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JLF: हिंदी में बाजार के बढ़ते दखल की आहट का साल

साहित्य के इस आयोजन की भव्यता को नकारा नहीं जा सकता मगर इसके दूसरे पहलुओं पर बात होनी चाहिए

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Jan 30, 2018 08:30 PM IST

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JLF: हिंदी में बाजार के बढ़ते दखल की आहट का साल

सोमवार को 5 दिन का जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल खत्म हो गया. इस फेस्टिवल के बारे में आयोजक कहते हैं कि ये 'ग्रेटेस्ट लिटरेरी शो ऑन अर्थ' है. मतलब दुनिया में सबसे बड़ा साहित्यिक आयोजन. इसके आकार की बात छोड़ दें तो इन पांच दिनों में काफी कुछ होता है जो साहित्य की दुनिया में चर्चा में बना रहता है. वैसे जब जेएलएफ (जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल) शुरू हुआ था तो मीडिया और सोशल मीडिया का हॉट डिस्कशन टॉपिक पद्मावत था. इसके खत्म होते होते कासगंज ट्रेंडिंग प्रॉपर्टी बन गया है.

जेएलएफ की मेरी पूरी यात्रा में दो टैक्सियां बहुत यादगार रहीं. पहली होटल के लिए जाते समय दूसरी होटल छोड़ते समय. जयपुर उतरते समय एक बात दिमाग में थी. पद्मावत पर आम राजस्थानी क्या सोचते हैं? टैक्सीवाले से पूछा, पद्मावत क्यों नहीं देखना चाहता है कोई राजस्थान में? सर जी हम लोग तो देख लें. इतना पैसा लगाया है तो 100 लोगों से पूछ कर बनाया होगा. सुंदर बनाया होगा. समाज के लोग हंगामा कर रहे हैं.

तो फिर समाज की तकलीफ क्या है?

सर जी, आनंदपाल याद है आपको? बदमाश था, राजपूत समाज के लोग तो उसके लिए भी ऐसे करने लगे थे कि... फिर ये तो महारानी हैं... इन दो पॉज़ के बीच बहुत कुछ था जो हम सब बाहर से आर्मचेयर कमेंट्री करने वाले शायद नहीं पकड़ पाते हैं. खैर, पहले फेस्टिवल की बात करते हैं.

जेएलएफ को एक शब्द में बयां करने के लिए भव्यता शब्द इस्तेमाल किया जा सकता है. आप इसके पक्ष में हों, विरोध करें या तटस्थ रहें. जयपुर के डिग्गी पैलेस में होने वाला ये जलसा भव्यता के स्तर पर सबको प्रभावित करता है. सामान्य जनता को, बुलावे पर गए लेखक पत्रकार और ब्लॉगर्स को और दुनिया भर के बड़े लोगों को. वैसे कार्यक्रम के आयोजकों को इसमें आने वाली भीड़ और जगह के अनुपात को देखते हुए कुछ गंभीर विचार करने चाहिए. 26 जनवरी की छुट्टी और उसके बाद के शनिवार को वहां आई भीड़ डरावनी होने तक ज्यादा थी. जब किसी कोने में चलने तक की जगह न हो, तो तमाम सुरक्षा उपायों के बावजूद भगदड़ और कमला मिल जैसे हादसों की आशंका मन में रह-रहकर आती रहती है.

ZEE-Jaipur-Literature-Festival-2018

इसी भव्यता के लिए इसकी आलोचना भी होती है. साहित्यकारों का एक वर्ग कहता है कि बाज़ार के जरिए साहित्य के नाम पर कचरा और तमाम असाहित्यिक चीज़ों को बढ़ावा दिया जा रहा है. दूसरी ओर फेसबुक पर चर्चित हुए कुछ नए ‘सेलेब्रिटी’ हैं जो हर आयोजन पर आलोचना का नित्यकर्म करते हैं.

मगर जेएलएफ की तारीफ होनी चाहिए. इस बात के बावजूद कि वहां आने वाले ज्यादातर विज़िटर सिर्फ सेल्फी लेने के अनगिनत पॉइंट्स में रुचि रखते हैं. जयपुर के कॉलेज यूथ के लिए ये पांच दिन का हनीमून जैसा मौका होता है. सबसे पहले हिंदी की बात करते हैं. इस साल ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने पहली बार ‘हिंदी वर्ड ऑफ द ईयर’ घोषित किया. आधार कार्ड वाला आधार 2017 का सबसे चर्चित शब्द चुना गया. क्या ये प्रक्रम राजभाषा विभाग की जिम्मेदारी नहीं है? क्या नए शब्दों पर जो चर्चा हुई उसको कोई पारंपरिक साहित्यिक समूह आगे बढ़ाएगा?

गौरव सोलंकी की किताब के लोकार्पण वाले सेशन में अच्छी खासी भीड़ दरबार हॉल के बाहर खड़ी थी. इस सेशन में बोलने वाले तीन लोग थे गौरव सोलंकी, सत्यव्यास और सुदीप्ति. हिंदी के एक नए लेखक के सेशन में लोगों का उत्साह अच्छी बात है. यही उत्साह ऑक्सफोर्ड के सेशन, शशि थरूर और सौरभ द्विवेदी के सेशन में भी दिखा. इस उत्साह की आलोचना करने की जगह उसको और अच्छे से इस्तेमाल करना चाहिए.

दरवाजा खुलने से पहले की ये भीड़ अक्सर हिंदी फिल्मों के लिए ही दिखती है, किताबों-लेखकों के लिए कम

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जो लोग जेएलएफ इससे पहले भी जाते रहे हैं उन्हें इसमें इस साल हुई हिंदी और क्षेत्रियता की बढ़ोत्तरी साफ दिखी होगी. कई सेशन ऐसे थे जिनमें पिछले कुछ सालों में चर्चा में आए लेखकों और ब्लॉगर्स को बुलाया गया था. इसके साथ ही हिंदी वेबसाइट्स के लिए लिखने वाले पत्रकार, ब्लॉगर्स (जिनमें विनम्रता के साथ मैं अपने आपको भी रख सकता हूं) की भी तादाद अच्छी खासी थी. हालांकि पारंपरिक मीडिया से अलग ये जेएलएफ के जलसे में आधिकारिक रूप से शामिल हुआ ये नया लॉट पारंपरिक मीडिया से थोड़ा अलग था. इसमें से ज्यादातर अंग्रेजी में लिखने पढ़ने भर की समझ रखते हैं. इसी के चलते वो भले ही अपने अनुभव हिंदी में लिखें. उनके पास देखने, समझने और बात करने के लिए अंग्रेजी के अच्छे खासे सेशन होते हैं.

इस नए तरह के संयोजन के कई फायदे हैं. उदाहरण के लिए 26 जनवरी को हिंदी के पारंपरिक मीडिया की सबसे ज्यादा दिलचस्पी नवाजुद्दीन सिद्दीकी को सुनने में रही. इस नई जमात के लिए हामिद करजई को सामने से सुनना बाकी विदेशी डेलीगेट्स के जितना ही रोचक था.

दुनिया भर के लोक संगीत और कलाकारों को साथ-साथ सुनते रहना भी एक अनुभव है

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सिर्फ बाज़ार और प्रायोजकों के नाम के चलते जयपुर फेस्ट को सिरे से खारिज करनेवालों को सोचना चाहिए कि हिंदी जगत का कौन सा गैर राजनीतिक आयोजन हिंदी में लिखनेवालों को शशि थरूर, हामिद करजई जैसों को सुनने और सवाल पूछने का मौका देता है. इसके साथ ही कितने और ऐसे अवसर हैं जब हिंदी के कॉलमनिस्ट और राइटर पी साईनाथ, अमितावा कुमार और ऐसे दूसरे ‘एलीट’ कॉलमनिस्ट्स से खाना खाते हुए बात कर सकें. कश्मीर और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति पर बहस सकें. ऐसा भी नहीं है कि ये बहस सिर्फ टेबल की चर्चा तक सीमित रहीं. एक सेशन में पांचजन्य के एडिटर हितेश शंकर बीच बहस में बोले कि वो आने वाले समय में एलजीबीटी पर एक अंक छापेंगे. हालांकि ऐसा होगा कि नहीं, इसका इंतज़ार रहेगा.

वैसे जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल की बात करते हुए पैरलल लिट्रेचर फेस्टिवल का जिक्र होना चाहिए. अगर किसी आयोजन के समानांतर आयोजन खड़ा करना है तो उससे ईर्ष्या वाला भाव नहीं दिखना चाहिए. क्योंकि आयोजकों का उद्देश्य कुछ भी रहा हो मगर लोगों के बीच संदेश यही गया. पीएलएफ के आयोजकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए. क्योंकि एक बड़े आयोजन के समय उसी से मिलते जुलते नाम वाले आयोजन समानांतर करवाना भारतीय समाज में साहित्य की परंपरा नहीं रही है. अच्छा है कि कई आयोजन हों मगर उनसे सकारात्मक संदेश जाए. और उन्हें सकारात्मकता के साथ देखा जाए.

हिंदी की दुनिया मार्केटिंग और प्रचार को गलत, आत्म मुग्धता को सही मानना बंद कर देना चाहिए. लेखक सत्य व्यास को द्वारका प्रसाद अग्रवाल पुरस्कार मिला. इसके बाद की एक बातचीत में उनके एक प्रशंसक ने पूछा कि अब तो आपको काफी लोकप्रियता मिल गई. अब तो आपको नई किताब के लिए मार्केटिंग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी? सत्य के जवाब को छोड़ दें. मेरे दिमाग में एक प्रतिप्रश्न आया, मार्केटिंग की जरूरत तो कोकाकोला को अभी भी पड़ती है, तो किसी लेखक को क्यों नहीं?

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जेएलएफ से जुड़ी कई बातें हैं मगर जाते-जाते दूसरी टैक्सी वाले की कहानी. होटल से वापस बस स्टॉप 1 किलोमीटर से कम दूरी पर था. रात को आराम से पैदल चलना शुरू किया. बगल में ओला की एक टैक्सी आकर रुकी. ड्राइवर ने दरवाजा खोला और बड़े प्रेम से कहा अंदर बैठ जाएं. मैं बिना कुछ सोचे अंदर बैठ गया. रात के लगभग 12: 30 बज रहे थे और साथ में बैठे शख्स की लंबी दाढ़ी से उसके ‘मजहब’ का पता चल रहा था. आप समझ सकते हैं कि कुछ लोगों को समझाने के लिए इन बातों का जिक्र करना जरूरी है. बस स्टॉप पर उतरा उससे पूछा आपको क्या दूं? आप मेहमान हैं साब. अचानक से राजस्थान टूरिज्म का विज्ञापन याद आ गया, मुझको राजस्थान कुछ ऐसा दिखा.

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