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प्रजनन क्षमता बढ़ानी है तो मांस और दूध से करें परहेज...

अगर आप संतान उत्पत्ति की अपनी संभावना बढ़ाना चाहते हैं तो सब्जी और फल खाइए, खासकर दाल और पालक का सेवन कीजिए और दूध अथवा दूध से बने उत्पाद और मांस के सेवन से परहेज कीजिए.

Maneka Gandhi Maneka Gandhi Updated On: Nov 22, 2017 10:43 AM IST

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प्रजनन क्षमता बढ़ानी है तो मांस और दूध से करें परहेज...

बहुत से दंपत्ति डाक्टर के पास शिकायत लेकर जाते हैं कि हम संतान नहीं पैदा कर पा रहे जो कि भारत जैसे देश में थोड़ी अजीब जान पड़ती बात है. जाहिर है, बहुत से पुरुष इसका दोष अपनी पत्नी पर मढ़ देते हैं लेकिन जब परिवार के दबाव में आकर उन्हें जांच करवानी होती है तो नतीजा अक्सर यही निकलता है कि पुरुष में शुक्राणुओं की संख्या कम है. अब यह कोई ईश्वर की मर्जी नहीं है हालांकि परिवार के पुरोहित जी यही बताएंगे. यह तो सीधे-सीधे आपके भोजन से जुड़ा मामला है.

शुक्राणुओं की संख्या और उनकी गुणवत्ता पर भोजन का सीधा असर पड़ता है. मांस और दूध से बने उत्पाद ना सिर्फ आपके कमर की चर्बी बढ़ाते हैं बल्कि कमर के निचले हिस्से पर भी ऐसे भोजन का बुरा असर होता है. ऐसे भोजन से शुक्राणुओं की संख्या कम होती है, उनके आकार-प्रकार और घनत्व में भी कमी आती है.

प्रजनन संबंधी समस्याओं वाले पुरुषों को डॉक्टर कई सलाह देते हैं जैसे कि सिगरेट पीना छोड़ दीजिए, अंतर्वस्त्र ढीले पहनिए, लैपटॉप को शरीर से दूर रखिए और सेक्स ज्यादा अंतराल देकर कीजिए ताकि शरीर को शुक्राणु तैयार करने का समय मिले. लेकिन इसमें सबसे ज्यादा अहमियत है कंप्यूटर और गणित की दुनिया में चलने वाले गायगो सिद्धांत की जो एक तरह से आपको भारत में प्रचलित इस धारणा की याद दिलाता है कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन.

गायगो सिद्धांत बताता है कि अगर आप बबूल का पेड़ लगाते हैं तो उससे आम की फसल नहीं ले सकते. वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी के मेन्स हेल्थ क्लीनिक के निदेशक डा. रेयान टेरलेकी बताते हैं, 'हमने देखा है कि बीते कई दशकों से संतान-उत्पत्ति की क्षमता में कमी आ रही है. ज्यादातर पुरुषों ने शायद ही कभी सुना हो कि उनके खान-पान का भी असर शुक्राणुओं की संख्या पर हो सकता है.'

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प्रतीकात्मक तस्वीर

आपके भोजन में शामिल चीजों से तय होता है कि आपके शरीर में शुक्राणुओं की तादाद कितनी और कैसी होगी, शुक्राणु किस आकार-प्रकार के होंगे और वे किस तेजी से गतिशील होंगे. बहुत से शोध-अध्ययनों यह संकेत करते हैं.

साल 2006 में यूनिवर्सिटी ऑफ रॉचेस्टर के कोचमैन, हरको, ब्रियुअर, एंडोलिना तथा सांग ने एक शोध-पत्र प्रस्तुत किया. इस शोध-पत्र ( डायट्री एंटीऑक्सीडेन्ट एंड स्पर्म क्वालिटी इन इन्फर्टाइल मेन : एनुअल साइंटिफिक मीटिंग ऑफ द अमेरिकन सोसायटी फॉर रिप्रोडक्टिव मेडिसीन ) के मुताबिक : बड़ी संभावना इस बात की है कि संतानोत्पत्ति में अक्षम पुरुष संतान पैदा कर सकने की क्षमता वाले पुरुषों की तुलना में फल और सब्जी का सेवन कम मात्रा में करते हों.

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फल-सब्जियों से बढ़ती है प्रजनन क्षमता

यह बात विशेष रुप से कही जा सकती है कि ज्यादा फल-सब्जी खाने वाले पुरुषों के शुक्राणुओं की गति कम फल-सब्जी खाने वाले पुरुषों की तुलना में ज्यादा होती है. फल-सब्जी खाने मात्र से प्रजनन क्षमता बढ़ जाती है. साल 2011 में प्रकाशित ब्राजील के एक शोध-अध्ययन के मुताबिक जो पुरुष गेहूं, जौ और जई जैसे सम्पूर्ण अनाज का सेवन करते हैं उनमें शुक्राणुओं की सांद्रता ज्यादा होती है.

प्रजनन शक्ति और इससे जुड़ी अक्षमता के बारे में प्रकाशित शोध-अध्ययनों में भी कुछ ऐसी ही बात कही गई है और इन अध्ययनों में दूध से बने उत्पाद जैसे चीज़ (cheese) को वीर्य को नष्ट करने वाला बताया गया है. अगर आप सम्पूर्ण आहार के रूप में दूध का सेवन करते हैं तो बहुत संभव है आपके शरीर में जितने स्वस्थ शुक्राणु होने चाहिए उसका बस एक छोटा सा हिस्सा शेष रह जाए.

जो नौजवान सम्पूर्ण वसायुक्त दूध और चीज़ का प्रतिदिन दो दफे सेवन करते हैं उनमें गतिशील शुक्राणुओं की संख्या बहुत कम हो जाती है. यह बात मानव-प्रजनन से संबंधित 2013 के एक शोध-अध्ययन में बताई गई है.

कई शोध-अध्ययनों में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि ज्यादा फल-सब्जी खाने वाले पुरुषों के वीर्य की गुणवत्ता बेहतर होती है.

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हाल में हार्वर्ड के एक शोध-अध्ययन का निष्कर्ष है कि मांस और डेयरी-उत्पाद की मात्रा भोजन में 5 प्रतिशत भी बढ़ा दी जाए तो उसकी वजह से शुक्राणुओं की संख्या में 38 फीसद की कमी आ जाती है. (एटमैन, टोथ, फुरटाडो, कैम्पोस, हाऊजर, शेवारो जेई. डायट्री फैट एंड सीमेन क्वालिटी अमांग मेन अटेंडिंग ए फर्टिलिटी क्लीनिक. ह्यूमन रिप्रोडक्शन). हार्वड के 2014 के शोध-अध्ययन के मुताबिक जो पुरुष सबसे ज्यादा प्रसंस्कृत मांस (प्रोसेस्ड मीट) खाते हैं उनमें कभी-कभार मांस खाने वाले पुरुषों की तुलना में सामान्य शुक्राणुओं की संख्या 23 प्रतिशत कम होती है. साल 2014 का ही एक और शोध-अध्ययन इपिडेमियोलॉजी नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ. इसमें ऊपर बताए गए शोधकर्ताओं ने बताया कि प्रसंस्कृत मांस(प्रोसेस्ड मीट) खाने से शुक्राणुओं की संख्या में कमी आती है.

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हाल में 99 वीर्यदाताओं पर एक अध्ययन हुआ. इसे मैसाचुसेट्स जेनरल हॉस्पिटल, ब्रिघम तथा विमेन्स हास्पिटल एंड हावर्ड मेडिकल स्कूल ने किया. शोध-अध्ययन का नेतृत्व डॉ. जिल एट्टामैन कर रहे थे जो डारमाऊथ-हिचकॉक मेडिकल सेंटर में रिप्रोडक्टिव एंडोक्राइनोलॉजिस्ट हैं. इस शोध-अध्ययन से पता चलता है कि हमारे भोजन का शुक्राणुओं पर क्या असर पड़ता है.

सैचुरेटेड फैट हानिकारक

जिन वीर्यदाताओं ने मांस या दूध जैसे आहार के कारण ज्यादा संतृप्त वसा (सैचुरेटेड फैट) का सेवन किया था उनमें शुक्राणुओं की संख्या कम वसायुक्त भोजन करने वाले वीर्यदाताओं की तुलना में 43 प्रतिशत घटी हुई थी. भोजन में वसा की मात्रा कम करने से ना सिर्फ सेहत की दशा में सुधार देखा गया बल्कि प्रजनन संबंधी क्षमता में भी बेहतरी हुई.

डेनमार्क 221 देशों की एक सूची में जन्म-दर के मामले में 185वें स्थान पर है और इसकी आबादी बड़ी तेजी से घट रही है. लेकिन क्या यह सचेत रूप से बच्चे कम पैदा करने का मामला है अथवा इसके पीछे कोई और वजह है ?

कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी नेशनल हॉस्पिटल के शोधकर्ताओं का एक शोध-अध्ययन अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लीनिकल न्यूट्रीशन में प्रकाशित हुआ है. इस शोध-अध्ययन के मुताबिक डेनमार्क के पुरुषों की भोजन संबंधी आदत का संबंध उनमें घटते शुक्राणुओं की संख्या से है और डेनमार्क में जन्म-दर कम होने के पीछे यह एक वजह हो सकती है.

डेनमार्क के कुल 701 पुरुषों ने एक शोध-अध्ययन में हिस्सा लेते हुए नमूने के तौर पर अपने वीर्य के सैंपल दिए और भोजन संबंधी अपनी आदतों की जानकारी दी. डॉ. टीना जेनसन की अगुवाई में शोधकर्ताओं ने प्राप्त जानकारी और सैंपल का अध्ययन किया. इससे पता चला कि जिन पुरुषों ने सबसे ज्यादा संतृप्त वसा यानि मांस और चीज़ को आहार के रूप में लिया था उनमें कम वसायुक्त भोजन करने वाले पुरुषों की तुलना में शुक्राणुओं की संख्या 41 प्रतिशत कम थी.

जिन पुरुषों ने अपने कैलोरीज का 15 फीसद हिस्सा आहार के रूप में संतृप्त वसा (सैचुरेटेड फैट) से हासिल किया था उनमें शुक्राणुओं की सांद्रता 45 मिलियन प्रति मिलीलीटर और शुक्राणुओं की संख्या 128 मिलियन थी जबकि कैलोरीज का 11 फीसद हिस्सा आहार के रूप में संतृप्त वसा के मार्फत हासिल करने वाले पुरुषों में शुक्राणुओं की सांद्रता 50 मिलियन प्रति मिलिलीटर और शुक्राणुओं की संख्या 163 मिलियन पाई गई.

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इस अध्ययन में ज्यादा वसायुक्त आहार लेने वाले 18 प्रतिशत पुरुष विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सामान्य शुक्राणु सांद्रता के मानक से पीछे पाए गए. फ्रांस में भी आहार के रूप में मांस और चीज़ का प्रचलन ज्यादा है और फ्रांस से संबंधित एक ऐसे ही शोध-अध्ययन का निष्कर्ष है कि 1989 में वहां पुरुषों में शुक्राणुओं की सांद्रता 74 मिलियन प्रति मिलिलीटर थी जो 2005 में घटकर 50 मिलियन रह गई .

महिलाएं रखें इन बातों का ध्यान

अगर मांस की जगह पेड़-पौधों से हासिल होने वाला प्रोटीन खाया जाय तो महिलाओं में बांझपन का खतरा कम हो सकता है. यह बात अमेरिकन जर्नल ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गॉयनाक्लॉजी में कही गई है. सरल तरीके से कहें तो जर्नल में प्रकाशित शोध अध्ययन के मुताबिक ज्यादा दफे मांसाहार करने से गर्म ठहरने की संभावना कम हो जाती है, निषेचित अंडाणु(फर्टिलाइज्ड एग) के गर्भाशय में स्थापित होने की संभावना घटती है.

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जो महिलाएं मांस में पाए जाने वाला आयरन भोजन के रूप में लेती हैं उनमें दाल या पालक के मार्फत आयरन (लौह तत्व) लेने वाली महिलाओं की तुलना में बांझपन का खतरा 40 फीसद ज्यादा होता है. (शेवारो जेई, रिक-एडवर्डस् जेडब्ल्यू, रोजनर बीए, विलेट डब्ल्यूसी. आयरन इनटेक एंड रिस्क ऑफ ओवुलेटरी इन्फर्टिलिटी. 2006).

मांसयुक्त भोजन करने से क्लोरोस्ट्रोल का स्तर बढ़ता है और बढ़ा हुआ यह क्लोरोस्ट्रोल गर्भधारण करने में बाधा बन सकता है, गर्भधारण करने में देरी हो सकती है. यह बात नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ एंड ह्यूमन डेवलपमेंट के एक एक शोध-अध्ययन (सिस्टरमैन, मम्फोर्ड, ब्राऊने, बार, चेन, लुईस. लिपिड कंस्ट्रेशन एंड कपल फेकंडिटी: द लाईफ स्टडी. जे क्लीन. एंडोक्रिनल मेटा. 2014) में कही गई है.

जीवनशैली में बदलाव ने बढ़ाई हैं मुश्किलें

कई देशों में हुए शोध-अध्ययनों का निष्कर्ष है कि पूरी दुनिया में पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या घट रही है और इसकी वजह है अर्थव्यवस्था में बेहतरी आने के साथ संतृप्त वसायुक्त खान-पान और फास्डफूड का बढ़ता चलन.

जीवनशैली के एक बदलाव का रिश्ता जैविक रीति से उपजाए खाद्य-पदार्थों का सेवन करना है. अमेरिकन सोसायटी फॉर रिप्रोडक्टिव मिडिसीन की 2014 की वार्षिक बैठक में प्रस्तुत एक अध्ययन के मुताबिक जो पुरुष ज्यादातर कीटनाशक मिले भोजन का इस्तेमाल करते हैं उनमें कीटनाशक युक्त भोजन का कभी-कभार व्यवहार करने वाले पुरुष की तुलना में सामान्य शुक्राणुओं की संख्या 64 प्रतिशत तक और गतिशील शुक्राणु 70 प्रतिशत तक कम होते हैं.

शुक्राणुओं की सांद्रता और गतिशीलता पर शराब पीने का भी बुरा असर हो सकता है. यह बात प्रजनन संबंधी दिक्कतों का उपचार कराने आए पुरुषों पर केंद्रित ब्राजील के एक शोध-अध्ययन(2014) में कही गई है. डेनमार्क में हुए एक शोध-अध्ययन के मुताबिक अगर कोई थोड़ी-थोड़ी ही शराब पीता है लेकिन उसने शराब पीने की आदत पाल ली है तो उसके वीर्य की गुणवत्ता पर इसका असर पड़ेगा.

प्रतीकात्मक तस्वीर

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शराब पीने से कहीं बेहतर है कोई अनार का रस पीए. तुर्की में हुए एक अध्ययन के अनुसार नर चूहों को जब रोजमर्रा के हिसाब से कुछ दिनों तक अनार का रस पिलाया गया तो उनमें शुक्राणुओं की संख्या और गतिशीलता बढ़ गई. अनार के रस में विटामिन सी जैसे एंटीऑक्सीडेन्ट भरपूर मात्रा में होते हैं और हालांकि तुर्की में यह प्रयोग चूहों पर किया गया था लेकिन कुछ और शोध-अध्ययनों में बताया गया है कि एंटीआक्सीडेन्ट का सेवन पर्याप्त मात्रा में करने पर शुक्राणुओं की गुणवत्ता बेहतर होती है.

ब्राजील में एक नया शोध-अध्ययन 189 दुबले-पतले नौजवानों को लेकर हुआ. यह अध्ययन ह्यूमन रिप्रोडक्शन नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इस अध्ययन के मुताबिक अगर कोई रोजमर्रा चीनी मिला ड्रिंक्स (पेय) लेता है तो उसके शुक्राणुओं की गतिशीलता पर खराब असर पड़ता है. अगर आपको मीठा खाने का मन कर रहा है तो अच्छा है कि आप फलों का सेवन करें क्योंकि फलों के सेवन से शुक्राणुओं की गुणवत्ता बेहतर होती है.

आखिर में बात ये कि अगर आप संतान उत्पत्ति की अपनी संभावना बढ़ाना चाहते हैं तो सब्जी और फल खाइए, खासकर दाल और पालक का सेवन कीजिए और दूध अथवा दूध से बने उत्पाद और मांस के सेवन से परहेज कीजिए.

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