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व्यंग्य: काश! सड़क की जगह काशी का 'गुंडा' कह दिया होता

काशी का गुंडा मतलब ऐसा आदमी जो अपनी आन पर मर मिटता हो, कमजोर और मजलूम लोगों की रक्षा करता हो

Shivaji Rai Updated On: Jun 12, 2017 01:30 PM IST

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व्यंग्य: काश! सड़क की जगह काशी का 'गुंडा' कह दिया होता

कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने सेना प्रमुख बिपिन रावत को सड़क का गुंडा क्या कहा, पूरे देश में हाय तौबा मच गई. खुद कांग्रेस ने भी पल्ला झाड़ लिया.

काश संदीप दीक्षित ने आर्मी चीफ बिपिन रावत को सड़क की जगह 'काशी का गुंडा' कहा होता तो उनके मन की भड़ास भी निकल गई होती और किरकिरी भी नहीं हुई होती. साथ ही सेनाध्यक्ष के मन में उनके प्रति श्रद्धा भी बढ़ गई होती. अर्थात एक तीर से कई निशाने सध गए होते. न माफ़ी मांगनी पड़ती और ना ही खेद व्यक्त करने की जहमत उठानी पड़ती.

पर सीधे-साधे संदीप दीक्षित न सधे राजनेता की तरह अपने बयान से यू-टर्न ले पाए और न ही यह कह पाए कि बयान को गलत संदर्भ में पेश किया गया है. वैचारिक मतभेद के तहत आप कह सकते हैं कि आर्मी चीफ अपने बयान से सज्जन नहीं दिख रहे हैं लेकिन इतना तो मैं भी कह सकता हूं कि उनमे गुंडों वाली बात भी नहीं है.

काशी के गुंडे से ना किसी को नफरत होती है और ना ही घृणा

काशी का गुंडा कहने पर हर चीज परफेक्ट बैठती है. गुंडा शब्द सुनते ही मन में एक घृणित छवि हमारे सामने आ जाती है. उससे नफरत सी होने लगती है. पर काशी का गुंडा की छवि इससे इतर है. इसकी छवि ना ही मन में घृणा का भाव भरती है और ना ही नफरत पैदा करती है.

मणिकर्णिका घाट

वाराणसी शहर की प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स

यहां तो गुंडे का आशय है ऐसा व्यक्ति जो अपनी आन पर मर मिटता हो, कमजोर और मजलूम लोगों की रक्षा करता हो. वह ऐसा गुंडा नहीं जो किसी राजनीतिक दल की टोपी पहनकर लूटपाट करता हो, किसी गायत्री प्रजापति की तरह गैंगरेप करता हो. वह ना गौरक्षक बनकर किसी को मारता पीटता है और ना ही हिन्दू युवा वाहिनी का कार्यकर्ता बनकर किसी को धमकता है. वह तो मां-बहनों की नजर में रॉबिनहुड है.

गुंडा मतलब रक्षा करने वाला

संस्कृत के ज्ञाता अवधू गुरु का तो कहना है कि गुंडा आदि काल से रचनात्मक रहा है. गुंडा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'गुंड' शब्द से बताई जाती है. गुंडयति का अर्थ है 'आशय में आच्छादित कर लेना, रक्षा करना'.

18वीं सदी के आखिरी हिस्से में जब बनारस में चारों ओर कुव्यवस्था फैली हुई थी और अंग्रेजों और उनके वफादारों ने आतंक का माहौल बना रखा था तब काशी के गुंडे ही आम आदमी के रखवाले रहे.

बनारस में गुंडा खूब चलता है

बनारस में गुंडा न तब हेय था न आज हेय है. बंगाली टोला में तो सबसे मशहूर चाय वाले का नाम है 'गुंडा चाय वाला'. यह नाम आज नहीं पड़ा है, 1942 से ही इस दुकान के नाम से गुंडा जुड़ा हुआ है. आज चौथी पीढ़ी दुकान चला रही है पर नाम वही है.

बनारस के मशहूर कवि मुहम्मद तेग अली तो खुद को गुंडा कवि कहते थे. उन्होंने तो अपने चरित्र के अनुरूप अपने कविता संग्रह को 'बदमाश दर्पण' नाम दिया. लिहाजा संदीप जी को सिर्फ शब्दों में हेरफेर करना चाहिए था.

varanasi

 

पुलिसवाले से बड़ा गुंडा कौन?

वैसे भी इन दिनों मामला अजीब हो गया है. जिसे जो समझो वह वो नहीं निकलता. पुलिस वाला गुंडा नंबर वन निकलता है. मोहल्ले के पढ़ाकू लड़के को इंटेलीजेंट समझो तो वह दूसरे मोहल्ले की लड़कियों की हिटलिस्ट का पहला निशाना निकलता है. खिलाड़ी मॉडल बनकर संवरता है और मुहल्ले का गुंडा युवजन सभा का अध्यक्ष निकलता है.

आइडेंटिटी क्राइसिस का मामला बड़ा पेंचीदा हो गया है. यहां तक कि खेल जो दिखाई देता है वो होता नहीं है. किसी कवि ने सच ही कहा है-

'मवालियों को न देखा करो हिकारत से न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाये'

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