन गई एक कलाकार और एक पहलवान के बेटे की जोड़ी

आज जिस राग की कहानी हम आपको सुनाने जा रहे हैं उसके पहले दो छोटे छोटे सवाल. हम कुछ फिल्मों के नाम आपको बताते हैं- सिलसिला, फासले, विजय, चांदनी, लम्हे, परंपरा, साहिबां और डर. 1981 से लेकर 1993 के बीच आई इन फिल्मों में एक बात ‘कॉमन’ रही. क्या आप उस ‘कॉमन’ बात को जानते हैं?

दरअसल, इन सभी फिल्मों में संगीत शिव-हरि का था. इसमें से सिलसिला, चांदनी और डर के लिए इस जोड़ी को फिल्मफेयर अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया. एक और दिलचस्प बात आपको बता देते हैं. इन 8 में से 7 फिल्मों के निर्देशक भी एक ही थे और वो थे- यश चोपड़ा साहब.

एक के पिता कलाकार तो दूसरे के पहलवान

खैर, अगर आप पहले सवाल का जवाब जानते थे तो अगला सवाल: शिव-हरि की जोड़ी आखिर थी किसकी? एक का जन्म जम्मू में हुआ था तो दूसरे का इलाहाबाद में. दोनों शहरों के बीच की दूरी लगभग 1300 किलोमीटर. एक के पिता जाने-माने कलाकार, दूसरे के पिता पहलवान. एक के पिता बचपन से ही अपने बेटे को कलाकार बनाना चाहते थे, दूसरे को गाने-बजाने पर मार खानी पड़ती थी. ये जोड़ी थी विश्व विख्यात संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा और बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की.

आज हम जिस राग की बात करने जा रहे हैं उसका सीधा रिश्ता इन महान कलाकारों से है. 90 के दशक की बात है. जाने माने निर्देशक यश चोपड़ा एक फिल्म बना रहे थे. इस फिल्म का प्लॉट ‘साइकोलॉजिकल थ्रिलर’ का था. फिल्म में शाहरुख खान, सनी देओल और जूही चावला थे. ये फिल्म थी- डर, जो 1993 में रिलीज हुई. इस फिल्म ने कामयाबी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.

फिल्म में संगीत देने के लिए यश चोपड़ा ने एक बार फिर अपने पसंदीदा शिव-हरि को चुना. यश चोपड़ा की फिल्मों में इस जोड़ी ने पहले भी कमाल का काम किया था. सभी फिल्मों में संगीत पक्ष एक से बढ़कर एक था.

डर फिल्म के लिए शिव-हरि ने एक गाना कंपोज किया था जो आज भी बेहद लोकप्रिय है. जादू तेरी नजर खुशबु तेरा बदन, गीत के बोल लिखे थे आनंद बख्शी ने. पहले ये गाना सुनिए इसके बाद कहानी को आगे बढ़ाते हैं.

इस गाने को उदित नारायण ने ‘मूड’ से गाया भी था. इस गाने के लिए शिव-हरि ने शास्त्रीय संगीत के प्रचलित राग आसावरी को चुना. राग आसावरी शास्त्रीय संगीत के शुरुआती रागों में आता है. दिलचस्प बात ये है कि 50 और 60 के दशक में तो कुछ फिल्मी गाने इस राग पर बनाए भी गए थे, लेकिन जैसे-जैसे भारतीय फिल्मों में संगीत पक्ष बदला वैसे-वैसे संगीतकारों ने इस राग का इस्तेमाल कम ही किया.

लगभग 4 दशक बाद जब शिव-हरि ने इस राग को इस गाने में इस्तेमाल किया तो कामयाबी की नई कहानी लिख डाली. वैसे संगीत के कुछ जानकारों ने इस गाने की कॉम्पोजीशन में मिश्र आसावरी का पक्ष भी महसूस किया है.

आसान शब्दों में ये कहा जा सकता है कि किसी भी शुद्ध राग में जब थोड़ा सा बदलाव कर दिया जाता है तो उसके साथ मिश्र जुड़ जाता है. चलिए आपको राग आसावरी में कंपोज किए गए कुछ और गाने बताते हैं.

1949 में आई फिल्म बड़ी बहन का गाना चले जाना नहीं नैना मिला के, 1963 में आई फिल्म आज और कल का गाना मुझे गले से लगा लो भी राग आसावरी में ही कंपोज किया गया था. एक और शानदार गीत जो इस राग में कंपोज किया गया उसे भी सुनिए, फिल्म थी 1966 में आई दो बदन-

इस बेहतरीन गाने के बोल शकील बदायूंनी साहब ने लिखे थे. इस गाने के लिए लता मंगेशकर को सर्वश्रेष्ठ गायिका के फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए नॉमिनेशन भी मिला था.

आइए अब आपको राग आसावरी के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. इस राग को अपने नाम वाले थाट से ही पैदा होने वाला राग माना जाता है. राग बिलावल और राग कल्याण में भी ऐसा ही होता है.

राग आसावरी को राग जौनपुरी के करीब का राग माना जाता है. राग आसावरी में ‘ग’ ‘ध’ और ‘नी’ कोमल लगते हैं. इस राग का वादी स्वर ‘ध’ और संवादी स्वर ‘ग’ है. हम आपको पहले भी बता चुके हैं कि आसान शब्दों में वादी और संवादी किसी भी राग के राजा और वजीर जैसी अहमियत वाले सुर होते हैं. आरोह में ‘ग’ और ‘नी’ वर्जित है. अवरोह में सातों सुर लगते हैं. इस राग की जाति औडव-संपूर्ण है. इसे गाने का समय दिन का दूसरा पहर है. राग आसावरी का आरोह-अवरोह देखिए

आरोह- सा रे म प, ध सां अवरोह- सां, नी, ध, प, म प ध, म प ग, S रे सा पकड़- म प ध म प ग, रे सा इस राग में प और ग की संगति बार-बार की जाती है. एनसीईआरटी के इस वीडियो में आप इस राग की बारीकियों को और विस्तार से जान सकते हैं.

इस राग को शास्त्रीय कलाकारों ने खूब गाया बजाया है. आपको उस्ताद अमीर खां का गाया राग आसावरी सुनाते हैं. राग आसावरी उस्ताद अमीर खां के पसंदीदा रागों में से एक था. वो कोमल ऋषभ आसावरी भी गाया करते थे. एक और विश्वविख्यात शास्त्रीय गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया राग आसावरी भी सुनिए

कुछ साल पहले टाइम्स म्यूजिक ने बैजू बावरा को याद करते हुए पंडित जसराज की एक रिकॉर्डिंग रिलीज की थी. इस रिकॉर्डिंग में पंडित जसराज ने राग आसावरी गाया था. आप भी सुनिए इसे

अपने पाठकों के लिए हमने ये सीरीज करीब पांच महीने पहले शुरू की थी. अब तक हम आपको बीस से ज्यादा शास्त्रीय रागों की कहानियां सुना चुके हैं. इस कॉलम का मकसद है कि आपको रोचक तरीके से शास्त्रीय रागों के बारे में बताया जाए. आपको ये कॉलम कैसा लग रहा है, इस पर आप अपनी राय हमें hindifirstpost@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं. अगली बार एक और राग की कहानी के साथ हम हाजिर होंगे.

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