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संस्कृति और त्योहार के नाम पर जानवरों के साथ हिंसा बंद हो

देश में धर्म और त्योहारों के नाम पर लाखों पशुओं की बलि दी जाती है

Maneka Gandhi Updated On: Jan 17, 2017 06:46 PM IST

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संस्कृति और त्योहार के नाम पर जानवरों के साथ हिंसा बंद हो

कुछ महीने पहले मैंने एक फिल्म देखी. इस फिल्म में दिखाया गया था कि एक प्यार करने वाले, कानून के रास्ते पर चलने वाले श्वेत समुदाय को कानूनन साल में एक दिन के लिए किसी भी अश्वेत को गोली मारने की इजाजत दे दी गई.

यह फिल्म एक ऐसे परिवार के बारे में थी जो कि एक अश्वेत को बचाता है. और किस तरह से इस परिवार को ढूंढकर उनके दोस्त पड़ोसियों द्वारा मार गिराया जाता है.

बकरीद के नाम पर लाखों बेजुबानों का कत्ल 

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भारत में इस तरह के दो दिन साल में आते हैं. एक बकरीद है. इस दिन मुस्लिम समुदाय को बकरे-बकरियों और किसी भी दूसरे जानवर को मारने का हक मिल जाता है. सरकार और पुलिस मूकदर्शक बने इसे देखते रहते हैं. मुस्लिम लाखों बकरे-बकरियों की गर्दन काटकर यह त्योहार मनाते हैं. इसके अलावा मुस्लिम गायों को वेस्ट बंगाल और केरल में, ऊंटों और भैंसों को हैदराबाद, केरल, तमिलनाडु, दिल्ली और मेरठ में अवैध रूप से काटते हैं.

बकरों का वध किए जाने वाले स्थानों को लेकर सख्त नियम हैं. लेकिन, इनकी कोई परवाह नहीं करता.

हर मुस्लिम आबादी वाले इलाके में सीवर खून से भर जाते हैं. ये आगे जाकर नदियों में मिलते हैं. हर शहर के कुछ इलाकों में हालात ऐसे हो जाते हैं कि जहां सड़ते हुए खून और मांस की दुर्गंध से हालात रहने और निकलने लायक नहीं होते हैं.

हिंदू-मुस्लिम में बदल जाती है बहस

हिंदू लगातार जानवरों की इस क्रूर और अनावश्यक हत्या का विरोध करते हैं. इस प्रथा का इस्लाम से कोई वास्तविक जुड़ाव नहीं है.

हर साल इस पर बहस होती है और टेलीविजन एंकर उन्हीं लोगों को इस प्रथा के फायदे और नुकसान पर चर्चा करने के लिए बुलाते हैं. हर बार यह बहस हिंदू-मुस्लिम मसले में तब्दील हो जाती है.

मकर संक्रांति का पर्व पशुओं के साथ हिंसा का दिन बना

लेकिन, हिंदुओं का बड़े पैमाने पर कत्ल का अपना दिन है. यह दिन खुशियों का, फसल की कटाई के जश्न का और वसंत के आगमन का स्वागत करने का होता है. पूरी दुनिया में यह दिन नृत्य और गीत के साथ मनाया जाता है.

पूरे भारत में इस दिन को हिंसा और कत्ल के साथ मनाया जाता है. 14 जनवरी को पड़ने वाली मकर संक्रांति, हिंदुओं का बकरीद है.

कर्नाटक में जारी कुप्रथा

कर्नाटक में एनिमल एक्टिविस्ट्स के इस पर रोक लगाने तक, यह एक ऐसा त्योहार था जिसमें लोमड़ियों का शिकार किया जाता था, इन्हें पकड़ा जाता था, पीटा जाता था और जिंदा जला दिया जाता था.

अब इसकी जगह कंबाला ने ले ली है. इसमें गायों को पानी की तेज धारा में दौड़ाया जाता है. लगातार पिटाई और पानी के तेज बहाव में दौड़ने से कई गायों के पैर टूट जाते हैं जिससे वे मर जाती हैं.

असम में बुलबुलों पर अत्याचार

असम में हजारों बुलबुलों को प्रोफेशनल बहेलिये हफ्तों पहले से पकड़ना शुरू कर देते हैं. इन्हें पिंजरों में कैद रखा जाता है और गांव वालों को बेच दिया जाता है. गांव वाले इनकी लड़ाई कराते हैं. इसमें ये बेहद नाजुक छोटी चिड़िया मर जाती हैं. इन लड़ाइयों के लिए बाकायदा जगहें निर्धारित हैं. हालांकि, इस पर भी कोर्ट ने रोक लगा दी है.

आंध्र प्रदेश में मुर्गों की लड़ाई

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आंध्र प्रदेश में लाखों मुर्गों को अंधेरे पिंजरों में रखा जाता है और इन्हें तब तक लंबी लकड़ियों से कुरेदा जाता है जब तक कि ये हिंसक नहीं हो जाते. इसके बाद इनके पंजों में धारदार रेजर बांध दिए जाते हैं. इसके बाद इन मुर्गों की आपस में लड़ाई कराई जाती है. ये धारदार रेजरों से एक-दूसरे के शरीरों को काटते हैं. अंत में एक मुर्गा अपनी चोटों से तत्काल मर जाता है. जीतने वाला मुर्गा भी कुछ देर में मर जाता है. तालियां बजाती भीड़ को इनका दर्द महसूस नहीं होता.

लड़ाई के इन्हीं मैदानों में बिकने वाली शराब पीकर लोग इन्हीं मुर्गों को खा जाते हैं.

इस क्रूर रवायत पर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल में ही बैन लगाया है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी पुष्टि की है. चूंकि कई राजनेता इन लड़ाइयों में शामिल रहते हैं, ऐसे में यह देखना होगा कि इस साल क्या होता है?

गोवा में बैलों की लड़ाई

गोवा में बैलों की लड़ाइयां आयोजित की जाती हैं. दो बैलों को शराब पिलाई जाती है और इसके बाद इन्हें लड़ाया जाता है. ये बैल एक-दूसरे पर सींगों से हमला करते हैं. नशे में धुत्त भीड़ शोर मचाती है और इन जानवरों पर चीजें फेंकती है ताकि ये और उग्र होकर आपस में लड़ें.

इस पर 20 साल से भी पहले अदालतों द्वारा रोक लगाई जा चुकी है. लेकिन, हर दफा कुछ राजनेता इसे चोरीछिपे उत्साहित करते हैं. और हर राजनीतिक पार्टी चुनावों के दौरान अपने गोवा घोषणापत्र में इसका जिक्र करती है, लेकिन, मोटे तौर पर यह प्रथा बंद हो चुकी है.

मध्य प्रदेश में भी जारी है हिंसा का यह खेल

मध्य प्रदेश में हालांकि, यह अवैध फाइट जारी है और अखबार इस इवेंट की तस्वीरें छापते हैं. ये आयोजन और ज्यादा सुर्खियों में तब आ जाते हैं जब दुर्घटनावश इनमें कोई आदमी मारा जाता है.

महाराष्ट्र की क्रूर प्रथा

महाराष्ट्र में ग्रामीण दौड़ें होती हैं. इनमें बैलों और भैसों को एक-दूसरे से बांधकर दौड़ाया जाता है. कई बार एक गाय और एक घोड़े को बांध दिया जाता है. इन्हें शराब पिलाई जाती है. इन्हें इनकी पूंछ पकड़कर दौड़ाया जाता है. चंद मिनटों में ही इनकी पूंछ टूट जाती है. इन्हें बार-बार दौड़ाया जाता है. इनमें से कई जानवरों की दर्द से मौत हो जाती है. इस पर भी बैन लगाया जा चुका है, लेकिन कुछ नेता कानून का उल्लंघन करते हैं और इस वहशी खेल को चलाते हैं. यह खेल पुणे के आसपास के जिलों में मुख्यतौर पर होता है.

गुजरात में पतंगबाजी में पक्षियों की हत्या

गुजरात में पतंग उड़ाने का फेस्टिवल मकर संक्रांति के शुरू होने के बाद एक हफ्ते तक चलता है. नायलॉन के धागे पर चिपकाए गए कांच से बने मांझे से तीन लाख से ज्यादा पक्षी इस दौरान मर जाते हैं.

मेरा मानना है कि पतंग उड़ाने से मिलने वाली खुशी उस खुशी से काफी कम होती है जो उन्हें इन मांझों से कटकर आसमान से गिरते परिंदों को देखकर होती है. कोर्ट ने चाइनीज मांझे पर रोक लगा दी है. लेकिन इसका इस्तेमाल अभी भी जारी है.

तमिल संस्कृति के नाम पर जलीकट्टू का समर्थन

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इसके बाद जलीकट्टू का नंबर आता है. बैलों को हफ्तों तक अंधेरे कमरों में बंद रखा जाता है, इन्हें शराब पिलाई जाती है और पीटा जाता है. वहशियत से भरे हुए लोग इनकी खाल काटते हैं और इन पर बैठने की कोशिश करते हैं. नशे में धुत्त लड़के इन निरपराध बैलों के सींग तोड़ने की कोशिश करते हैं. बैल मरते हैं, कुछ लोग भी मरते हैं.

कई नेता तमिल संस्कृति के नाम पर इस कुप्रथा को बचाने में कूद पड़े हैं. इन्हें लगता है कि ये इस तरह से अपने लिए एक राजनीतिक जगह बना रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल इस पर रोक लगा दी थी और यह रोक इस साल भी जारी है. स्थानीय नेता जलीकट्टी को रोकने वाले सभी कानूनों को रद्द करने के लिए सरकार पर दवाब बना रहे हैं.

एक सभ्य समाज के तौर पर पूरे देश की नजरें इस पर हैं. इसके बावजूद कई तमिल एक्टर्स इसका सपोर्ट कर रहे हैं. इन्हें अपनी पॉपुलैरिटी की फिक्र ज्यादा है. इनको लगता है कि बैलों पर होने वाले अत्याचार को अगर रोका गया तो तमिल संस्कृति नष्ट हो जाएगी.

बकरीद और मकर संक्रांति के बीच केवल एक फर्क यह है कि मुस्लिम जानवरों को मारते वक्त दांव नहीं लगाते. हिंदू लगाते हैं. हिंदू शराब पीते हैं और जुआ लगाते हैं कि कौन सा जानवर पहले मरेगा. ये लोग सीधे तौर पर इसे हिंदू संस्कृति कहते हैं. जबकि इनमें से कुछ हिंसात्मक खेल कुछ दशकों पहले ही शुरू हुए हैं.

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