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आरडी बर्मन को याद करके किसने लिखा था- मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम'

रागदारी में राग अल्हैया बिलावल के बहाने गुलजार और आरडी बर्मन के दोस्ती की कहानी पढ़िए

Updated On: Mar 09, 2018 02:33 PM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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आरडी बर्मन को याद करके किसने लिखा था- मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम'

यूं तो हम इस कॉलम में किसी राग की किस्सागोई सुनाते हैं. आज राग की किस्सागोई एक अनोखी दोस्ती के नाम. यह दोस्ती है गुलजार साहब और पंचम दा की. दोनों ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक यादगार नगमों को दिया. ये दुर्भाग्य ही था कि पंचम साल 1994 में सिर्फ 55 साल की उम्र में अचानक दुनिया छोड़ कर चले गए. ये गुलजार की कलम का जादू ही था कि उन्होंने अपने दोस्त पंचम के लिए बाकयदा एक नज्म लिखी. जिसका संगीत गुलजार साहब के पसंदीदा संगीतकार विशाल भारद्वाज ने तैयार किया और आवाज दी भूपिंदर ने.

इस नज्म को पढ़िए, इस नज्म को भूपिंदर की आवाज में सुनिए. इससे आपको इन दोनों शख्सियतों की दोस्ती का अंदाजा होगा, उसके बाद बात करेंगे उस फिल्म की जो 1972 में आई. जिस फिल्म का निर्देशन गुलजार साहब ने किया. जिस फिल्म के की कहानी, गीत और डायलॉग्स भी गुलजार साहब ने लिखे और संगीत दिया उनके पंचम दा यानी आरडी बर्मन ने. पहले नज्म फिर फिल्म परिचय की कहानी.

याद है बारिशों का दिन, पंचम

याद है जब पहाड़ी के नीचे वादी में

धुंध से झांककर निकलती हुई

रेल की पटरियां गुजरती थीं

धुंध में ऐसे लग रहे थे हम

जैसे दो पौधे पास बैठे हों

हम बहुत देर तक वहां बैठे

उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे

जिसको आना था पिछली शब, लेकिन

उसकी आमद का वक्‍त टलता रहा

देर तक पटरियों पर बैठे हुए

रेल का इंतज़ार करते रहे

रेल आई ना उसका वक्‍त हुआ

और तुम, यूं ही दो कदम चलकर

धुंध पर पांव रखके चल भी दिए

मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम'.

वो किस्सा यूं है कि 1972 में गुलजार फिल्म बना रहे थे परिचय. जितेंद्र और जया भादुड़ी इस फिल्म में बतौर अभिनेता काम कर रहे थे. फिल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि प्राण को अपने बेटे के पांच बच्चों के लिए ट्यूशन पढ़ाने वाला चाहिए था. बच्चे शैतान थे और अपने दादा से उनकी नाराजगी थी. इन पांच बच्चों में सबसे बड़ी बहन का रोल जया भादुड़ी ने किया था. इन पांच बच्चों की टीम ऐसी थी कि ट्यूशन पढ़ाने वाला कोई इनके सामने टिकता नहीं था. कई टीचर पहले भाग चुके थे.

ऐसे में ये जिम्मेदारी जितेंद्र को मिलती है. वो बच्चों के साथ बिल्कुल दोस्ताना व्यवहार दिखाते हैं. उनकी तारीफ करते हैं. उनकी बदमाशियों को वो नजरअंदाज करते हैं. धीरे-धीरे बच्चों से उनकी दोस्ती हो जाती है. इन बच्चों के साथ जितेंद्र अक्सर घूमने फिरने और खेलने भी जाया करते हैं. फिल्म में इन बच्चों के पिता का रोल निभाने वाले अभिनेता संजीव कुमार को एक अच्छा संगीतकार दिखाया गया है. ये वो मोड़ है जहां एक बेहद खूबसूरत और अनोखा गाना गुलजार साहब ने रखा, जिसे उन्होंने ही लिखा भी था. पहले आपको वो गाना सुनाते हैं फिर गाने की कहानी.

सारे के सारे गामा को लेकर गाते चले

पापा नहीं है धानी सी दीदी, दीदी के साथ हैं सारे

सा से निकले रोज़ सवेरा दूर करे अंधियारा

रे से रेशमी किरणों ने दूर किया उजियारा

सूरज की रोशन किरणों पे सारे गाते चले

पापा नहीं है धानी सी दीदी, दीदी के साथ हैं सारे

सारे के सारे —

ग से गुन गुन ग ग ग, म से मध्यम मा मा मा

प से एक पुजारी

ग से गुन गुन करता है घूमे क्यारी क्यारी

मा से मीठे बोलों में पा से एक पुजारी

भंवरें के जैसे फूलो पे सारे गाते चले

पापा नहीं है धानी सी दीदी, दीदी के साथ है सारे

ध से धुप सुनहरी है, ये नींद नशीली लागे

सरगम हो गई पूरी अब क्या होगा आगे

सरगम के साथी सरगम की धुन पे गाते चले

इस गाने की खासियत को आप समझ ही गए होंगे. इस गाने में गुलजार साहब ने संगीत की सरगम के हर सुर से एक एक लाइन लिखी थी. इस गाने को कंपोज करना आसान काम नहीं था. आप सोच कर देखिए कि आरडी बर्मन किस दिमाग के साथ धुनें तैयार करते थे. उन्होंने इस गाने को बाकयदा शास्त्रीय राग अल्हैया बिलावल की जमीन पर तैयार किया.

ये गुलजार साहब के बोल और पंचम का संगीत ही था कि आज करीब पचास साल बाद भी ये गाना लोगों को याद है. गुलजार साहब के इस पक्ष को शायद कम ही लोग जानते हैं कि उन्होंने बच्चों के लिए कई यादगार गाने लिखे हैं. जिसमें से एक यादगार गाना ये भी है, जो हम आपको सिर्फ इसलिए दिखा रहे हैं कि आपका बीचा बचपन ताजा हो जाएगा.

दिलचस्प बात ये है कि इसी राग की जमीन पर साल 1972 में आई फिल्म बावर्ची का भी एक गाना कंपोज किया गया था. उस गाने को भी जया भादुड़ी पर ही फिल्माया गया था. उनके साथी कलाकार थे राजेश खन्ना और असरानी. असरानी गाने के दौरान तबला बजा रहे हैं. इन गाने को मन्ना डे और किशोर कुमार ने बड़ी खूबसूरती से गाया था.

राग अल्हैया बिलावल से जुडी एक दिलचस्प जानकारी ये भी है कि हमारे राष्ट्रगान जन-गण-मन का ये लोकप्रिय वर्जन भी राग अल्हैया बिलावल के आधार पर ही कंपोज किया गया था.

खैर चलिए अब आपको हमेशा की तरह राग के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. ये बिलावल थाट का राग है. राग अल्हैया बिलावल के आरोह में ‘म’ नहीं लगता है. अवरोह में सभी सात स्वर लगते हैं इसलिए इस राग की जाति षाढव संपूर्ण है. राग अल्हैया बिलावल का वादी स्वर ‘ध’ और संवादी स्वर ‘ग’ है. इस राग को गाने बजाने का समय दिन का पहला प्रहर माना गया है. आइए अब आपको इस राग का आरोह अवरोह और पकड़ बताते हैं. यहां ये बताना भी जरूरी है कि राग अल्हैया बिलावल और राग बिलावल दो अलग अलग राग हैं.

आरोह- सा, ग रे ग प, ध नी सां अवरोह- सां नी ध प, ध नी ध प, म ग म रे, सा पकड़- ग रे S ग प, म ग म रे, ग प ध नी ध प

हमेशा की तरह आपको रागों की कहानी के अंत में कुछ विश्वविख्यात कलाकारों के वीडियो दिखाते हैं जो राग अल्हैया बिलावल की प्रस्तुति दे रहे हैं. आपको संगीत सम्राट उस्ताद अलाउद्दीन खान साहब का बजाया राग अल्हैया बिलावल सुना रहे हैं और आखिरी क्लिप में आगरा घराने के मशहूर कलाकार उस्ताद लताफत हुसैन खान का गाया राग अल्हैया बिलावल सुनिए

अगले हफ्ते एक और राग की कहानी के साथ मिलेंगे.

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