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कोलकाता: इज्जत बचाने के लिए चेहरे पर कालिख मलकर रहती हैं बच्चियां

हम औरतों के लिए बहस अभी भी शरीर से ही शुरू कर रहे हैं और लगता है ये बहस अभी भी लंबी चलेगी

Tulika Kushwaha Updated On: Nov 23, 2017 09:23 AM IST

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कोलकाता: इज्जत बचाने के लिए चेहरे पर कालिख मलकर रहती हैं बच्चियां

2009 में कलर्स चैनल एक शो लेकर आया था- लागी तुझसे लगन. कहानी थी नकुशा नाम की 'बदसूरत' लड़की की. नकुशा का मतलब होता है- अनचाही. नकुशा अपने नाम के हिसाब से ही अनचाही थी. बिल्कुल काली त्वचा और बदसूरत नकुशा हमारे समाज की उस सोच का नतीजा थी, जहां कीमती चीजों को छुपाया जाता है और बदसूरती को दुत्कारा जाता है.

लेकिन कहानी में ट्विस्ट था- नकुशा काली नहीं बल्कि बहुत गोरी और खूबसूरत लड़की है, उसकी खूबसूरती को लोगों की नजरों से बचाने के लिए उसकी मां उसके चेहरे पर राख मलकर रखती है और किसी को नहीं पता कि नकुशा आखिर असल में कैसी दिखती है. खैर, नकुशा को उसका प्यार मिलता है और कहानी टीवी पर आने वाले सीरियलों की तरह खिंचती है. लेकिन असल बात ये कि बंगाल में कुछ ऐसी भी नकुशाएं हैं, जिनकी कहानी में कोई ट्विस्ट नहीं है और उनकी परेशानियां दूर करने के लिए कोई फरिश्ता नहीं आने वाला.

असल जिंदगी की नकुशाएं

असल जिंदगी में किसी नकुशा को देखने का अनुभव कैसा होगा? वो भी तब जब उसका चेहरा उस डर की राख के पीछे छिपा हो, जहां उसे अपनी इज्जत बचाने के लिए ऐसी तरकीबों का सहारा लेना पड़ रहा हो. बंगाल की बेघर औरतों और लड़कियों के पास शायद यही रास्ता है.

वैसे तो, देश में घर-बार में रहने वाली महिलाओं की ही सुरक्षा का कोई ठिकाना नहीं है, तो ऐसे में बेठौर-ठिकानों की इन औरतों की सुरक्षा की बात करना मजाक करना होगा. विलेज स्क्वेयर में छपी मणिपद्मा जेना की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता में बेघर औरतें अपनी बच्चियों के चेहरे पर राख और तेल को मिलाकर बनाया गया कालिख पोतकर रखती हैं, ताकि उनकी खूबसूरती और शरीर पर आसपास भटक रही नजरें न पड़े और शादी होने तक उनकी इज्जत बची रहे. फिर प्यूबर्टी तक पहुंचने यानी युवावस्था में कदम रखने के साथ ही उनकी शादी कर दी जाती है.

काली नजरों से बचता काला चेहरा

औरतों पर बहुत सी बंदिशें हैं. धर्म, रीति-रिवाज या परंपराओं के हिसाब से इन्हें तय किया गया है, चाहे बुर्का पहनना हो, या घूंघट डालना, चाहे मंदिर-मस्जिद में प्रवेश पर मनाही क्यों न हो, लेकिन अपने चेहरे पर कालिख लगा रखना, ताकि वो काली नजरों से बची रहें, सरासर अपने अस्तित्व को नकारने जैसा है. आप एक बार सोचकर देखिए कि आपको अपना चेहरा दिखाने की आजादी नहीं है क्योंकि उसके नोंचे जाने का डर है? कैसा लगेगा आपको?

इनकी सबसे बड़ी समस्या बेघर होना है. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में करीब 93 लाख लोग बेघर थे लेकिन अब ये आंकड़ा 3 करोड़ के पार पहुंच चुका है. कोलकाता में अकेले 15 लाख से ज्यादा बेघर हैं, इनमें लगभग 20,000 बच्चे हैं. लेकिन सरकारी आंकड़ों में इनमें से आधे लोगों को भी जगह नहीं मिल पाती है, जिसके चलते शेल्टर हाउस भी उतनी संख्या में नहीं बन पाते, जितनी जरूरत है. उसपर तुर्रा ये कि अपनी बुनियादी जरूरत- खाने को लेकर भी इन्हें सरकार से कोई मदद नहीं मिलती क्योंकि सरकारी राशन के लिए पहचान पत्र चाहिए और पहचान पत्र के लिए पता, जो इनके पास नहीं है.

कालिख के पीछे कितनी सुरक्षा?

जिन्हें खाना जैसी बुनियादी सुविधा मयस्सर नहीं हो, उनके लिए अपनी बच्चियों की सुरक्षा की चिंता किस कदर खाए जाती होगी, इसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल है. इन बच्चियों में से कितनी रेप और यौन शोषण का शिकार होती होंगी, इसके आंकड़ें भी नहीं जुट पाते होंगे.

लेकिन कालिख के पीछे ढूंढ रही सुरक्षा की भावना तब बहुत कमजोर पड़ती दिखाई देती है, जब आए दिन 2 साल, 3 साल की बच्चियों के साथ उनके घर में या घर के आस-पास रेप की घटनाएं सामने आती हैं. इन बच्चियों के पास तो अपना चेहरा और शरीर भी नहीं होता, फिर कालिख के पीछे छुपे चेहरे और शरीर को कितनी सुरक्षा मिल पाती होगी, पता नहीं.

ड्रग्स में डूबी मणिपुर की महिलाएं

बेघरों की समस्या का एक और रूप है- ड्रग्स में डूबी महिलाएं. यहां बैठकर आप बिल्कुल अंदाजा नहीं लगा सकते कि सुदूर मणिपुर की महिलाएं किस समस्या से जूझ रही हैं. लेकिन उनकी कहानी दिल को पिघला देने वाली है. ड्रग्स के फेर में पड़ी इन महिलाओं का न घर है न परिवार. शेल्टर हाउसों में दिन और कस्टमर के साथ रात बिता रही इन महिलाओं के पास अपनी नई पहचान बनाने के लिए भी कोई रास्ता नहीं है. लेकिन हालात इतने बदतर हैं कि इन्हें रेप जैसी दुर्घटना से डर नहीं लगता, उनकी दूसरी चिंताएं हैं- जैसे आज रात वो कहां सोएंगी? या खाने को पैसे जुटेंगे या नहीं?

इन सारे किस्सों का मज़मून ये कि खाने को अन्न, रहने को सिर पर छत और इज्जत बचाने को कालिख के पीछे सुरक्षा ढूंढ रही देश की औरतों की बहस बस उनके शरीर तक रुक जाए तो, दुख होता है. हम औरतों के लिए बहस अभी भी शरीर से ही शुरू कर रहे हैं और लगता है ये बहस अभी भी लंबी चलेगी.

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