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ईद का मुबारक दिन है, गले आज तो मिल लो साहब!

सभी त्योहारों की तरह ईद में भी ‘इंतजार’ की कसक कुछ ज्यादा ही गहरी हो जाती है

Nazim Naqvi Updated On: Jun 25, 2017 09:54 PM IST

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ईद का मुबारक दिन है, गले आज तो मिल लो साहब!

हमारे भारतीय त्योहार और साहित्य का चोली-दामन का साथ है. कोई ऐसा त्योहार नहीं जिस पर खुलकर और खिलकर न लिखा गया हो. नजीर अकबराबादी ने तो करीब-करीब हर त्योहार का लयबद्ध डॉक्यूमेंटेशन किया है. देखिए किस तरह वो शब्दों से होली की तस्वीर खींच देते हैं:

'मुंह लाल, गुलाबी आंखें हो और हाथों में पिचकारी हो उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की'

कोई भी त्योहार हो, एक रूप और कई रंग लेकर आता है

चलिए साहब, आज तो ईद है, इसलिए ईद की मुबारकबाद के साथ हमारे अदब साहित्य में ईद की कैसी-कैसी तस्वीरें दर्ज हैं, उनका लुत्फ उठाते हैं. दरअसल कोई भी त्योहार हो, एक रूप और कई रंग लेकर आता है. किसी के लिए खुशी, किसी के लिए इंतजार, कहीं पायलों की छम-छम तो कहीं आंख पुरनम.

ईद में सबसे पहली खुशी तो होती है ईद के चांद की, महीने भर 16-17 घंटों के सख्त रोजों के बाद हर आंख आसमान पर होती है, आपको चांद दिखाई दिया? ये भी किस्मत की बात मानी जाती है क्योंकि इस महीने का चांद पहले दिन बस कुछ मिनटों के लिए ही नजर आता है.

ईद-उल-अजहा

ईद के त्योहार का सबसे ज्यादा इंतजार बच्चों को होता है

शायर ‘शुजा खावर’ ने ईद के बहाने, चांद, महबूब और रमजान का महीना, इन तीनों बातों को किस खूबसूरती के साथ दो पक्तियों में पिरो दिया है:

आप इधर आए, उधर दीन और ईमान गए ईद का चांद नजर आया तो रमजान गए

ईद का चांद निकलते ही माहौल में एकदम से एक रौनक आ जाती है, जैसे किसी इंतजार करते प्लेटफार्म पर ट्रेन की पहली झलक. चांद-रात के बाजार, मेंहदी, नए कपड़े, हंसी-ठहाके, इन सबके बीच किसी आंख की मायूसी भी इसी ईद का हिस्सा होती है. परवीन शाकिर इस मायूसी को इस तरह बयां करती हैं:

गए बरस की ईद का दिन क्या अच्छा था चांद को देख के उसका चेहरा देखा था

खेतों और खलिहानों की खुशबुओं वाले शायर ‘बेकल उत्साही’ के यहां भी महबूब के बिना चांद देखने की बेकली, दोहे की शक्ल में फूटती है:

तुम बिन चांद न देख सका, टूट गयी उम्मीद बिन दर्पण बिन नैन के, कैसे मनाएं ईद

ईद के दिन को विषय बनाकर अनुभूति का पूरा संसार रचा गया 

उर्दू अदब में ढेरों ऐसे शेर हैं जिनमें ईद के चांद को या ईद के दिन को विषय बनाकर अनुभूति का एक पूरा संसार रचा गया है. आइये इस दुनिया कि सैर करते हैं और शुरुआत करते हैं उस खालीपन से जिसे जाफर साहनी ने शिद्दत के साथ महसूस किया है:

ईद का दिन तो है मगर ‘जाफ़र’ मैं अकेला तो हंस नहीं सकता

सभी त्योहारों की तरह ईद में भी ‘इंतजार’ की कसक कुछ ज्यादा ही गहरी हो जाती है. गली, मुहल्लों, छतों, चौबारों में दौड़ती-फिरती खुशियों के बीच कुछ खिड़कियां, कुछ दरवाजे, मुन्तजिर रहते हैं. इस एहसाह की तस्वीर उतारते कुछ शेर मुलाहिजा कीजिए:

• खुद तो आया नहीं और ईद चली आई है ईद के रोज मुझे यूं न सताए कोई

• ईद आई तुम न आए क्या मजा है ईद का ईद ही तो नाम है एक दूसरे की दीद का

• बा-रोजे ईद मयस्सर जो तेरी दीद न हो तो मेरी ईद क्या, अच्छा है ऐसी ईद न हो नजीर अकबराबादी भी इसी इंतजार में तड़पते दिखाई देते हैं:

• यूं अपने लब से निकले है अब बार-बार आह करता है जिस तरह कि दिले-बेकरार आह हम ईद के भी दिन रहे उम्मीदवार आह

इंतेजार में तो फिर भी एक उम्मीद छुपी होती है जो बेकरार तो करती है मगर हताशा में नहीं बदलती, लेकिन उदासी के पास तो उदास होने के अलावा और कुछ भी नहीं होता, जफर इकबाल इसी उदासी के शिकार हैं, लिखते हैं:

तुझको मेरी न मुझे तेरी खबर जाएगी ईद अबकी भी दबे पांव गुजर जाएगी

त्योहार और गरीबी बहुत अहम विषय है

त्योहार और गरीबी, ये भी एक बहुत अहम विषय है जो साहित्यकारों/अदीबों का बड़ा प्रिय रहा है. प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ में हमीद, चिमटा खरीदकर चिमटे को नहीं, जरुरत को अपना खिलौना बना लेता है. सामाजिक विषमताओं पर शायरों ने भी अपनी कलम चलाई है:

ईद आती है अमीरों के घरों में बच्चों हम गरीबों को भला ईद से लेना क्या है

ईद त्योहार का सबसे दिलकश रंग है ‘गले-मिलना’ यूं तो गले मिलना एक रोजमर्रा की तहजीब है लेकिन अदब में इसे जिस शरारत के साथ पेश किया गया है, उसका अपना अलग ही मजा है. इस एहसास से जुड़ा हुआ ‘कमर बदायूनी’ का एक शेर तो इतना मशहूर हुआ कि ईद कि सीमाएं तोड़कर सदाबहार शेर बन गया:

ईद का दिन है गले आज तो मिल ले जालिम रस्मे-दुनिया भी, मौका भी है, दस्तूर भी है

कमर बदायुनी से बहुत पहले ‘मुसहफी’ गुलाम हमदानी ने इसी एहसास को कुछ यूं बयान किया था:

वादों ही पे हर रोज मेरी जान न टालो है ईद का दिन अब तो गले हमको लगा लो

रमजान का महीना इमरजेंसी से कम नहीं

आइए बस्ती से जरा हट के, मयखानों की ईद का लुत्फ उठाते हैं. चूंकि रमजान परहेजगारी का महीना है इसलिए मायखारों के लिए तो ये महीना किसी इमरजेंसी से कम नहीं. वजीर अली ‘सबा’ लखनवी, की बेसब्री का अंदाजा लगाइए:

• माय पी के ईद कीजिये, गुजरा महे-सियाम (रमजान का महीना) तस्बीह रखिये, सागर-ओ-मीना उठाइये या फिर मुनीर शिकोहबादी का ये शेर:

• है ईद लाओ माय-ए-लाला-फाम उठ उठ कर गले लगाते हैं शीशों को जाम उठ उठ कर या फिर ‘बेखुद देहलवी’ का ये शेर:

• दिल मिले, हाथ मिले, उठके निगाहें भी मिलीं वस्ल भी ईद है मिलने को बढ़ा एक से एक हमारे देश में ईद और होली, दो ऐसे त्योहार हैं जो मौका देते हैं दुश्मनी खत्म करने का, गले मिलने का, सांप्रदायिक सौहार्द का, नेक इरादों का, अमन और शांति का, इस खासियत का बखान भी हमारे अदीबों ने बढ़-चढ़ कर किया है. ‘प्रेम वाबर्टनी’ लिखते हैं:

• आज है अहले-मोहब्बत का मुकद्दस त्योहार रंग क्यूं लाए न मासूम दुआओं का असर ईद का दिन है चलो आज गले मिल जाएं तुमहो मस्जिद की अजां हम हैं शिवाले का गजर

Eid Shopping

ईद के लिए खरीदारी करती हुई मुस्लिम महिलाएं (फोटो: पीटीआई)

इसी के साथ वर्तमान हालात पर भी एक नजर डालिए, दो शेर समाज के दो रंगों की भरपूर तस्वीर खींचते नजर आते हैं:

• मिलके होती थी कभी ईद भी दीवाली भी अब ये हालत है कि डर-डर के गले मिलते हैं

• जिस घर को डंस लिया है तास्सुब के नाग ने उस घर में अबकी ईद की खुशबू न आएगी और इसी बीच सच्चाई का वो पैगाम जो सूफी परंपरा ने हमें दिया और लाख आंधियां चलें हमारी विरासत का ये दिया हमेशा जलता रहेगा. आप सबको एक बार फिर ईद की ढेरों मुबारकबाद.

• किसी का बांट लें गम और किसी के काम आ जाएं हमारे वास्ते वो रोज, रोज-ए-ईद होता है

• दी किसने दरे-दिल पे सदा ईद मुबारक ऐ जाने हया, जाने वफा ईद मुबारक

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