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कुंभ मेला तो हमेशा ही दुनिया की आंखें चौंधियाता रहा है

देश भर में आस्था का सबसे विशाल पर्व कुंभ मेला यूं तो दुनिया में पहले से ही खूब मशहूर है मगर अब यूनेस्को द्वारा इसे विश्व विरासत मान लिए जाने से इसके प्रति विदेशों में उत्सुकता और बढ़ेगी

Anant Mittal Updated On: Dec 09, 2017 08:48 AM IST

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कुंभ मेला तो हमेशा ही दुनिया की आंखें चौंधियाता रहा है

देश भर में आस्था का सबसे विशाल पर्व कुंभ मेला यूं तो दुनिया में पहले से ही खूब मशहूर है मगर अब यूनेस्को द्वारा इसे विश्व विरासत मान लिए जाने से इसके प्रति विदेशों में उत्सुकता और बढ़ेगी. यूनेस्को यानी संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन ने दुनिया में इस सबसे विराट आस्था पर्व को मान्यता देकर दरअसल अपनी साख ही बढ़ाई है.

इतना जरूर है कि इसके बाद विदेशी सैलसनियों की तादाद कुंभ के मेलों में बढ़ सकती है. बहरहाल सनातन मानी जाने वाली भारतीय संस्कृति के और उसके पालक करोड़ों देशवासियों के लिए कुंभ को विश्व विरासत मानना बड़ी खुशखबरी है.

ओलंपिक खेलों को छोड़ दें तो किसी भी अन्य मुल्क में चौबीस घंटे में एक ही नदी में, सीमित क्षेत्र में एक करोड़ से अधिक लोगों के डुबकी लगाने का रिकार्ड कहीं उपलब्ध नहीं है. गौरतलब है कि 2010 में हरिद्वार के कुंभ मेले में और उसके बाद 2013 में इलाहाबाद के कुंभ मेले में भी मुख्य स्नान के दिन 24 घंटे में एक से डेढ़ करोड़ लोगों द्वारा गंगा और संगम किनारे डुबकी लगाने का रिकार्ड उपलब्ध है.

रही बात ओलंपिक की तो वह सौ से ज्यादा देशों के खिलाड़ियों, खेल प्रशासकों और दर्शकों का सामूहिक प्रदर्शन होता है. उसके मुकाबले कुंभ का आयोजन और प्रबंधन तो संबंधित राज्य की सरकार, साधुओं के अखाड़े और सिविल डिफेंस मिलकर ही करते हैं. इस लिहाज से हरिद्वार के कुंभ मेला आयोजन को पूरी दुनिया में मिसाल माना जा सकता है, क्योंकि उत्तराखंड की तो कुल आबादी ही महज एक करोड़, दस लाख के लगभग है.

उसके बावजूद चौबीस घंटे में एक करोड़ से अधिक लोगों की मेजबानी अपने आप में रिकॉर्ड ही है. हरिद्वार में तो इलाहाबाद के मुकाबले कुंभ मेला आयोजन स्थल का दायरा भी बहुत छोटा है. साथ ही हरिद्वार में नदी भी सिर्फ गंगा ही है, जबकि इलाहाबाद में महात्म्य गंगा-यमुना और विलुप्त सरस्वती नदी के संगम स्थल पर स्नान का है. जिनके कारण स्नान के घाट भी अधिक हैं और दूर तक फैले हुए हैं.

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इलाहाबाद संगम तट की एक तस्वीर. (रायटर इमेज)

इनके अलावा महाकाल की नगरी उज्जैन और रामचरित मानस की पंचवटी यानी नासिक में भी कुंभ मेला होता है. उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर और नासिक में गोदावरी के तट पर कुंभ के स्नान का महात्म्य है. कुंभ के सभी मेले ग्रह-नक्षत्रों की गणना के आधार पर पूरे बारह साल के अंतराल पर होते हैं. भीड़ उज्जैन और नासिक में भी कुंभ के दौरान खूब उमड़ती है मगर हरिद्वार और इलाहाबाद अपवाद हैं. इसके अलावा उज्जैन और नासिक में होने वाले कुंभ मेलों को पुकारा भी सिंहस्थ पर्व जाता है.

कुंभ की सबसे बड़ी विशेषता है आस्था. इस मेले में स्नान करने के लिए इतनी बड़ी तादाद में लोगों को दूरदराज से तमाम कठिनाइयों के बावजूद उनकी आस्था ही खींच कर लाती है. चौबीस घंटे में करोड़-डेढ़ करोड़ लोगों का कुंभ पर्व पर सिर्फ स्नान करना तो उल्लेखनीय है ही. साथ ही इतनी भारी तादाद में लोगों का आना-जाना, खाना-पीना, कुछ देर ठहरना और सुरक्षित लौट जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है. क्योंकि इस मानव सैलाब का दबाव तो समुद्र के ज्वार-भाटे से भी अधिक विकराल होता है. उसे संभालना मानव के वश में तो कतई नहीं है.

फिर भी स्नानार्थियों की भीड़ को काबू करने के लिए मेला स्थल को सेक्टरों में बांट कर बल्ली-रस्से लगा कर, पुलिस बल को भारी संख्या में तैनात करके आयोजक राज्य सरकार अपने स्तर पर प्रयास जरूर करती हैं. लेकिन उस हहराते जन सैलाब के चौबीस घंटों में बिना किसी हादसे के खत्म हो जाने के लिए आस्था प्रेरित लोगों का आत्मसंयम ही सबसे अधिक काम आता है. वरना इतनी विराट जनराशि के सामने सारे इंतजाम फेल होते क्या देर लगती है!

भारत में करीब 850 साल से कुंभ के आयोजन के साक्ष्य उपलब्ध हैं. इसमें दूर-दूर से साधु, संत और तीर्थयात्री नदी में डुबकी लगाने और अमृत काल में अपने पाप धुल जाने का आत्मतोष हासिल करने आते हैं. अलबत्ता अब कुछ देसी-विदेशी सैलानी भी आस्था के इस महापर्व का जायजा लेने आते हैं और हहराती जनराशि के साथ ही लोगों का धैर्य एवं आत्मसंयम देखकर आंखें फाड़े लौटते हैं. ऐसे अनेक सैलानियों ने कुंभ मेलों की कवरेज के दौरान इस लेखक को बताया है कि उनके लिए यह अनुभव अकल्पनीय ही नहीं अविस्मरणीय भी है.

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पौराणिक कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत आदिकाल में समुद्र मंथन से ही हुई. इनके मुताबिक मंथन में निकले अमृत से भरे कलश के लिए जब देवों ओर असुरों के बीच छीना-झपटी हुई तो उसकी कुछ बूंदें हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन और नासिक पर ही छलकीं. इसीलिए इन चार स्थानों पर उसी घड़ी में कुंभ मेला लगता है. कुंभ का मतलब दरअसल घड़ा, मटका अथवा कलश ही है.

कुछ अन्य दस्तावेजों के अनुसार कुंभ मेला ईसा पूर्व 525 वीं सदी में ही लगने लगा था. गुप्त काल में भी कुंभ के व्यवस्थित होने की धारणा है मगर तथ्य सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन 617-647 ई. के समय से उपलब्ध हैं. बाद में जगद्गुरु शंकराचार्य तथा उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य द्वारा दशनामी संन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था का भी उल्लेख मिलता है.

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इसके आयोजन की तिथियां तय करने में सूर्य, चंद्रमा, शनि और गुरू नामक ग्रहों की कुछ निश्चित राशियों में अवस्था का बड़ा योगदान है. इसलिए इन्हीं ग्रहों की विशेष स्थिति में कुंभ का आयोजन होता है. कुल मिलाकर आदि शंकराचार्य अथवा उनसे भी पहले जिन धारणाओं, परिस्थितियों अथवा महापुरुषों द्वारा कुंभ स्नान का मेला भरने की परंपरा शुरू की गई उन्होंने जीवन की नश्वरता का बहुत बारीकी से एहसास कर लिया था.

शायद इसीलिए जीवन की क्षणभंगुरता के उस चिर एहसास को आम जनता तक पहुंचाने के लिए कुंभ स्नान पर्वों पर मेले का आयोजन शुरू किया गया. क्योंकि कुंभ स्नान के मुख्य पर्व के चौबीस घंटों में हरेक पल नियत जगह पर लाखों की तादाद में स्नानार्थी मौजूद रहते हैं मगर उनके बीच हरेक व्यक्ति अकेला ही होता है. उस जनसैलाब में शामिल हरेक व्यक्ति को यह एहसास बखूबी हो जाता है कि उसकी हस्ती किसी तिनके से ज्यादा नहीं है. इस परिस्थिति पर फिल्मी गीत की यह लाइन एकदम सटीक बैठती है:' है भीड़ इतनी, पर दिल अकेला.'

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