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किस गाने के लिए संगीत निर्देशक जयदेव के साथ जिद पर अड़ गए थे वेद राही?

लगभग पचास फिल्मों में संगीत देने वाले जयदेव को तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Jul 23, 2017 09:50 AM IST

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किस गाने के लिए संगीत निर्देशक जयदेव के साथ जिद पर अड़ गए थे वेद राही?

संगीतकार जयदेव हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की लोकप्रिय और रोचक शख्सियतों में से एक रहे. उनका जन्म केन्या के नैरोबी में हुआ था और वो हिंदुस्तान में पले बढ़े. लगभग 15 साल की उम्र में वो भागकर मुंबई चले गए थे. मंजिल थी- हीरो बनना.

जयदेव ने कुछ समय फिल्मों में काम भी किया लेकिन मुकद्दर में कुछ और ही लिखा था. लिहाजा वापस संगीत की दुनिया में लौट आए. उस्ताद अली अकबर खान ने उन्हें अपना असिस्टेंट रखा. बाद में उन्होंने एसडी बर्मन के साथ भी काम किया. लगभग पचास फिल्मों में संगीत देने वाले जयदेव को तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

हुआ यूं कि जयदेव फिल्मी संगीत से इतर भी काफी कुछ रचते-गढ़ते रहते थे. पीनाज मसानी को पहचान दिलाने वाले संगीतकार जयदेव ही थे. उन्होंने रामायण सीरियल का भी संगीत दिया था. एक बार ऐसा हुआ कि जयदेव ने एक धुन बनाई. उस धुन को उन्होंने किसी फिल्म के लिए नहीं बनाया था लेकिन धुन बन गई थी तो यहां वहां उसकी चर्चा हो ही जाती थी.

फिल्मी संगीत के पसंदीदा राग पहाड़ी के किस्से-कहानियां

एक रोज जयदेव की मुलाकात वेद राही से हुई. साल 1973 के आस पास की बात है. वेद राही उस वक्त हेमा मालिनी और सतीश कौल को लेकर 'प्रेम पर्बत' नाम से एक फिल्म बना रहे थे. जयदेव ने वेद राही को वो धुन सुना दी. उसके बाद तो वेद राही पीछे ही पड़ गए उन्होंने कहा कि ये धुन तो वो अपनी फिल्म में इस्तेमाल करेंगे.

वेद राही को वो धुन इतनी पसंद आ गई कि वो जयदेव साहब की सुनने को तैयार ही नहीं हुए. बोल जानी मानी डोगरी कवियत्री पद्मा सचदेव के थे. जयदेव ने उन्हें बताया कि ये धुन उन्होंने फिल्म के हिसाब से तैयार नहीं की है लेकिन वेद राही नहीं माने. वेद राही को अगर आप नहीं पहचान पाए तो आपको बता दें कि उन्होंने बाद में दूरदर्शन के लिए ‘गुल गुलशन गुलफाम’ नाम का सीरियल भी बनाया था.

आखिर में जयदेव को वो गाना वेद राही की उस फिल्म के लिए देना ही पड़ा. आप पहले उस गाने को सुनिए और उसके बाद गाने के बहाने कई और किस्से कहानी.

इस गाने को जयदेव ने राग पहाड़ी पर कंपोज किया था जिसे लता मंगेशकर ने गाया था. इसी राग से जुड़ा एक और किस्सा आपको सुनाते हैं. 1964 में राज खोसला की एक फिल्म आई थी- वो कौन थी. इस फिल्म में मदन मोहन ने संगीत दिया था. एक से बढ़कर एक गाने. नैना बरसे रिमझिम रिमझिम, लग जा गले से फिर ये हसीं रात हो ना हो, जो हमने दास्तां अपनी सुनाई आप क्यों रोए ये तीनों ही गाने लाजवाब थे और जबरदस्त हिट हुए.

लता जी बताती हैं कि इस फिल्म के लिए मदन मोहन को पूरी उम्मीद थी कि उन्हें कोई ना कोई बड़ा पुरस्कार मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस बार लता जी तक बड़ी मायूस हुईं और उन्होंने अपनी मायूसी मदन मोहन के साथ साझा की. जिस पर मदन मोहन ने जवाब दिया कि उनके लिए यही बहुत बड़ा पुरस्कार है कि लता जी को उनके पुरस्कार न मिलने का मलाल है.

हम आपको दो वीडियो दिखा रहे हैं. पहले वीडियो में लता मंगेशकर इसी घटना का जिक्र कर रही हैं और फिर मदन मोहन की गायकी आपको सुनने को मिलेगी. दूसरे वीडियो में इसी फिल्म का एक और गाना लग जा गले हैं- जो राग पहाड़ी पर ही आधारित था.

हिंदी फिल्मों में राग पहाड़ी पर जमकर गाने कंपोज किए गए हैं. जाहिर है इस राग में एक से बढ़कर एक गाने मौजूद हैं. मसलन- 1955 में आई फिल्म उड़न खटोला का ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले, 1963 में आई फिल्म ताजमहल का गाना जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा’, 1969 में आई फिल्म आराधना का कोरा कागज था ये मन मेरा, 1971 में आई फिल्म दूर का राही का गाना जीवन से ना हार जीवनवाले’, 1974 में आई फिल्म आप की कसम का गाना करवटें बदलते रहे सारी रात, 1976 में आई फिल्म सिलसिला का सुपरहिट गाना कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है. इसी फिल्म का नीला आसमां सो गया. इसके अलावा भी दर्जनों गाने इसी राग में कंपोज किए गए और खूब पसंद किए गए. आपको सुनाते हैं कुछ गाने.

फिल्मी गीतों से इतर के कॉन्पोजीशन में आज आपको एक ऐसे कलाकार की गायकी सुनाते हैं जो अपनी दमदार आवाज के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं. हम जिक्र कर रहे हैं पाकिस्तान के मशहूर कव्वाल उस्ताद नुसरत फतेह अली खान की, उनकी गाई राग पहाड़ी, जिसके बोल हैं- अज़लो से मांदी हूं पायो जी मैंने राम रतन धन पायो भी इसी राग पहाड़ी पर कंपोज की गई भक्ति रचना है. अब आपको हमेशा की तरह राग पहाड़ी के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. रागदारी नाम की हमारी इस सीरीज की कोशिश भी यही है कि कुछ मजेदार किस्सों के भरोसे आपको हर हफ्ते एक नई राग के बारे में बताया जाए. उस राग की शास्त्रीयता, फिल्मों में उसके इस्तेमाल और शास्त्रीय संगीत में उसके चलन पर बात की जाए. आइए राग पहाड़ी का शास्त्रीय पक्ष जान लेते हैं.

पहाड़ी संपूर्ण जाति का राग है लेकिन इसका मूल आधार भूपाली जैसा है. भूपाली के चलन को बदलकर और शुद्ध मध्यम और निषाद लगाने से इस राग का स्वरूप बनता है. चूंकि मंद्र और मध्य सप्तक में ही राग खिलता है इसलिए मध्यम को सा मानकर इसे गाया-बजाया जाता है. इस राग का आरोह अवरोह देखिए...

आरोह- प़ ध़ सा रे ग प ध सां

अवरोह- सां नी ध प म ग रे सा नी़ ध़ प़ ध़ सा

पकड़- सा ध़ प़ ध़ म़ ग़ प़ ध़ सा

अब हमेशा की तरह आपको शास्त्रीय गायकी में इस राग का चलन सुनाते हैं. सबसे पहले सुनिए बड़े गुलाम अली खान का गाया राग पहाड़ी हरि ओम तत्सत, जो उनकी प्रचलित और दुर्लभ रचना है. इसके बाद आपको सुनाते हैं पंडित अजय चक्रवर्ती की बेटी कौशिकी चक्रवर्ती का इसी राग में गाया गया दादरा. नए दौर के कलाकारों में कौशिकी चक्रवर्ती का नाम खासा लोकप्रिय है.

वाद्यों की श्रृंखला में आज राग पहाड़ी में सुनिए ग्रैमी अवॉर्ड से सम्मानित महान कलाकार मोहन वीणा वादक पंडित विश्वमोहन भट्ट को

अगली बार एक और नए राग की कहानी के साथ हाजिर होंगे. अपनी प्रतिक्रिया हमें जरूर पहुंचाएं. साथ ही सोशल मीडिया में हमारी इस सीरीज को जरूर शेयर करें और लाइक करें.

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