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मुझको शराब पीने दे इस घर में बैठ कर...

जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर या वो जगह बता दे जहाँ पर खुदा न हो

Updated On: Nov 29, 2016 07:48 AM IST

Nazim Naqvi

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मुझको शराब पीने दे इस घर में बैठ कर...

27 नवंबर को हरिवंशराय बच्चन जी का 108वां जन्मदिन उनके प्रशंसकों ने मनाया. लोगों को उनकी कालजयी कृति ‘मधुशाला’ याद आई.

जाहिर है कि उनके चाहनेवाले बेगूसराय, पूर्णिया और पटना में भी होंगे. लेकिन बिहार का रिश्ता अब मधुशाला से टूट चुका है. नोटबंदी से बहुत पहले बिहार में नीतीश बाबू ‘नशाबंदी’ का एलान कर चुके हैं.

और सिर्फ एलान ही नहीं कर चुके हैं बल्कि इसका विरोध करने वालों को अपना जानी-दुश्मन समझने जैसी सीमा तक पहुंच चुके हैं.

नीतीश कुमार शराबबंदी की हिमायत में खुलकर बोलते हैं और कई अनौपचारिक मुलाकातों में अपना दिल भी खोलते हैं- ‘मैं आजकल, ये दो-पैग पीने वालों से, जिन्हें बिना दो पैग पिए नींद ही नहीं आती, इनसे बहुत परेशान हूं, लेकिन मैंने साफ-साफ कह दिया है की अगर बिहार में रहना है तो ये आदत छोड़नी पड़ेगी, नहीं तो बिहार छोड़ना पड़ेगा.’

माय वे ऑर हाईवे

दरअसल ‘शराब’ जितना लोगों के लिए दिक्कत का सामान है उससे कहीं ज्यादा खुद से परेशान है.

एक तरफ वो ‘सामाजिक बुराई’ जैसे शब्द से कलंकित है तो दूसरी तरफ अपने कद्रदानों से ग्रसित है.

शराब को खुद समझ में नहीं आ रहा है कि वो स्वयं को किस रूप में देखे. कोई भी, यह पूरे यकीन से कहा जा सकता है कि नीतीश बाबू उसके पहले चेहरे से दुखी हैं.

वह चेहरा जो गरीब की जान का दुश्मन बना हुआ है, वह स्थिति जो इंसान को नालियों तक ले जाती है, घर उजाड़ती है, भविष्य को अंधे-कुंए में बदल डालती है. इस वजह से नशाबंदी के विरोधी भी मुख्यमंत्री का विरोध नहीं कर पा रहे हैं.

लेकिन मैं सोच रहा हूं कि बिहार के गालिबों, बच्चनों, उमर खय्यामों पर जो कयामत टूट पड़ी है उसका क्या होगा. यह अजीब नहीं कि ग़ालिब के इस शेर –

जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर या वो जगह बता दे जहाँ पर खुदा न हो

की पैरोडी कोई यूँ बना रहा हो कि– हमको शराब पीने दे इस घर (बिहार) में बैठकर / या वो जगह बता दे जहाँ कोई घर न हो.

बिडम्बना देखिए कि इस्लाम धर्म में, जहाँ शराब हराम है, वहां भी जन्नत की कल्पना में तमाम स्वर्गीय सुविधाओं में शराब भी शामिल है. इसे यहाँ इज्जत से ‘शराब-ए-तहूरा’ कहकर पुकारा जाता है जिसका अर्थ है ‘पवित्र शराब’.

मेरे एक मित्र तुरंत कन्फ्यूज हो गए (कुछ लोग आदतन कन्फ्यूज हो जाते हैं) बोले- ‘यार शराब का संधि-विच्छेद है शर+आब यानी वह पानी जिससे शर (झगड़ा) पैदा हो?’

मैंने सहमति में सिर हिलाया तो खुद ही ‘शराब-ए-तहूरा’ के अर्थ को आसान करने लगे- ‘हूं, मतलब झगड़े पैदा करने वाला पवित्र पानी.’

मैं इस नए अर्थ से घबरा गया और लगभग डपटते हुए उसके भोले-भाले दिमाग से इस अर्थ को निकालने की कोशिश करने लगा कि ‘ऐसी तार्किक सॉरी अतार्किक बातें दिमाग में मत लाया करो वर्ना कहीं पिट जाओगे.’ जिद्दी दोस्त मुझसे भिड़ गया- ‘कमाल है, अरे बच्चन जी इसी ‘शराब-ए-तहूरा’ को तो मधुशाला कह रहे हैं?’

मैंने कहा मियां, बच्चन और ग़ालिब किस्मत वाले थे जो इस दुनिया से पहले ही चले गए, इस जमाने में होते तो वह भी पीट दिए जाते.

नीतीश कुमार

यह है शराब का दूसरा चेहरा जिस से नीतीश बाबू जानकार भी अनजान है. यह चेहरा उमर खय्याम की रुबाइयों से, बच्चन की चौपाइयों से और ग़ालिब के लफ्जों से झलकता है. देखिए कैसे उमर खय्याम की तर्ज पर बच्चन जी ‘मधुशाला’ के सहारे कायनात के राज खोलते हैं-

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला, 'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला, अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूं - राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला

मैं सोच रहा हूं किसी दिन पटना की किसी सड़क पर ग़ालिब नीतीश कुमार से टकरा गए तो फौरन अदब से झुक जायेंगे, अपने हाथों की अंजुली बनाकर अपने होठों से लगायेंगे और बोल पड़ेंगे-

पिला दे ओक से साकी जो हमसे नफरत है पियाला गर नहीं देता न दे शराब तो दे

नीतीश यह सुनते ही गुस्से से लाल-पीले हो जाएंगे, फौरन पीछे खड़े मातहतों को फरमान जारी करेंगे- ‘ये कौन बदतमीज है, फौरन निकालो इसे बिहार से.’ ग़ालिब अपनी कामयाबी पर मुस्कुराएंगे और तपाक से बोल पड़ेंगे- ‘हुजूर दिल्ली भिजवा दीजिये मुझे, पुराने नोट अब चलते नहीं, किराया है नहीं, लेकिन सुनते हैं कि वहां ‘आप’ की भी नहीं चलती, इसलिए उम्मीद है मुझे मिल जाएगी.’

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