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जयपुर लिट फेस्ट: संघ की मौजूदगी नया अनुभव

इस बार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दो वरिष्ठ पदाधिकारी अपनी वैचारिकी के साथ उत्सव से रूबरू होंगे.

Narayan Bareth Updated On: Jan 19, 2017 05:07 PM IST

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जयपुर लिट फेस्ट: संघ की मौजूदगी नया अनुभव

साहित्य का मंच सजा कर देश दुनिया में नाम कमा चुके जयपुर साहित्य उत्सव (जेएलएफ) में गुरुवार से पांच दिन तक रोज अदब की महफिल जुड़ेगी और फिजा शब्दो के संसार से रूबरू होगी.

इस समागम में विभिन्न भाषाओं के लेखक साहित्यकार होंगे तो कला भी साहित्य के शामियाने की चर्चा में शामिल होगी. इस बार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दो वरिष्ठ पदाधिकारी अपनी वैचारिकी के साथ उत्सव से रूबरू होंगे. यह उत्सव के लिए नया अनुभव होगा.

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इन पांच दिनों में साहित्य के साथ सियासत, अर्थशास्त्र, संस्कृति, भाषा, अनुवाद, सिनेमा, कला और हर उस क्षेत्र पर बात होगी जो जीवन को प्रभावित करते है. उत्सव की मेजबानी के लिए जयपुर का डेढ़ सौ साल पुराना 'डिग्गी पैलेस' सज संवर कर तैयार है. डिग्गी  पैलेस खुद अपनी वास्तु शैली से शिल्प की कविता कहता सा नजर आता है.

जयपुर साहित्य उत्सव में न केवल पूर्व पश्चिम के साहित्य का समागम है बल्कि दक्षिण एशिया के देशों को जोड़ने का भी काम करता है. यह पिछले कई सालों से अदब के जरिये हिन्द ओ पाक के मिलन का मंच बनकर भी उभरा है.

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हालांकि नई दिल्ली और इस्लामाबाद  के बनते बिगड़ते रिश्तों का अक्स भी साहित्य समागम में देखा जा सकता है. लेकिन सरहदों की सियासत से दूर दोनों देशों के साहित्यकार इसे अवाम से अवाम के बीच मेल मिलाप का बड़ा जरिया मान कर मिलते रहे है.

बढ़ता गया कारवां

कोई दस साल पहले वर्ष 2006 में जब पहली बार 'डिग्गी पैलेस ' में जयपुर साहित्य उत्सव की शुरुआत हुई तो 18 साहित्यकारों ने शिरकत की और लोगों की भागीदारी भी छोटी थी.

मगर धीरे-धीरे साहित्य उत्सव ने पंख फैलाये तो 18 एकड़ में फैला रियासती दौर का डिग्गी पैलेस छोटा नजर आने लगा. अदब की महफिल के बढ़ते दायरे को देख कर समय के साथ आयोजन स्थल में जगह के लिए कुछ बदलाव किये गए और जरूरतों के मुताबिक ढाला गया.

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साहित्य के तलबगारों की बढ़ती भीड़ ने इसे  जल्द ही दुनिया भर में चर्चित कर दिया और एक पहचान दी. अब यह दसवां साहित्य उत्सव है.अगर यह उत्सव खुद मुड़ कर अतीत में झांके तो उसे अपने बढ़ते आकार पर हैरत होगी और फक्र भी.

विलियम डालरिम्पल इस सम्मलेन के आयोजकों में से एक हैं.

विलियम डालरिम्पल इस सम्मलेन के आयोजकों में से एक हैं.

इस बार उत्सव में 176 सत्र होंगे. इसमें जहां गुलजार, प्रसून जोशी और जावेद अख्तर जैसे कवि गीतकार शब्दों का शामियाना सजायेंगे वही फिल्म स्टार ऋषि कपूर ' मैं शायर तो नही' शीर्षक के सत्र में अपनी किताब का  फलसफा बयान करने के लिए मौजूद रहेंगे.

अपनी आवाज में खनक और खुद्दारी का पुट लेकर ओम पुरी इस उत्सव में उपस्थिति देते रहे हैं. लेकिन इस बार लोग उस बुलन्द आवाज से महरूम रहेंगे.   इसमें शेक्सपियर पर बात होगी तो कालिदास और  प्रेमचंद पर भी चर्चा होगी.

साहित्य प्रेमी जहां अदब के आधुनिक मिजाज से वाकिफ होंगे तो उत्सव में पुराण का भी बखान होगा. राजनीतिक विचारों के लिहाज से कार्ल मार्क्स होंगे तो धुर दक्षिणपंथ भी हाजिर रहेगा.

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जयपुर साहित्य समागम में  आरएसएस के दो वरिष्ठ  पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबोले और मनमोहन वैद्य भी शिरकत करेंगे. कुछ प्रेक्षक इसे आयोजन पर दक्षिणपंथ के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखते हैं. लेकिन आयोजको का कहना था पहले भी हर तरह के विचारों के स्वर यहां सुनाई देते रहे है. हालांकि विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने इसकी आलोचना की है.

भारत के सामाजिक ताने बाने में साम्प्रदायिक सद्भाव कवि शायरों की रचनाओं के जरिये बोलता रहा है. लिहाजा  उत्सव  में पत्रकार सईद नकवी और पवन वर्मा शब्दों से गंगा जमुनी तहजीब की चर्चा करेंगे. साहित्य के साथ पत्रकारिता भी विमर्श में मौजूद रहेगी. इसमें मार्क तुली और कई नामवर लोग अपनी बात कहेंगे.

साहित्य  के शामियाने में इतिहास के पन्ने खुलेंगे और कोहिनूर हीरे पर बात होगी. शाज़ी जमा अकबर के फसाने पर चर्चा करेंगे. दुनिया को अधिकारों का दस्तावेज देने वाले 'मैग्ना कार्टा' पर भी एक सत्र होगा.

सूफीवाद पर चर्चा के लिए सादिया देहलवी भी मौजूद रहेगी

सूफीवाद पर चर्चा के लिए सादिया देहलवी भी मौजूद रहेगी

साहित्य की महफिल में सामाजिक कार्यकर्त्ता अरुणा रॉय, पर्यावरण पर बात करने के लिए सुनीता नारायण, ख्वाजा गरीब नवाज़ और सूफीवाद पर चर्चा के लिए सादिया देहलवी भी मौजूद रहेंगी. इस बार नारी विमर्श और अधिकारों पर चर्चा के लिए महिला लेखिकाओं की अच्छी खासी हिस्सेदारी है.

दलित मुद्दों और साहित्य पर भी जयपुर उत्सव में विमर्श होगा. इस दौरान हर रोज नयी किताबों के पन्ने खुलेंगे और विमोचन होगा. जयपुर साहित्य समागम ने इसमें शिरकत करने वाले बड़े नामों से साहित्य जगत में अपनी महत्ता को स्थापित किया है.

इसमें नोबल और बुकर पुरस्कार से सम्मानित लोग अपनी हाजिरी दे चुके हैं. इनमें ओरहन पामुक, अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी, नायपॉल, सलमान रुश्दी शामिल हैं. भारत से दलाई लामा, स्व. महाश्वेता देवी और यूआर अनंतमूर्ति भी समागम में आ चुके हैं.

आयोजकों के मुताबिक यह दुनिया का सबसे बड़ा इस तरह का साहित्य उत्सव है. डिग्गी पैलेस का यह आयोजन अब तक 1300 वक्ताओं और कोई 12 लाख लोगों की मेजबानी कर चुका है और इस बार ढाई सौ हस्तियों को सुनने  पांच दिन तक साढ़े तीन लाख लोगों के आने की उम्मीद है.

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इन दस सालों में इस उत्सव की फिजा में विवादों के बादल भी उमड़ते घुमड़ते रहे. मगर आयोजको ने उस पर पार पा ली. यह साहित्य के प्रति बढ़ता रुझान है या बाजार की चाहत, जयपुर साहित्य उत्सव के नक़्शे कदम पर देश में साहित्य उत्सवों की लहर सी आई है.

बढ़ती भीड़ साहित्य के कद्रदानों का पैमाना है. लेकिन न जाने क्यों साहित्य का यह प्रभाव रोजमर्रा के सामाजिक जीवन व्यवहार में दिखाई नहीं देता.

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